भारत मे प्रशासनिक अधिकरण -administrative tribunal in India

मूल संविधान मे पहले अधिकरण को नहीं रखा गया था परंतु जब इसकी आवश्यकता हुई तो अनुच्छेद 323 मे अधिकरण जोड़ा गया जो की 42 वे संविधान संशोधन के तहत  इसको जोड़ा गया । इसको भाग 14 मे रखा गया जो की संघ और राज्य के अधीन सेवाये जो अनुच्छेद 308-323 मे संमलित होता है और यह  अनुच्छेद  323 मे दिया गया है।
भारतीय संविधान के अंतर्गत अनुच्छेद 323 के अंतर्गत संसद को यह अधिकार प्रदान किया गया है स्वर्ण सिंह समित ने इसको प्रस्तावित किया था । इसके अनुसार संसद को यह अधिकार प्रदान किया गया है कि वह केंद्र और राज्य की लोक सेवा स्थानीय निकाय ,सार्वजनिक निगमों तथा अन्य सार्वजनिक प्राधिकरणों मे नियुक्त व्यक्तियों के भर्ती सेवा से संबंधित विवादों को सुलझाने के लिए प्राधिकरण का गठन किया ।


उच्च न्यायालय को अलग कर यह अधिकार दिया गया है की वह प्राधिकरण मामलों का निपटारा कर सके।
अनुच्छेद 323 क का पालन करते हुए संसद ने प्रशासनिक अधिकरण अधिनियम 1985 पारित किया गया । यह सरकार को केन्द्रीय और राज्य सरकार को प्रशासनिक अधिकार के गठन का अधिकार देता है। यह लोक सेवक को न्याय प्रदान करने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

कैट इस कार्य को करने के लिए काफी हद तक सफलता हसिल कर चुका है। अधिकरण को अपने लक्ष्य मे सहायता देने के लिए केन्द्रीय कर्मचारी के द्वारा आवश्यक सुधार कर दिया जाता है और इसमे सुधार भी किया जाता है।

केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण का गठन 1985 मे हुआ । इसका मुख्य कार्यालय दिल्ली मे है और बाकी जगह इसकी पूरक खंडपीठ है। अभी तक इसकी 17 खंडपीठ है। इसमे 15 अन्य राज्य मे तथा 2 लखनऊ और जयपुर मे संचालित है।
क्षेत्राधिकार-
केन्द्रीय प्रशासनिक अधिकरण अपने अधिकार क्षेत्र मे आने वाले लोक सेवक की भर्ती तथा अपने अधिकार क्षेत्र को देखता है। इसके अधिकार क्षेत्र मे अखिल भारतीय सेवाये ,केन्द्रीय लोक सेवाये , केंद्र के अंतर्गत नागरिक सेवाये ,सर्वोच्च न्यायालय के कर्मचारी और संसद के कर्मचारियों को इसमे संमलित नहीं किया गया है।

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कैट में एक अध्यक्ष तथा एक उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य शामिल होते हैं। इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति के  द्वारा की जाती है। न्यायिक और प्रशासनिक क्षेत्रों से कैट के सदस्यों की नियुक्ति होती है। सेवा की अवधि 6 वर्ष या अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के लिए 65 वर्ष और सदस्यों के लिए 62 वर्ष जो भी पहले हो,तब तक उनकी सेवा होती है। अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या कैट का कोई भी अन्य सदस्य अपने कार्यकाल के बीच में ही अपना इस्तीफा राष्ट्रपति को भेज सकता है।
कैट की शक्तिया उच्च न्यायालय के न्यायधीश के बराबर होता है।


राज्य प्रशासनिक अधिकरण
(State Administrative Tribunal)

राज्य प्रशासनिक अधिकरण अनुच्छेद 323ब के द्वारा राज्य विधानमंडलों को किसी कर के उद्ग्रहण, निर्धारण, संग्रहण एवं प्रवर्तन और  अनुच्छेद 31A के तहत  भूमि सुधारों से संबंधित विषयों में अधिकरण स्थापित करने का अधिकार देता है।


