सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) धारा 114 से धारा 119 का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 113  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने मे आसानी होगी। और पढ़ने के बाद हमें अपना कमेंट अवश्य करे।

धारा 114

इस धारा के अनुसार जब कोई व्यक्ति कोर्ट की डिक्री या आदेश से खुद को पीड़ित मानता है। और वह  जिसमें अपील की अनुमति है।  लेकिन वह अपील को वरीयता नहीं देता है या जहां एक डिक्री या आदेश के खिलाफ अपील का कोई प्रावधान नहीं किया गया है  तो डिक्री या आदेश पर पुनर्विचार किया जा सकता है और संबंधित कोर्ट आदेश जारी कर सकता है । या डिक्री सुना सकता है। धारा 114 के तहत पुनर्विचार की व्यापक शक्ति के अंतर्गत न तो पुनर्विचार की शक्तियों के इस्तेमाल में पूर्व दृष्टांत के तौर पर कोई शर्त रखी गयी है। और  न ही यह धारा संबंधित कोर्ट को अपने फैसले पर पुनर्विचार की शक्तियों के इस्तेमाल से प्रतिबंधित करती है।

राम साहू (मृत) बनाम विनोद कुमार रावत वाद मे इसको स्पस्ट किया गया है।  कि वाद में कब्जे को लेकर आवश्यक दलीलें और लिखित बयान भी थे। यहां तक कि पक्षकारों ने कब्जे को लेकर सबूत पेश किये थे।तो वाद मे इसको ध्यान दिया जाये ।

धारा 115

इस धारा मे यह बताया गया है की सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 की धारा 115 पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार को परिभाषित करती है। इसमे बताया गया है की पीड़ित पक्ष द्वारा एक पुनरीक्षण आवेदन दायर किया जा सकता है। तथा इसमे एक पक्ष उच्च न्यायालय में रिट दाखिल करने के बाद पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार लागू कर सकता है। यह धारा उच्च न्यायालय के पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार को परिभाषित करती है। इसमे बताया गया है की पुनरीक्षण की शक्ति केवल न्याय है प्रशासन नहींहै और यह संशोधन की शक्ति वैधानिक है।तथा इसको नए कानून द्वारा इसे समाप्त किया जा सकता है। पुनरीक्षण शक्तियों का कम प्रयोग होता है और सभी परिस्थितियों में इसका प्रयोग नहीं किया जा सकता क्योंकि धारा 115  प्रतिबंधित है।

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इसमे बताया गया है की –

उच्च न्यायालय किसी भी ऐसे मामले के अभिलेखो  को मंगवा सकेगा।  जिसका ऐसे उच्च न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय ने विनिश्चय किया है और जिसकी कोई अपील भी नहीं होती है और यदि यह प्रतीत होता है कि –

(क) ऐसे अधीनस्थ  न्यायालय ने ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो उसने विधि द्वारा निहित नहीं है, अथवा

( ख) ऐसा अधीनस्थ न्यायालय ऐसी अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है। या फिर  जो इस प्रकार निहित है।  अथवा

( ग) ऐसे न्यायालय ने अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने में या फिर अवैध रूप से या तात्विक अनियमितता से कार्य किया है।

तो उच्च न्यायालय उस मामले में ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे।

धारा 116

इस धारा के अनुसार इस भाग का कुछ उच्च न्यायालय  को ही लागू होना बताया गया है । इस धारा के अनुसार यह भाग ऐसे उच्च न्यायालय  को ही लागू होगा जो न्यायिक न्यायालय को नही ।

धारा 117

इस धारा के अनुसार संहिता  का उच्च न्यायालय  को लाग होना  बताया गया है। जिसके अनुसार  उसके सिवा जैसा इस भाग मे या भाग 10 मे या फिर उस नियम से संबंधित उपबंध मे दिया गया है।तथा  इस संहिता  के उपबंध ऐसे उच्च न्यायालय को लागू होंगे।

धारा 118

इस धारा के अनुसार खर्चो के अनिश्चय पूर्व डिक्री के निष्पादन को बताया गया है। जिसके अनुसार जब उच्च न्यायालय यह आवश्यक समझता है की उसकी अपनी अधिकारिता से संबंधित सिविल अधिकारियों के प्रयोग से संबंधित कोई डिक्री वाद मे खर्चो के विनिश्चय द्वारा अभिनिश्चित किए जाने के पूर्व निष्पादित किया जाना चाहिए वहां वह न्यायालय यह आदेश दे सकेगा की उस डिक्री के उतने भाग के सिवा जितना खर्चे से सम्बन्धित है। उस डिक्री का तुरंत ही निष्पादन किया जाये। और उसे उतना भाग के बारे मे यह आदेश दे सके जो की खर्चो से संबंधित है के निर्धारण के द्वारा यह अभिनिश्चित हो जाये की डिक्री का निष्पादन हो सके।

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धारा 119

इस धारा मे यह बताया गया है की अप्राधिकृत व्यक्ति न्यायालय को संबोधित नहीं कर सकेंगे । इस संहिता की किसी  भी बात के बारे मे यह नही  समझा
जाएगा कि  वह किसी व्यक्ति को  को वहां के सिवाय जहां पर न्यायालय  ने अपने चार्टर के द्वारा प्रदत्त शक्ति के प्रयोग मे उस व्यक्ति को ऐसा
करने के लिए प्राधिकृत कर दिया है। दूसरे व्यक्ति की और से उस  न्यायालय को उसकी आरम्भक सिविल  अिधकािरता के परयोग मे
संबोधित करने को या साक्षियों  की परीक्षा करने को प्राधिकृत करती है।  या अटॉर्नी ,अधिवक्ता की शक्तियों हस्तक्षेप करती है।

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