भारत का संविधान अनुच्छेद 180 से 185 तक

Constitution of India Article 180 to 185- Hindi Law Notes

जैसा की आप सबको पता ही है कि भारत का संविधान अनुच्छेद 175 से लेकर के 179 तक हम पहले ही वर्णन कर चुके हैं। इस पोस्ट पर हम भारत का संविधान अनुच्छेद 180 से लेकर के 185 तक आप को बताएंगे अगर आपने इससे पहले के अनुच्छेद नहीं पढ़े हैं तो आप सबसे पहले उन्हें पढ़ ले जिससे कि आपको आगे के अनुच्छेद पढ़ने में आसानी होगी।

अनुच्छेद 180

 अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति को बताया गया हैं।

(1) जब अध्यक्ष का पद रिक्त है तो उपाध्यक्ष, या यदि उपाध्यक्ष का पद भी रिक्त है तो विधानसभा का ऐसा सदस्य, जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा।

(2) विधानसभा की किसी बैठक से अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति, जो विधानसभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति, जो विधानसभा द्वारा अवधारित किया जाएअध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा।

अनुच्छेद 180 

 अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन

संविधान के अनुच्छेद 180 के अंतर्गत विधानसभा अध्यक्ष के रूप में कार्य करने अथवा उसके दायित्त्वों का निर्वाह करने की उपाध्यक्ष या किसी अन्य व्यक्ति की शक्तियों का उल्लेख किया गया है।

अध्यक्ष की भूमिका

सदन का अध्यक्ष सदन का प्रधान प्रवक्ता होता है और सदन में सामूहिक मत का प्रतिनिधित्व करता है।

दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता के मामलों सहित सभी संसदीय मामलों में अध्यक्ष का निर्णय अंतिम और बाध्यकारी होता है, जिसे सामान्यतः न्यायालय के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती है।

इस प्रकार अध्यक्ष सदन में मध्यस्थ के रूप में भी कार्य करता है।

अध्यक्ष सदन की कार्यवाही को सुचारु रूप से चलाने और उसे विनियमित करने के लिये सदन में व्यवस्था और शिष्टाचार बनाए रखने का कार्य भी करता है।

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अध्यक्ष को बहस के लिये अवधि आवंटित करने और सदन के सदस्यों को अनुशासित करने का अधिकार है। साथ ही वह सदन की विभिन्न समितियों द्वारा लिये गए निर्णयों को भी रद्द कर सकता है।

सदन का अध्यक्ष सदन के कामकाज से संबंधित नियमों का अंतिम व्याख्याकार भी होता है।

अनुच्छेद 181

जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना

(1) विधानसभा की किसी बैठक में, जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब अध्यक्ष, या जब उपाध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उपाध्यक्ष, उपस्थित रहने पर भी, पीठासीन नहीं होगा और अनुच्छेद 180 के खंड (2) के उपबंध ऐसी प्रत्येक बैठक के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वह उस बैठक के संबंध में लागू होते हैं जिससे, यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अनुपस्थित है।

(2) जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विधानसभा में विचाराधीन है तब उसको विधानसभा में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा और वह अनुच्छेद 189 में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे संकल्प पर या ऐसी कार्यवाहियों के दौरान किसी अन्य विषय पर प्रथमतथ ही मत देने का हकदार होगा किंतु मत बराबर होने की दशा में मत देने का हकदार नहीं होगा।

अनुच्छेद 181 : जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन न होना

अनुच्छेद 181 (विधानसभा से संबंधित) के अनुसार, यदि सदन के अध्यक्ष को पद से हटाने से संबंधित कोई प्रस्ताव विचाराधीन हो तो वह सदन की अध्यक्षता नहीं कर सकता।

अनुच्छेद 182

विधान परिषद का सभापति और उपसभापति

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विधान परिषद वाले प्रत्येक राज्य की विधान परिषद, यथाशीघ्र, अपने दो सदस्यों को अपना सभापति और उपसभापति चुनेगी और जब-जब सभापति या उपसभापति का पद रिक्त होता है तब-तब परिषद किसी अन्य सदस्य को, यथास्थिति, सभापति या उपसभापति चुनेगी।

अनुच्छेद 183

 अध्यक्ष और उपसभापति का अवकाश और त्यागपत्र, और पद से हटाना —

विधान परिषद के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में पद धारण करने वाला सदस्य

(ए) यदि वह परिषद का सदस्य नहीं रहता है तो अपना पद खाली कर देगा;

(बी) किसी भी समय अपने हस्ताक्षर के तहत लिखित द्वारा, यदि ऐसा सदस्य अध्यक्ष है, उपाध्यक्ष को संबोधित कर सकता है, और यदि ऐसा सदस्य उपाध्यक्ष है, तो अध्यक्ष को अपना पद त्याग सकता है; तथा

(सी) परिषद के सभी तत्कालीन सदस्यों के बहुमत से पारित परिषद के एक प्रस्ताव द्वारा अपने पद से हटाया जा सकता है: बशर्ते कि खंड (सी) के उद्देश्य के लिए कोई भी प्रस्ताव तब तक पेश नहीं किया जाएगा जब तक कि कम से कम चौदह दिन का नोटिस न हो प्रस्ताव पेश करने की मंशा से दिया गया है।

अनुच्छेद 184

सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति

(1) जब सभापति का पद रिक्त है तब उपसभापति, यदि उपसभापति का पद भी रिक्त है तो विधान परिषद का ऐसा सदस्य, जिसको राज्यपाल इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे, उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा।

(2) विधान परिषद की किसी बैठक से सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति, या यदि वह भी अनुपस्थित है तो ऐसा व्यक्ति, जो विधान परिषद की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए, या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति, जो विधान परिषद द्वारा अवधारित किया जाए, सभापति के रूप में कार्य करेगा।

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अनुच्छेद 185

  अध्यक्ष या उपसभापति को पद से हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन होने के दौरान अध्यक्षता नहीं करना बताया गया है।

(1) विधान परिषद् की किसी बैठक में, जब सभापति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब सभापति, या जब उपसभापति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उपसभापति, उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा और अनुच्छेद 184 के खंड (2) के उपबंध ऐसी प्रत्येक बैठक के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस बैठक के संबंध में लागू होते हैं जिससे, यथास्थिति, सभापति या उपसभापति अनुपस्थित है।

(2) सभापति को विधान परिषद में बोलने और अन्यथा उजब सभापति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विधान परिषद् में विचाराधीन है तब उसको विधान परिषद् में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा और वह अनुच्छेद 189 में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे संकल्प पर या ऐसी कार्यवाहियों के दौरान किसी अन्य विषय पर प्रथमतः ही मत देने का हकदार होगा किन्तु मत बराबर होने की दशा में मत देने का हकदार नहीं होगा।

अनुच्छेद 185 के अनुसार,सभापति के पद से हटाने का कोई संकल्प परिषद में विचाराधीन है तो विधान परिषद में बोलने और अन्यथा उसकी कार्यवाही में भाग लेने का अधिकार होगा। मत बराबर (निर्णायक मत) होने की दशा में मत देने का हकदार नहीं होगा।

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