भारतीय प्रशासन का विकास कैसे हुआ ?

जैसा की हम सब को पता है की लोकतंत्र का विकास 100 वर्षों का माना जाता है। परंतु यह उतनी ही प्राचीन मानी जाती है जितनी की लोक सभ्यता को माना जाता है। पहले राजनीति भी लोकतंत्र के अनुसार चलती थी। भारतीय लोकतंत्र विरासत और  मे निरंतरता का परिणाम माना जाता है। ऐतिहासिक काल को देखते है तो लोकतंत्र के अनुसार यह प्राचीन काल, गुप्त काल,राजपूत काल,सल्तनत काल,मुगल काल ,ब्रिटिश काल आदि मे बटा हुआ है। हम यह भी कह सकते है की भारतीय लोक प्रशासन का विकास प्राचीन लोकतंत्र के विकास का परिणाम है।

प्राचीन कालीन प्रशासन –

प्राचीन काल मे विभिन्न प्रकार के प्रशासन प्रचलित है। भारतीय प्रशासन सिंधु घाटी से भी अधिक प्राचीन माना गया है। सिंधु घाटी सभ्यता के समय हमारा ज्ञान कल्पना और अनुमान पर निर्धारित रहता है। जो अवशेष खुदाई मे प्राप्त हुए है उनसे विद्वानो ने यह निष्कर्ष निकाला है की हड़प्पा और मोहञ्जोड्डो सुव्यवस्थित थे। पहले पुरोहित लोग शासन करते थे । पहले राज्य केन्द्रीक्रत था और लोग नगरपालिका से अपरचित थे। इनकी शासन व्यवस्था लोकतंत्रात्मक थी।

ऋग्वैदिक काल –

ऋग्वैदिक काल में राजा को जनस्य गोपाया  पुरभेत्ता, विशपति, गणपति और गोपति कहा जाता था। इस काल मे सभा और समिति नामक कबीलाई संगठन कबीले के प्रशासन के लिए उत्तरदायी होती थी। राजा  सभा और समिति की स्वीकृति के बाद ही पदवी ग्रहण करता था। कबीले के प्रशासन व राजा  के चुनाव में सभा और समिति की भूमिका काफी महत्वपूर्ण थी।

आर्य प्रवर्तक होने के कारण यह सभ्यता आर्य सभ्यता भी कही जाती है।  तथा इस काल के बारे में जानकारी के प्रमुख स्रोत वेद हैं अत: इसे वैदिक सभ्यता या वैदिक संस्कृति कहा गया।यह सभ्यता सिंधु घाटी सभ्यता से काफी भिन्न थी । ऋग्वेद में इन्द्र को दास-दस्युओं का नाश करने वाला (दस्यु हन्) कहा गया है। ऋग्वेद में दास – दस्युओं (हड़प्पाई लोग) के पुरों का भी वर्णन देखने को मिलता है । तथा  इन पुरों का विनाश इन्द्र ने किया जिस कारण इन्द्र को पुरंदर कहा गया है।

उत्तर वैदिक काल-

इस काल मे राजा का पद वंशानुगत हो गया था। इसमे राजकीय अधिकारियों की संख्या  सीमित हुआ करती  थी। इसमे  राजा को अपने दायित्व निर्वाह के बदले प्रजा से बलि या कर पाने का अधिकारी माना जाता था। यह राजा को स्वेच्छापूर्वक दिया गया उपहार होता था। राजा को प्रारम्भ में प्रजा से नियमित कर नहीं मिलते थे। अत: इन्द्र से प्रार्थना की गई कि वह राजकर देने के लिए प्रजा को विवश करे।

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इसमे राज्य का आधार कुल थे।  जिन्हें संजाति एवं सनाभि (एक नाभि से उत्पन्न) कहा गया है।  तथा अन्य राष्ट्र के लिए अनाभि या अरण शब्द का प्रयोग हुआ है। इसी के द्वारा  समाज कुल (परिवार), ग्राम, विश्व तथा जन या राष्ट्र के रूप में विभक्त था। यहा पर पुरोहित का महत्त्वपूर्ण स्थान राजा के मंत्रियों में था। उसे राजा का प्रमुख परामर्शदाता माना जाता था । एवं यह धारणा थी कि उसकी प्रार्थना राजा तथा जन की रक्षा करती है।