प्रशासनिक अधिकरण के कारण –


इसके निम्नलिखित कारण है।
विभिन्न न्यायालयों में लंबित मामलों के निपटारा करने के लिए  विभिन्न विधानों के तहत घरेलू अधिकरणों और अन्य अधिकरणों की स्थापना की जाती है।
न्यायालयों के कार्यभार को कम करनेतथा  निर्णयन में तेज़ी लाने और अधिवक्ताओं और विशेषज्ञों की सेवाओं का लाभ उठाया जा सके ऐसा साधन तैयार करने के लिए इसका निर्माण हुआ।    
अधिकरण न्याय तंत्र में एक महत्त्वपूर्ण और विशिष्ट भूमिका निभाते हैं। वे लंबित मामलों के बोझ से दबे न्यायालयों के बोझ को कम करने हेतु पर्यावरण, सशस्त्र बलों, कराधान और प्रशासनिक मुद्दों से संबंधित विवादों की सुनवाई करते हैं।
प्रशासनिक अधिकरण में राज्य की न्यायिक शक्ति निहित होती है और शुद्ध प्रशासनिक कार्यों से अलग यह अर्द्ध-न्यायिक कार्य करने के लिए इसका निर्माण हुआ।  
प्रशासनिक अधिकरण औचित्य एवं और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों पर कार्य करते है। इसलिए इसका निर्माण किया गया।
इनसे न्यायसंगत, पारदर्शी और निष्पक्ष रूप से कार्य करने के लिए किया गया।
प्रशासनिक अधिकरण नागरिक प्रक्रिया न्यायालय द्वारा निर्धारित प्रक्रिया व साक्ष्य के कठोर नियमों का पालन करने हेतु बाध्य नहीं होते है। इसलिए इसका निर्माण निष्पक्ष न्याय के लिए हुआ।

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अधिकरण और न्यायालय मे अंतर-


प्रशासनिक अधिकरण एक अभिकरण होता है जिसका निर्माण विधि द्वारा किया जाता है औरइसका प्रयोग  न्यायिक शक्ति प्राप्त करने के लिए की जाती है।
न्यायालय एक  पारंपरिक न्यायिक प्रणाली का अंग है जिसके तहत न्यायिक शक्तियाँ राज्य के द्वारा  प्राप्त होती हैं।
अधिकरण को अर्द्ध-न्यायिक निकाय के रूप में भी जाना जाता है। और अधिकरण के पास  विशेष मामलों के परीक्षण की शक्ति होती है तथा जो मामले उन्हें विधि द्वारा प्रदत्त किये जाते हैं।

न्यायालयों के पास नागरिक प्रकृति के सभी मुकदमों का परीक्षण करने की न्यायिक शक्ति होती है।
प्रशासनिक अधिकरण के सदस्यों के कार्यकाल, सेवाओं के नियम व शर्तें पूर्णतः कार्यपालिका (सरकार) के हाथों में होती है।

जयदातर सामान्य न्यायालयों के न्यायाधीश अपने कार्यकाल, सेवा के नियम व शर्तों आदि के संदर्भ में कार्यपालिका से स्वतंत्र होते हैं। और न्यायपालिका कार्यपालिका से स्वतंत्र होती है।
अधिकरण का अध्यक्ष या सदस्य का विधि में प्रशिक्षित होना आवश्यक नहीं होता है। वह प्रशासनिक मामलों के क्षेत्र का विशेषज्ञ भी हो सकता है।

न्यायालय का पीठासीन अधिकारी विधिशास्त्र में प्रशिक्षित होता है।
प्रशासनिक अधिकरण उस विवाद का एक पक्षकार हो सकता है जिस पर उसके द्वारा निर्णय लिया जाना है।
न्यायालय के न्यायाधीश का निष्पक्ष होना आवश्यक होता है।
न्यायालय साक्ष्य और प्रक्रिया के सभी नियमों का पालन करने हेतु बाध्य है।

प्रशासनिक अधिकरण नियमों के बंधन में नहीं है बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत पर कार्य करते है।

प्रशासनिक अधिकरण विभागीय नीति को ध्यान में रखकर प्रश्नों पर विचार करता है। और उसका निर्णय वस्तुपरक के बजाय व्यक्तिपरक भी हो सकता है।
न्यायालय को साक्ष्य और सामग्री के आधार पर सभी प्रश्नों पर वस्तुपरक हो कर  प्रत्यक्ष रूप से विचार करना होता है।

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