अंकेक्षण (auditing) का क्या उद्देश्य है? कंपनी अंकेक्षण (company audit) से क्या आशय है। इनके दायित्व और कर्तव्य बताए ?

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Types of writ रिट के प्रकार Law

अंकेक्षण (auditing or Company Audit) एक महत्वपूर्ण कार्य है।और  यह सभी प्रकार के व्यवसाय के लिए आवश्यक है। तथा व्यवसाय कई तरह के होते हैं जैसे एकाकी व्यापार, साझेदारी व्यापार, संयुक्त हिंदू परिवार व्यापार, कंपनी, सरकारी तथा निजी आदि।

अंकेक्षण (auditing)का मुख्य उद्देश्य कार्य को सुचारू रूप से निष्पादन करना तथा  कार्य में एकरूपता लाना और  किसी लेन-देन की जांच न छूटना आदि है।एक से अधिक संस्थाओं का अंकेक्षण करना ही विभिन्न संस्थाओं का अंकेक्षण (auditing)कहलाता है।कुछ संस्थाओं के खातों का अंकेक्षण (auditing)इस प्रकार से है। जैसे —

    शिक्षण संस्थाओं के खातों का अंकेक्षण
    अस्पताल के खातों का अंकेक्षण
    शैक्षणिक संस्थाओं के भविष्य निधि संबंधित  खाते का अंकेक्षण
    बैंकिंग कंपनी के खाते का अंकेक्षण
    सरकारी कंपनियों का अंकेक्षण

अंकेक्षण (Auditing) –

बिजनेस में जो भी क्रियाकलाप होते हैं । उनकी शुद्धता, सत्यता की जांच करना आवश्यक होता है और यही अंकेक्षण कहलाता है। इससे व्यवसाय को उन्नति  करने का अधिक अवसर मिल पाता है। जो व्यक्ति अंकेक्षण का कार्य करते हैं उसे अंकेक्षक कहा जाता है। अंकेक्षण करने से व्यवसाय के लाभ-हानि खाता तथा आर्थिक स्थिति के बारे में सही अनुमान लगाया जा सके।

कंपनी अंकेक्षण का अर्थ Company Audit–

कंपनी (Company) – यह विधान द्वारा बनाया गया होता है । तथा इसको बनाने का मुख्य उद्देश्य अधिक से अधिक लाभ प्राप्त करना ततः अपने ग्राहकों को कई बेहतर सेवाएं प्रदान करना है

संस्था का प्रारूप कोई भी हो अंकेक्षक का कार्य जायदतर वही होता है तो पुस्‍तको के लेखों की जांच करना है। विभिन्‍न संस्‍थाओं के खाते उसके लेखा पालक द्वारा तैयार किए जाते है। इन खातों की जांच तथा संस्‍था के लाभ-हानि खातें और चिटठे की सत्‍यता और शुद्धता को जो व्‍यक्ति प्रमाणित करता है, वह अंकेक्षण कहलाता है।

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धारा – 224 (Sec. -224) :- इस धारा के अंतर्गत अंकेक्षक की नियुक्ति उनके कार्यकाल और उसके पारिश्रमिक के संबंध में प्रावधान हैं । इस धारा के अंतर्गत यह भी प्रावधान है कि यदि अंकेक्षक अपने कार्यकाल के दौरान किसी आकस्मिक रिक्तता का शिकार हो जाता है तो अंकेक्षक की नियुक्ति किस प्रकार से की जाएगी ।

अंकेक्षकों (auditor)की नियुक्ति संचालक मण्डल के द्वारा अंशधारियों के द्वारा एवं केन्द्र सरकार के द्वारा विभिन्न  स्थितियों को देखते हुएजो  की जाती है। भारतीय कम्पनी अधिनियम, 1956 के अंतर्गत प्रत्येक कम्पनी के लिए अपने लेखों का अंकेक्षण करना अनिवार्य है। तथा यह अंकेक्षण ”वैधानिक अंकेक्षण” कहलाता है।

कंपनी का पहला ऑडिटर —

कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 139(6) में यह बताया गया है कि सरकारी कंपनी के अलावा किसी कंपनी के पहले ऑडिटर को कंपनी के पंजीकरण की तारीख से 30 दिनों के भीतर निदेशक मंडल द्वारा नियुक्त किया जाएगा।

