ADMINISTRATIVE LAW (प्रशासकीय कानून) क्या हैं। परिभाषा तथा तुलनात्मक अध्ययन एवं mansukhlal vs state of gujarat AIR 1997 Case law।

ADMINISTRATIVE LAW (प्रशासकीय कानून) – इसका अर्थ है – लोक प्रशासको के विवेक की शक्ति के स्वरूप और सीमा का निर्धारण करने वाला कानून । अपने व्यापक अर्थ में प्रशासनिक विधि या कानून शासन, प्रशासन के सभी अंगों से संबंधित सभी कानूनों का संग्रह है|

क्योकि यह कार्यपालिका द्वरा बनाया जाता है इसलिए इसको दितियक विधि भी कह सकते हैं |

क्योकि यह विधायिका दावरा कानून को प्राथमिक विधान भी कह सकते हैं | यह विस्तार मे बनाया जाता हैं और यह शक्ति प्रदान की जाती हैं की वह अपने अनुसार विधान बना सके या नियम बना सके |इस प्रकार कार्य पालिका अपने विधान बनाती हैं |

इस विधि मे संशोधन विधायिका द्वरा ही किया जा सकता हैं |

 

प्रशासनिक अधिकारी ही कार्यपालिका का संचालन करेंगे| वह अपने राज्य और इलाके के अनुसार कुछ नियम बना सकते हैं और उसको लागू कर सकते हैं | इसको प्रतयोजित विधान भी कहा जा सकता हैं |

 

यह परिभाषित छेत्र मे नियम बनाना , अधिकार प्रदान करना और निर्णय की शक्ति प्रदान करना होता हैं |

जब कार्य विधि निर्धारित नही होती तो उसका निर्धारन करना होता हैं |

कोई भी अपनी सम्पूर्ण शक्ति का प्र्तियोजन नही करता हैं |

कोई भी उच्च अधिकारी इन कार्यो को प्र्तिवादित नही कर सकता |

नियंत्रण का अधिकार

कूटनीति

उच्च अधिकारी की नियुक्ति

नियम बनाना

विशेष निर्णय लेने का अधिकार

 

किसी विशिस्ट उदेश्य की पूर्ति के लिए इसका निर्माण किया जाता हैं क्योकि वर्तमान मे सभी के कार्य मुश्किल होता जा रहा हैं कार्य बढ़ता जा रहा हैं उच्च अधिकारी संगठन के अनुसार कार्य नही कर प रहे हैं | इससे समस्या बढ़ जाती हैं और उसका हल नही निकल  पाता हैं जिससे अधिकारी अपने पावर को दूसरे को दे देता हैं जिससे समस्या का हल निकाला जाता हैं |

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प्रशासनिक अधिकारी केवल अपने सीमा मे रह कर ही कार्य कर सकते हैं | वह सीमा से बाहर नही जा सकते हैं |

प्र्त्य्योजन एक कला हैं किसको कितनी शक्ति मिलनी चाहिए इसका निर्णय प्रतियोजन अधिकारी द्वारा लिया जाता हैं |

 

यह लिखित या अलिखित कोई भी हो सकता हैं यदि लिखित हैं  तो उसमे स्पठता जादा होती हैं बल्कि जायदातार अलिखित होता हैं | जो अधिकारी द्वरा खुद से बना लिया जाता हैं |

 

14 वी शताब्दी मे लोग पड़े लिखे नही थे | लोग प्रजा और राजा मे बांटे गए थे | जायदातर लोग अनपढ़ थे |और 19 वी शताब्दी मे लोग अपने कर्तव्य के बारे मे सोचने लगे और पढ़ने लगे और फिर धीरे धीरे नियम और कानून बनाने के लिए सोचने लगे|

और उन्होने administrative बॉडी स्थापित किया गया | इसमे विधायिका ,संसद, judiciary, executive बॉडी आदि आती हैं |

भारत मे 2 प्रकार की शक्तिया हैं |

राज्य सरकार

केंद्र सरकार

भारतीय जनता को एड्मिनिस्ट्रेटिव बॉडी चलाती हैं |

Administrative लॉं केवल गवर्नमेंट बॉडी को परिभाषित करता हैं |

 

सोर्स ऑफ एड्मिनिस्ट्रेटिव लॉं –

Constitution

जैसे की आपको पहले ही पता हैं ये सुप्रीम लॉं हैं | भारत का constitution देश का सबसे बड़ा और लिखित संविधान हैं | इसमे 3नो शक्तिया अपने अपने कानून को पास करती हैं और अक दूसरे पर निरभर नही होती हैं |

