व्यावसायिक निर्देशन की परिभाषा तथा आवश्यकता

‘नेशनल वोकेशनल गाइडेंस एसोसिएशन’ के द्वारा इसका उल्लेख 1924 मे किया  गया था । इस एसोसिएशन ने अपनी रिपोर्ट में व्यावसायिक निर्देशन को परिभाषित करते हुए बताया है कि  व्यवसाय निर्देशन व्यवसाय को चुनने, के लिए तैयार करके, उसमें प्रवेश करने तथा उसमें विकास करने हेतु सूचना देने, अनुभव देने तथा सुझाव देने की प्रक्रिया मात्र है।

यहा पर निर्देशन का आशय  संचालन से है। जिसमे प्रत्येक स्तर पर कार्य करने वाले कर्मचारियों का मार्गदर्शन करना, उनको परामर्श देना, प्रोत्साहन करना तथा उनके कार्यों का निरीक्षण करना आदि शामिल होता है।

प्रैंक पार्सन्स के द्वारा अपनी एक रिपोर्ट में निर्देशन शब्द का प्रयोग किया  जा चुका था। पर यह व्यावसायिक नही था।

अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन के द्वारा व्यावसायिक निर्देशन का आशय स्पष्ट किया  गया।
जिसमें बताया गया कि –

व्यावसायिक निर्देशन, व्यक्तियों के गुणों एवं व्यवसाय के साथ उनके सम्बन्ध को ध्यान में रखते हुए, व्यक्ति को व्यवसाय के चयन एवं उसकी प्रकृति में आने वाली समस्याओं के सुलझाने में प्रदान की जाने वाली सहायता को कहते हैं।

डोनाल्ड सुपर के अनुसार –

किसी व्यक्ति को अपना एवं व्यवसाय क्षेत्र के बीच अपनी भूमिका का समग्र एवं पर्याप्त चित्र बनाने तथा  उसे स्वीकार करने और  वास्तविक स्थिति के समय इस अवधारणा की जांच करने एवं उसे स्वयं के संगठन तथा समाज के लाभ हेतु, वास्तविकता में बदलने की सहायता प्रदान करने के उपक्रम को व्यावसायिक निर्देशन कहते हैं।

फ्रैंक पारसन्स के अनुसार-

व्यावसायिक निर्देशन व्यक्ति को किसी व्यवसाय के चुनाव करने के लिए  उसके लिए तैयारी करने के लिए तथा  उसमें प्रवेश करने एवं प्रगति करने में मदद करने का प्रक्रम है। इसका सम्बन्ध मुख्य रूप से भविष्य की योजना बनाने एवं जीवन चर्या के निर्माण हेतु किये जाने वाले निर्णयों एवं विकल्पों के चुनाव में व्यक्ति को सहायता प्रदान करने से है। ये निर्णय एवं वैकल्पिक चुनाव को संतोष तक-व्यावसायिक समायोजन प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं।

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इसकी निम्न आवश्यकता होती है।

वैयक्तिक भिन्नताओं की दृष्टि से-

इस सिद्धांत के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति में निहित योग्यता, क्षमता, रूचि, अभिरूचि सब भिन्न-भिन्न होती है।जैसे कि प्रत्येक व्यक्ति एक दूसरे से भिन्न होता ही है। इस विभिन्नता की समुचित जानकारी प्राप्त किए बिना यह संभव नहीं है कि व्यक्ति की अभिरुचि, भावी प्रगति अथवा व्यवसाय के लिए अनुकूल व्यक्तियों का चयन करने से पूर्व वैयक्तिक विभिन्नताओं के स्तर एवं स्वरूप की जानकारी आवश्यक होती है।

जब तक इस व्यक्तिगत भिन्नता की जानकारी न मिल जाये तब तक यह सम्भव नहीं कि किसी व्यवसाय के सम्बन्ध में तथा किसी व्यक्ति विशेष  की प्रगति के लिए और व्यवसाय की अनुकूलता के लिये निश्चित कथन किया जा सके। किसी भी व्यवसाय में अनुकूल व्यक्तियों का चुनाव करने के लिए वैयक्तिक भिन्नताओं के स्तर एवं स्वरूप की जानकारी आवश्यक होती है । क्योंकि प्रत्येक व्यवसाय के लिए किसी विशेष योग्यता वाले व्यक्ति की आवश्यकता होती है। इसलिए निर्देशन की सफलता के लिए इस सम्बन्ध में विभिन्न स्रोतों से प्राप्त सूचना एकत्रित की जा सकती है।

व्यावसायिक भिन्नता की दृष्टि से-

हमारे  देश की अधिकांश जनता कृषि व्यवसाय के माध्यम से ही अपनी जीविकोपार्जन की समस्या का समाधान कर लेतीहै। समाज की आवश्यकता भी पहले के समय मे सीमित थी तथा जनसंख्या का घनत्व अपेक्षाकृत कम था। संयुक्त परिवार प्रथा के कारण एक परिवार के सदस्यों को एक ही स्थान पर रहकर आधिकारिक अर्थोपार्जन का अवसर सुलभ रहता था।