महाकाव्य काल-

महाकाव्य काल से तात्पर्य  यहा पर रामायण और महाभारत के समय से है ।जो की आज   भारतीय लोक-जीवन में इन दोनों ही ग्रन्थों का अत्यन्त आदरपूर्ण स्थान है । रामायण हमारा आदि-काव्य है जिसकी रचना महर्षि वाल्मीकि ने की थी । महाभारत की रचना वेदव्यास  जी ने की थी । इसमे प्रशासन में पुरोहितों का भी महत्वपूर्ण स्थान होता था । इन विभागों को तीर्थ कहा जाता था ।

 महाकाव्य काल में मुख्य रूप से राजतन्त्र का प्रचलन था । महाभारत में पाँच गणतंत्रात्मक राज्यों का भी उल्लेख मिलता है- अंधक, वृष्णि, यादव, कुकुर तथा भोज ।उस समय सामान्यतः राजतंत्रात्मक सरकार थीं।  किन्तु कुछ लोकतंत्र राज्य भी थे। तब  राजा निरंकुश नहीं था।  उसे न्याय और नैतिकता के सिद्धांतों पर चलना पड़ता था।

उस समय गणतंत्र को  दो भागो मे बाटा गया था । जिसमें  गण (अकेले गणतन्त्र) तथा संघटक (सामूहिक गणतन्त्र)शामिल था ।  गणतन्त्रों के प्रमुखों को “ईश्वर” कहा जाता था। तथा  राज्य के विभिन्न सामंतों का उल्लेख उसमे मिलता है। जैसे-मन्त्रिन् (मंत्री-परिषद के सदस्य), अमात्य, सचिव पार्षद, सहाय, धार्मिक, अर्थकारण इत्यादि।

उस समय एक मंत्री और चार जातियों की सहायता से राजा न्याय का प्रशासन चलाता था। जिसमे स्थानीय पंच व अधिकारी भी अपने स्तर पर न्याय करते थे।
सेना को नियमित ढंग से वेतन दिया जाता था। और  इसके चार भाग थे पैदल, अश्व, हाथी और रथ।  इनके अतिरिक्त परिवहन, जल सेना, गुप्तचर और स्वयंसेवक भी इसके अंग थे जो  धनुष-बाण, तलवार, गदा, भाला, अग्नि अस्त्र, प्रक्षेपास्त्र का प्रयोग युद्ध मे करते थे।
 युद्ध नीति से लड़ा जाता था। जिसमे “चक्रव्यूह’ की रचना की जाती थी।  ‘कृष्ण’ के “सुदर्शन चक्र’ व “विमानों’ का भी उल्लेख इसमे मिलता है।

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मौर्य  साम्राज्य –

  उस समय मौर्य साम्राज्य के प्रशासन का स्वरूप केंद्रीकृत था।  जिसमे अर्थशास्त्र के आधार पर प्रशासन के सभी पहलुओं में राजा का विचार और आदेश सबसे ऊपर  हुआ करता था। चाणक्य के अनुसार राज्य के सात अवयव हैं- राजा, अमात्य, जनपद, दुर्ग, कोष, बल तथा मित्र। इन सप्तांगों में चाणक्य राजा को सर्वोच्च स्थान प्रदान करता है।  तथा शेष को अपने अस्तित्व के लिए राजा पर ही निर्भर बताता है।

इसमे  अशोक के शिलालेखों और अर्थशास्त्र में मंत्रिपरिषद का वर्णन हुआ है।जिसमे  राजा अपने सभी राज कार्यों का संचालन अमात्यों, मंत्रियों तथा अधिकारियों के द्वारा करता था। इसमे अमात्य एक सामान्य पदनाम था जिससे राज्य के सभी पदाधिकारियों का ज्ञान होता था। प्रशासन के मुख्य अधिकारियों का चुनाव राजा इन अमात्यों की सहायता से ही करता था।