 

Legislation  प्रिन्सिपल ऑफ इमपावरमेंट के नाम से भी जाना जाता हैं | इसके अनुसार लोक सभा और राज्य सभा के बाद रास्टपति के सहमति के बाद ही कोई बिल पास कराया जाता हैं | इसमे रास्टपति के सिग्नेचर के बाद ही पास होगा |

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Ordiance

Ordiance का पावर रास्टपति के पास होता हैं | जब दोनों सदन मे नही होती हैं तो रास्ट हित के लिए रास्टपति कानून बना सकता हैं | यह राज्यपाल द्वारा लागू किया जा सकता हैं यह आर्टिक्ल  213 के अनुसार कार्य करता हैं |

 

लॉं का निर्माण मुख्यता legislator द्वारा किया जाता हैं | परंतु कभी कभी legislator खुद के कार्य को दूसरे को दे देता हैं और अपने शक्तियों को प्रतियोजित किया जा सकता हैं |

इसमे कमिटी गवर्नमेंट के द्वारा बनाए गए संविधान की रिपोर्ट जो की सोर्स ऑफ एड्मिनिस्ट्रेटिव लॉं होती हैं | और गवर्नमेंट रिपोर्ट भी इसके अंतर्गत आता हैं |

 

Judicial review जब को decision देने के बाद उसपर सुप्रीम कोर्ट और हाइ कोर्ट decision को पुनः रिवियू कर सकता हैं जब उसको लगता हैं की यह लोक हित के लिए अच्छा हैं | इसके लिए आपको writ  दायर किया जाता हैं |

 

हमारे लोकसभा ,राज्यसभा ,रास्टपति और राज्यपाल ये सब सोर्स ऑफ एड्मिनिसट्रेशन होते हैं |

 

प्रशासनिक संगठन प्रक्रिया तथा कृत्य से संबंधित समस्त विधिक नियम जिनका उद्देश्य लोक विधि के उद्देश्य को पूरा करना होता है

प्रशासनिक विधि का तात्पर्य है।

स्वार्टज  (Schwartz) के अनुसार-

” प्रशासनिक विधि प्रशासन को नियंत्रित करने वाली विधि है ना कि प्रशासन द्वारा उत्पन्न विधि ।”

अब हम जानते हैं की सभी विद्वान एक दूसरे से किस प्रकार तुलना करते हैं। सभी परिभाषा अपने मे सम्पूर्ण हैं पर सभी मे कुछ न कुछ कमी हैं ग्रिफिथ एवं स्ट्रीट की परिभाषा भी अपने आप में पूर्ण नहीं तीनों शाखाओं जिसमे  कार्यपालिका, विधायिका एवं न्यायपालिका  को अलग  रखा जा सकता है। स्‍वार्टज की परिभाषा भी पूर्ण नही हैं। इन्होंने प्रशासनिक विधि के अन्तर्गत अध्ययन किये जाने वाले प्रशासन के संरचनात्मक पहलू को छोड दिया हैं।  हालांकि डाक्टर मार्कोस की परिभाषा अपने आप में संपूर् है क्योंकि इसमें प्रशासनिक विधि के संगठनात्मक एवं नियंत्रनात्मक  दोनों पहलुओं को सम्मिलित किया गया है

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mansukhlal vithaldas chauhan vs state of gujarat AIR 1997 Case law-

इस case law मे माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्णय लोक सेवक नियमों के तहत  कार्य करने के दौरान सभी व्यक्तियों को उनके मंसानुसार सदैव संतुष्ट नहीं कर सकता जिससे ऐसे व्यक्ति उससे नाराज हो सकते है. इसलिए स्वीकृति कर्ता अधिकारी को उसके समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों को सावधानी पूर्वक देखकर ही स्वीकृति/अस्वीकृति का निर्णय लेना चाहिए

इसमे यह ध्यान रखना चाहिए कि –

विधि मे यदि कोई अशुद्धि हुई हो।

प्राक्रतिक न्याय के नियम का उलंघन नही होना चाहिए।

इसके द्वारा हम आपको एड्मिनिस्ट्रेटिव लॉं का ज्ञान प्रदान किए हैं और आगे भी इससे संबन्धित पोस्ट आपको मिलते रहेंगे | अपने सुझाव आप हमे कमेंट के माध्यम से दे सकते हैं |

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