परन्तु जनसंख्या की तीव्र गति से जो  वृद्धि, औद्योगीकरण एवं नगरीकरण आदि के कारण अब  नवीन प्रकार के उद्योगों, व्यवसायों आदि की आवश्यकता का अनुभव किया जाने लगा। और शीघ्र ही विभिन्न प्रकार की प्रकृति वाले व्यवसायों का उदय होना प्रारंभ हो गया तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति के उपरान्त अल्पकाल में ही अनेक व्यवसाय संचालित किए जाने लगे।

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 इन सभी व्यवसायों में अपेक्षित उत्पादन एवं कार्य कौशल की दृष्टि से अनुकूल व्यक्तियों के चयन की समस्या का उत्पन्न होना स्वाभाविक था। इसलिए यह जरूरी समझा गया कि  शिक्षार्थियों को उनकी अभिरुचि के अनुसार विषयों के चयन में सहायता प्रदान की जाए जिससे शिक्षा और व्यवसाय अथवा शैक्षिक सम्बोधित एवं जीविकोपार्जन से सम्बन्धित अपेक्षाओं में समन्वय स्थापित किया  जा सके।

व्यावसायिक निर्देशनके  द्वारा विद्यार्थियों को उनकी रूचियों, कौशलों, योग्यताओं, अभिरूचियों आदि के सम्बन्ध में जानकारी प्रदान की जा सकती है। इस जानकारी के आधार पर ही यह अपनी योग्यता के अनुरूप विषयों का चयन करने तथा  भावी व्यवसाय के लिए आवश्यक योग्यताओं, क्षमताओं एवं कौशलों का विकास करने तथा उस व्यवसाय में प्रविष्ट होकर वूनिक संतोष की दिशा में अग्रसर होने का अवसर प्राप्त कर सकते हैं।

समाज की परिवर्तित दशाओं की दृष्टि से-

 आज सभी दृष्टि  से चाहे वह परिवार हो या  धार्मिक एवं आर्थिक दृष्टि से समाज की दशाओं में काफी अंतर आ गया है।एक पुराना समय था जिसमे  व्यक्ति की योग्यता, व्यक्ति का अस्तित्व एवं परोपकार आदि की किये जाने वाले कार्यों को बड़ा महत्व दिया जाता था। परन्तु आज के समाज की स्थिति बिल्कुल अलग है।

आज व्यक्ति के स्तर क्या है उसके पास  धन या भौतिक साधन कितना है । इसका  महत्व दिया जाता है। । आज यह जरूरी हो गया है कि कोई व्यक्ति अगर अपने पड़ोसियों, संबंधियों, मित्रों, परिचितों से सम्मान पाना चाहता है।  तो उसे रहन-सहन का स्तर ऊपर उठाना होगा। वहीं आज व्यक्ति के सम्मान और समानता तथा सामाजिक मान्यता पाने का आधार है।

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जनसंख्या वृद्धि और सीमित अवसरों के कारण प्रतिस्पर्धा का माहौल हर जगह उत्पन्न हो गया है। आज वही सफल है  जो भौतिक दृष्टि से आगे हैं। इस माहौल में व्यक्ति का मानसिक और भौतिक संतुलन अच्छे से  बना रहे इसके लिए यह जरूरी  है कि उसे उपयुक्त व्यवसाय का चुनाव करके उसमें प्रगति करें। इस दिशा में व्यावसायिक निर्देशन विशेष रूप से सहायक सिद्ध हो सकता है।

मानवीय क्षमताओं का  उपयोग करने हेतु-

समाज मे जो भी व्यक्ति प्रगति करना चाहता है उसको मानवीय क्षमताओं का प्रयोग करना होगा। और समाज अथवा राष्ट्र की प्रगति के लिए भी यह अत्यन्त आवश्यक है कि मानवीय क्षमताओं का समुचित प्रयोग किया जाए। हमारे देश मे शिक्षा सही नहीं है जिससे कि व्यक्तियों को उनके व्यवसाय में या अध्ययन काल के बाद भी यह नहीं मालूम हो पाता है । कि उनकी रुचि किस प्रकार के व्यवसाय में है और वह किस प्रकार की रुचि के अनुकूल व्यवसाय में लगकर प्रगति की जा सकती है।

हमारे यहां व्यक्ति की योग्यता का सही मूल्यांकन कभी भी नहीं हो पाता है। योग्यता एवं व्यावसायिक अवसर में अन्तर इस सीमा तक गिरा हुआ है कि जिसको  मात्र एक लिपिक के रूप में कार्य करना चाहिए था । वह अफसर बना दिए गए हैं।  और जो अधिकारी होने चाहिए थे वह मात्र लिपिक के रूप में ही जीविकोपार्जन कर रहे हैं। इसके लिए समुचित मानवीय क्षमताओं का  उपयोग आवश्यक है। 

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