कंपनी ऑडिटर की नियुक्ति—

पहली वार्षिक आम बैठक में एक कंपनी के शामिल होने के बाद, निदेशक मंडल द्वारा एक लेखा परीक्षक की नियुक्ति की जानी चाहिए। लेखापरीक्षक आमतौर पर 6वीं एजीएम या 5 साल के समापन तक कार्यकाल धारण करेगा। एक लेखा परीक्षक की नियुक्ति भी 1 वर्ष की अवधि के लिए की जा सकती है, जिसे प्रत्येक वार्षिक आम बैठक में नवीनीकृत किया जा सकता है।

कंपनी अंकेक्षण के दायित्व —( Liabilities Of Company Auditor) —

दायित्व का अर्थ जिम्मेदारी से लगाया जाता है अर्थात अगर आपको या किसी भी व्यक्ति को कोई काम मिला है तो वह व्यक्ति उस काम के प्रति उत्तरदायी होगा। अंकेक्षण एक महत्वपूर्ण शब्द है। किसी कंपनी का अंकेक्षण करने वाला व्यक्ति उस कंपनी के कार्य का जिम्मेदार होता है।

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कंपनी अंकेक्षण के दायित्व में 3 शब्द है- कंपनी, अंकेक्षण तथा दायित्व । यह तीनों शब्द अपने आप में व्यापक है।

एक अंकेक्षक के द्वारा किसी भी प्रकार कि  कंपनी का अंकेक्षण करते समय काफी सावधानी एवं बुद्धिमानी से काम करना होता है। कंपनी अंकेक्षण कराने के लिए अंकेक्षक को नियुक्त करती है।तथा  जो कंपनी अधिनियम 2013 (company act 2013)के प्रावधानों में उल्लेख है। बदले में उन्हें पैसे पे करती है तो अंकेक्षक का भी जिम्मेदारी बनता है कंपनी का अंकेक्षण ढंग से करे।

इस प्रकार से अंकेक्षक का कंपनी के अंकेक्षण की जिम्मेदारी ही ‘कंपनी अंकेक्षण के दायित्व’ हैं।

एक अंकेक्षक कंपनी के अंशधारियों (Shareholders) का प्रतिनिधि होता है। इसका कर्तव्य होता है कि वह अपना कार्य पूरी ईमानदारी, लगन, निष्ठा, बुद्धिमानी, सावधानी तथा सतर्कता से करें तथा साथ ही उनके हितों की रक्षा करें।

अगर अंकेक्षक के कारण रिपोर्ट में दिए गए सूचना गलत साबित होता है और कंपनी को भारी नुकसान होता है तो अंकेक्षक उत्तरदायी होगा। उसके ऊपर मुकदमा भी दायर किया जा सकता है। पर ध्यान दे अंकेक्षक की गलतियां, लापरवाही न्यायालय (Court) में भी सिद्ध होने चाहिए।

कंपनी अधिनियम 2013(company act 2013) की धारा 35 के अनुसार प्रविवरण में गलत सूचना देने पर प्रविवरण के जारी को अधिकृत करने वाले प्रवर्तक,जो कि प्रमोटेर होते है या फिर निर्देशन एवं अंकेक्षण सहित अन्य व्यक्तियों का दायित्व दीवानी दायित्व होता हैं।

जिसका उल्लेख इस धारा में किया गया है। इस धारा के अनुसार अगर कोई व्यक्ति प्रविवरण के आधार पर कंपनी का शेयर खरीद लेता है और बाद में पता चलता है उस प्रविवरण में उल्लेखित सूचना गलत है जिसके परिणाम स्वरुप उस व्यक्ति को भारी नुकसान होता है तो उस स्थिति में उस व्यक्ति के नुकसान का निम्न व्यक्ति जिम्मेदार होंगे-

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    वह व्यक्ति जो प्रविवरण निर्गमन के समय कंपनी का निदेशक है।
    यदि अपने को प्रविवरण में कंपनी के निदेशक के रूप में नाम जोड़ने के लिए अधिकृत करता है यह शीघ्र या कुछ समय अंतराल के पश्चात कंपनी के निर्देशक बनने की स्वीकृति दे दी है।
    अंकेक्षण सहित यदि कोई व्यक्ति प्रविवरण के निर्गमन आदि अधिकृत करता है।

    यदि कंपनी का प्रवर्तक है।

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