दण्ड प्रक्रिया संहिता धारा 99 से 102 तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे दंड प्रक्रिया संहिता धारा 98 तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने मे आसानी होगी।

धारा 99-

इस धारा के अनुसार कोई व्यक्ति यदि कोई कार्य जिससे मॄत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होतीहै। तो वह सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक द्वारा किया जाता है । या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है तो उस कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है। तब वह चाहे वह कार्य विधि के अनुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो ।

कोई ऐसा कार्य जिससे मॄत्यु या घोर उपहति की आशंका युक्तियुक्त रूप से कारित नहीं होतीहै। तो वह सद्भावपूर्वक अपने पदाभास में कार्य करते हुए लोक सेवक के निदेश से किया जाता है। या किए जाने का प्रयत्न किया जाता है। तो उस कार्य विरुद्ध यदि प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है। चाहे वह निदेश विधिअ नुसार सर्वथा न्यायानुमत न भी हो ।

ऐसे दशाओ मे जिनमें संरक्षा के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त करने के लिए समय है। जिसमे प्राइवेट प्रतिरक्षा का कोई अधिकार नहीं है ।

इस अधिकार के प्रयोग का विस्तार यदि किसी दशा में भी प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार उतनी अपहानि से अधिक अपहानि करने पर नहीं हैं। जितनी प्रतिरक्षा के प्रयोजन से करनी आवश्यक है ।

यदि कोई व्यक्ति किसी लोक सेवा द्वारा ऐसे लोक सेवक के नाते किए गए या किए जाने के लिए प्रयतित कार्य के विरुद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार के वंचित नहीं होताहै।या फिर वह जानता है की वह विश्वास करने का कारण न रखता हो। कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसा लोक सेवक है ।

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यदि कोई व्यक्ति किसी लोक सेवक के निदेश से किए गए या किए जाने के लिए प्रयतित किसी कार्य के वरिद्ध प्राइवेट प्रतिरक्षा के अधिकार से वंचित नहीं होताहै। तो जब तक कि वह यह न जानता हो या विश्वास करने का कारण न रखता हो कि उस कार्य को करने वाला व्यक्ति ऐसे निदेश से कार्य कर रहा है। जब तक कि वह व्यक्ति उस प्राधिकार का कथन न कर दे जिसके अधीन वह कार्य कर रहा है। या यदि उसके पास लिखित प्राधिकार है। तो जब तक कि वह ऐसे प्राधिकार को मांगे जाने पर पेश न कर दे ।

धारा100 –

इस धारा के अनुसार शरीर की प्रतिरक्षा संबन्धित शरीर की निजी प्रतिरक्षा के अधिकार का विस्तार और उसकी धारा में वर्णित बंधनों के अधीन रहते हुए यदि हमलावर की स्वेच्छा पूर्वक मॄत्यु कारित करने या कोई अन्य क्षति कारित करने तक है। या फिर यदि ऐसा अपराध जिसके कारण उस अधिकार के प्रयोग का अवसर आता है। तो उस प्रकार से किसी भी प्रकार के अनुसार –

ऐसा कोई हमला जिससे यह सिद्ध होता है की उसके रूप से यह आशंका कारित हो कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम मॄत्यु होगा।

ऐसा एक हमला जिससे यथोचित रूप से आशंका जाहीर होती है कि अन्यथा ऐसे हमले का परिणाम घोर क्षति होगा।

बलात्संग करने के आशय से किया गया हमला।

प्रकॄतिके विरुद्ध कोई कार्य कामतॄष्णा की तॄप्ति के आशय से किया गया हमला।

व्यपहरण या अपहरण करने के आशय से किया गया हमला।

इस आशय से किया गया हमला कि किसी व्यक्ति का ऐसी परिस्थितियों में अनुचित रूप से प्रतिबंधित किया जाए। जिनसे उसे यथोचित रूप से यह आशंका कारित हो कि वह अपने को छुड़वाने के लिए लोक प्राधिकारियों की सहायता प्राप्त नहीं कर सकेगा।

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धारा 101-

इस धारा के अनुसार अधिकारिता के परे तलाशी में पाई गई चीजों का वर्णन किया गया है।
इसके अनुसार जब तलाशी-वारंट को किसी ऐसे स्थान में निष्पादित करने में जिसमे उस न्यायालय की जिसने उसे जारी किया है। यदि स्थानीय अधिकारिता से परे है तो उन चीजों में से जिनके लिए तलाशी ली गई है। यदि कोई ऐसे चीज जो उपलभ्ध हो इसमें इसके पश्चात् अंतर्विष्ट उपबंधों के अधीन तैयार की गई। उनकी सूची उस न्यायालय के समक्ष जिसने वारंट जारी किया था ।

और उसको तुरंतप्रस्तुत की जाएगी । किंतु यदि बह् स्थान ऐसे न्यायालय की अपेक्षा उस मजिस्ट्रेट के अधिक समीप है। जो वहां अधिकारिता रखता है। तो सूची और चीजें उस मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी। और जब तक तत्प्रतिकूल अच्छा कारण न हो वह मजिस्ट्रेट उन्हें ऐसे न्यायालय के पास ले जाने के लिए प्राधिकृत करने का आदेश देगा।

धारा 102-

इस धारा के अनुसार एक पुलिस अधिकारी द्वारा किसी ऐसी संपत्ति को अभिगृहीत किया जा सकता है। जिसमे यह अभिकथन या संदेह है कि वह चुराई हुई है,। अथवा या फिर वह ऐसे संपत्ति है जिनसे किसी अपराध के किए जाने का संदेह हो। इस धारा मे यह कहा गया है की जहाँ अभिगृहीत संपत्ति ऐसी है कि वह आशनी से न्यायालय में नहीं लाई जा सकती है। या जहाँ ऐसी संपत्ति की अभिरक्षा के लिए उचित स्थान प्राप्त करने में कठिनाई है।

या फिर जहाँ अन्वेषण के प्रयोजन के लिए संपत्ति को पुलिस अभिरक्षा में निरंतर रखा जाना आवश्यक नहीं समझा जाता है। तो वहां वह पुलिस अधिकारी उस संपत्ति को किसी ऐसे व्यक्ति की अभिरक्षा में देगा जो यह वचनबंध करते हुए बंधपत्र निष्पादित करता है कि वह संपत्ति को जब कभी अपेक्षा की जाए तब न्यायालय के समक्ष पेश करेगा और उसके व्ययन की बाबत न्यायालय के अतिरिक्त आदेशों का पालन करेगा

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वही सुप्रीम कोर्ट के अनुसार पुलिस के पास जांच के दौरान अचल संपत्ति को जब्त करने की कोई शक्ति नहीं दी जाती है। इस धारा के बताया गया है की पुलिस अधिकारी को कोई संपत्ति जब्त करने की शक्ति में अचल संपत्ति को कुर्क, जब्त या सील करने की शक्ति शामिल नहीं होती है।

इसका उदाहरण निम्न है।
नेवादा प्रॉपर्टीज प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाराष्ट्र राज्य 2019 के वाद मे न्यायालय ने यह तय किया था कि पुलिस के पास आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 102 के तहत अन्वेषण के दौरान ‘अचल संपत्ति’ को ज़ब्त करने की शक्ति नहीं है।

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