इसमे मौर्य राजाओं ने सेना बहुत संगठित और बड़े आकार में व्यवस्थित की थी। चाणक्य ने ’चतुरंगबल’ (पैदल सैनिक, घुड़सवार सेना, हाथी और युद्ध रथ) को सेना का प्रमुख भाग बताया है।इसमे राजा की सहायता करने के लिए  गुप्तचर प्रणाली का गठन किया गया था। गुप्तचरों में स्त्री तथा पुरुष दोनों शामिल  होते थे और वह  भेष बदलकर कार्य करते थे।  जैसे-संन्यासी, छात्र, व्यापारी इत्यादि।

 राजा न्याय का भी सर्वोच्च अधिकारी होता था। अर्थशास्त्र में दो तरह के न्यायालयों की चर्चा की गई है-धर्मस्थीय तथा कंटकशोधन। इसमे जनपद और गांव के प्रशासन नागरिक के  आधार पर होते थे । और इसमें कई गाँवों के संगठन होते थे।  किन्तु साथ ही साथ हर ग्राम की अपनी अलग प्रशासनिक व्यवस्था थी।

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मुगल प्रशासन –

इसने प्रसशन को नई दिशा दी है। इसमे बादशाह सभी का शीर्ष होता था वह सैनिक तथा असैनिक सभी को नियंत्रित करता था। इसमे राजा किसी अन्य व्यक्ति पर सत्ता के अधीन नही होता था वह खुद ही सभी धार्मिक निर्णय लेता था। मुगल सम्राट बाबर ने प्रांतीय समाज की स्थापना किया था । उससे पहले काही भी प्रांतीय समाज की स्थापना नही हुई थी।

प्रांत का विभाजन सरकार मे होता था । सरकार के अनुसार इसमे कई विभाग थे। इसमे सबसे निचले स्थान पर गांव होता था जिसके अधिकारी पटवारी हुआ करते थे।

ब्रिटिश प्रशासन –

ब्रिटिश प्रशासकों एवं राजनीतिज्ञों में दो विचारधाराएँ प्रचलित हुई। जिसमे शिक्षित एवं योग्य भारतीयों को प्रशासन संचालन में भाग लेने का अवसर  दिया गया क्योंकि ऐसा न करने से ब्रिटिश साम्राज्य के अस्तित्व को पुनः खतरा उत्पन्न हो सकता है। इस नीति को उदारवादी नीति कहा गया। भारतीय प्रशासन के विभिन्न ढांचागत और कार्यप्रणाली गीत, जैसे- सचिवालय प्रणाली, अखिल भारतीय सेवाएँ, भर्ती, प्रशिक्षण, कार्यालय पद्धति, स्थानीय प्रशासन, जिला प्रशासन, बजट प्रणाली, लेखा परीक्षा, केंद्रीय करों की प्रवृत्ति, पुलिस प्रशासन, राजस्व प्रशासन यह सब ब्रिटिश शासन का ही हिस्सा है। ब्रिटिश शासन के दौरान संविधान में हुए परिवर्तनों की कई घटनाएं हुई जो संविधान की नींव बनी।

ब्रिटिश सरकार द्वारा भारत मेँ ईस्ट इंडिया कंपनी के कार्यों को नियंत्रित करने और नियमित करने की दिशा मेँ उठाया गया यह पहला कदम था। इसके फलस्वरूप केंद्रीय प्रशासन की नींव में निम्नलिखित 3 महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए।

इस अधिनियम ने बंगाल के गवर्नर को, बंगाल के गवर्नर जनरल का पद दिया। प्रथम गवर्नर जनरल होने का श्रेय लार्ड वारेन हेस्टिंग्स को मिला।
उसने मुंबई और मद्रास के गवर्नरों को बंगाल के गवर्नर जनरल के अधीन कर दिया।
उसने कोलकाता मेँ शीर्ष न्यायालय के रूप मेँ सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की।
इसके द्वारा ही पुलिस प्रशासन और वित्तीय प्रशासन और केंद्रीय सचिवालय का विकास हुआ।

तथा इसके बाद ही भारत मे संविधान का विकास प्रारम्भ हो गया। 

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