(सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 183 से 187 का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 182  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 183

इस धारा के अनुसार लोक सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार के द्वारा संपत्ति लिए जाने का प्रतिरोध को बताया गया है।इस धारा के अनुसार  जो कोई किसी लोक सेवक के विधिपूर्ण प्राधिकार के द्वारा अथवा  किसी संपत्ति के ले लिए जाने का प्रतिरोध यह विसवास दिलाते हुए  या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि वह ऐसा लोक सेवक है। और  वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या फिर  जुर्माने से जिसका मूल्य   एक हजार रुपए तक का हो सकेगा या दोनों से दंडित किया जाएगा ।

धारा 184

इस धारा के अनुसार एक साथ विचारणीय अपराधों के लिए विचारण का स्थान को बताया गया है।
जहाँ पर

किसी भी  व्यक्ति के द्वारा किए गए अपराध ऐसे अपराध है  कि प्रत्येक ऐसे अपराध के लिए धारा 219, धारा 220 या धारा 221 के उपबंधों के आधार पर एक ही विचारण में उस पर आरोप लगाया जा सकता है।  और उसका विचारण किया जा सकता है।  अथवा

कई व्यक्तियों के द्वारा किया गया अपराध ऐसे हैं कि उनके लिए उन पर धारा 223 के उपबंधों के आधार पर एक साथ आरोप लगाया जा सकता है।  और उन पर विचारण किया जा सकता है।

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वहां अपराध की जांच या विचारण ऐसे न्यायालय द्वारा किया जा सकता है।  जो उन अपराधों में से किसी की जांच या विचारण करने के लिए सक्षम है।

तो उसे किसी एक अवधि के लिए कारावास, जिसे एक महीने तक बढ़ाया जा सकता है।  या पांच सौ रुपए तक का आर्थिक दण्ड या दोनों से, दण्डित किया जा सकता है ।

धारा 185

इस धारा के अनुसार विभिन्न सेशन खण्डों में मामलों के विचारण का आदेश देने की शक्ति को बताया गया है।

इस अध्याय के पूर्ववर्ती उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी जब  राज्य सरकार निर्देश दे सकती है । कि ऐसे किन्हीं मामलों का या किसी वर्ग के मामलों का विचारण किया गया है  जो किसी जिले में विचारणार्थ सुपुर्द हो चुके हैं। अथवा  किसी भी सेशन खंड में किया जा सकता है।
परन्तु यह तब जब कि ऐसा निर्देश उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय द्वारा संविधान के अधीन या इस संहिता के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन पहले ही जारी किए गए किसी निदेश के विरुद्ध नहीं है।

धारा 186

इस धारा के अनुसार संदेह की दशा में उच्च न्यायालय का एक से अधिक  जिला विनिश्चित करना जिसमें जांच या विचारण होना बताया गया है।
जहां पर  दो या अधिक न्यायालय एक ही अपराध का संज्ञान कर लेते हैं।  और यह प्रश्न उठता है कि उनमें से किसे उस अपराध की जांच या विचारण करना चाहिए तो ऐसे दशा मे वहाँ वह प्रश्न —

(क) यदि वे न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीनस्थ हैं तो उस उच्च न्यायालय द्वारा

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(ख) यदि वे न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीनस्थ नहीं हैं।  तो ऐसे दशा मे  उस उच्च न्यायालय द्वारा जिसकी अपीली दांडिक अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अंदर कार्यवाही पहले प्रारंभ की गई है। या विनिश्चित किया जाएगाऔर तब उस अपराध के संबंध में अन्य सब कार्यवाहियां बंद कर दी जाएंगी

धारा 187

इस धारा के अनुसार स्थानीय अधिकारिता के परे किए गए अपराध के लिए समन या वारंट जारी करने की शक्ति को बताया गया है।
इस धारा के अनुसार जब किसी प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को यह विश्वास करने का कोई कारण दिखाई देता है । कि उसकी स्थानीय अधिकारिता के अंदर के किसी व्यक्ति ने ऐसी अधिकारिता के बाहर किसी व्यक्ति ने (चाहे भारत के अंदर या बाहर) ऐसा अपराध किया है । जिसकी जांच या विचारण 177 से 185 तक की धाराओं के उपबंधों के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन ऐसी अधिकारिता के अंदर नहीं किया जा सकता है।  किंतु जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन भारत में विचारणीय है।  तब ऐसा मजिस्ट्रेट उस अपराध की जांच ऐसे कर सकता है मानो वह ऐसी स्थानीय अधिकारिता के अंदर किया गया है ।

और ऐसे व्यक्ति को अपने समक्ष हाजिर होने के लिए इसमें इसके पूर्व उपबंधित प्रकार से विवश कर सकता है और ऐसे व्यक्ति को ऐसे अपराध की जांच या विचारण करने की अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट के पास भेज सकता है । या यदि ऐसा अपराध मृत्यु से या आजीवन कारावास से दंडनीय नहीं है । और ऐसा व्यक्ति इस धारा के अधीन कार्रवाई करने वाले मजिस्ट्रेट को समाधानप्रद रूप में जमानत देने के लिए तैयार और इच्छुक है तो ऐसी अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट के समक्ष उसकी हाजिरी के लिए प्रतिभुओं सहित या रहित बंधपत्र ले सकता है।

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(2) जब ऐसी अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट एक से अधिक हैं और इस धारा के अधीन कार्य करने वाला मजिस्ट्रेट अपना समाधान नहीं कर पाता है कि किस मजिस्ट्रेट के पास या समक्ष ऐसा व्यक्ति भेजा जाए या हाजिर होने के लिए आबद्ध किया जाए, तो मामले की रिपोर्ट उच्च न्यायालय के आदेश के लिए की जाएगी।

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