दण्ड प्रक्रिया संहिता धारा 111 से 116 तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 110   तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 111

इस धारा के अनुसार बल्वा, अश्लीलता फैलाने वाला व्यक्तिऔर  संदिग्ध व्यक्ति या आदतन अपराधी को कार्यपालक मजिस्ट्रेट इस धारा के अंतर्गत एक आदेश देना होता है जिसमे  जमानत बन्ध-पत्र के लिएआदेश दिया जाता है और इस  आदेश में सभी जानकारी संक्षिप्त रूप में लिखी जाती है।  अर्थात कितनी रकम उसमे लिखना है।

कितना समय तक जमानत बन्ध-पत्र न्यायालय में जमा रहेगा।  एवं कितने जमानतदार की आवश्यकता होगी आदिइसमे शामिल है।  जिसके अनुसार प्रत्येक वारंट या समन में इस धारा के  प्रति साथ संलग्न रहना चाहिए और यह  प्रति उस अधिकारी द्वारा प्रदत्त किया जाना चाहिए जो समन या वारंट जारी करता है।  तथा उस व्यक्ति को प्रदत्त करना चाहिए अथवा उस व्यक्ति को हिरासत में लेना चाहिए जो उसका अभियुक्त है।

इस धारा के अनुसार जब कोई मजिस्ट्रेट जो धारा 107, धारा 108, धारा 109 या धारा 110 के अधीन कार्य कर रहा होता है। तो उसके लिए  यह आवश्यक  है कि किसी व्यक्ति से अपेक्षा की जाए कि वह उस धारा के अधीन कारण और बताए  तब वह मजिस्ट्रेट प्राप्त सूचना  का सार उस बंधपत्र की रकम आदि  जो निष्पादित किया जाना है।  वह अवधि जिसके लिए वह प्रवर्तन में रहेगा और प्रतिभुओं की (यदि कोई हो) अपेक्षित संख्या और  प्रकार और वर्ग बताते हुए लिखित आदेश देगा।

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धारा 112

इस धारा के अनुसार न्यायालय में उपस्थित व्यक्ति के बारे में की गयी  प्रक्रिया को बताया गया है।
यदि वह व्यक्ति जिसके बारे में ऐसा आदेश दिया जाता है। कि यदि  न्यायालय में उपस्थित है तो वह उसे पढ़कर सुनाया जाएगा या यदि वह ऐसा चाहे तो उसका सार उसे समझाया जाएगा।इस धारा के अंतर्गत न्यायालय के अधिकारी का यह कर्तव्य होगा कि वह सम्पूर्ण सार को सरल भाषा में व्यक्ति को समझाए।

धारा 113

इस धारा के अनुसार परिशांति बनाए रखने के लिए निष्पादित किए जाने वाले बंधपत्र की प्रक्रिया को बताया गया है।

इस धारा के अनुसार इसमे ऐसे व्यक्ति के संबंध में उल्लेख किया गया है।  जो व्यक्ति न्यायालय में उपस्थित नहीं है । और उससे प्रतिभूति सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित किए जाने का आदेश दिया गया है।  तो न्यायालय ऐसे व्यक्ति को न्यायालय में उपस्थित होने की अपेक्षा करते हुए समन या  फिर यदि वह किसी अधिकारी की अभिरक्षा में है।  तो उस अधिकारी को न्यायालय के समक्ष लाने का निर्देश देते हुए वारंट जारी किया जा सकता है।

इस धारा के अनुसार सामान्य वारंट जारी किए जाने के लिए धारा 111 के अधीन आदेश जारी किया जाना इसकी पहली  शर्त है। और जब धारा 111 के अंतर्गत आदेश जारी कर दिया जाता है।  तो उससे  ही संबंधित व्यक्ति को धारा 113 के अंतर्गत समन या वारंट जारी करके न्यायालय में उपस्थित होने की अपेक्षा की जाती है। पहले आदेश जारी करना होगा फिर ही समन या वारंट जारी किया जाता है।

उदाहरण-
मोहनलाल बनाम राज्य 1977 इलाहाबाद –

इस वाद मे यह कहा गया है  कि यदि संबंधित व्यक्ति पहले से ही अभिरक्षा में है । तो उस अधिकारी जिसकी अभिरक्षा में वह व्यक्ति है। उस   संबंधित व्यक्ति को न्यायालय में उपस्थित करने के लिए निर्देशित करते हुए वारंट जारी किया जा सकता है।इसके अनुसार  धारा 111 में लिखित आदेश जारी किए बिना ही धारा 113 के अधीन सामान्य वारंट जारी किया जाता है।  तो यह कार्य इस धारा 113 में वर्णित आज्ञापक उपबंधों का उलंघन होगा।

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धारा 114

इस धारा के अनुसार समन या वारंट के साथ आदेश की प्रति  भी होगी यह बताया गया है।
इसके अनुसार धारा 113 के अधीन जारी किए गए प्रत्येक समन या वारंट के साथ  आदेश की प्रति होगी और उस समन या वारंट की तामील या निष्पादन करने वाला अधिकारी उस  प्रति उस व्यक्ति को परिदत्त करेगा जिस पर उसकी तामील की गई है।  या जो उसके अधीन गिरफ्तार किया गया है।

धारा 115

इस धारा के अनुसार वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति देने की शक्ति को बताया गया है। इस धारा के अनुसार  यदि कोई  मजिस्ट्रेट जिसको पर्याप्त कारण दिखाई देता है।  तो वह ऐसे किसी व्यक्ति को जिससे इस बात का कारण दर्शित करने की अपेक्षा की गई है । कि उसे परिशांति कायम रखने या सदाचार के लिए बंधपत्र निष्पादित करने के लिए आदेश क्यों न दिया जाए उसको  वैयक्तिक हाजिरी से अभिमुक्ति दे सकता है।  और प्लीडर द्वारा हाजिर होने की अनुज्ञा दे सकता है।

धारा 116

इस धारा के अनुसार किसी व्यक्ति द्वारा किसी अन्य व्यक्ति को पाबंद करवाया जा सकता है। इस धारा के अनुसार किसी व्यक्ति को किसी अन्य व्यक्ति से अगर कोई ऐसी आशंका है । कि वह उससे झगड़ा करने को उतारू हो रहा है।  या उससे कभी झगड़ा कर सकता है या झगड़े करने  का दावा करता है या करने वाला है ।

तो ऐसे व्यक्ति को धारा  116 के अंतर्गत कार्यपालक मजिस्ट्रेट द्वारा पाबंद करवाया जा सकता है । इस धारा के अनुसार  जब किसी व्यक्ति को पाबंद किया जाता है।  तो न्यायिक मजिस्ट्रेट के समक्ष नहीं प्रस्तुत किया जाता बल्कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट इस मामले की सुनवाई करते हैं । और यदि उन्हे लगता है या वो उचित समझते है तो वहां से व्यक्ति को जमानत पर छोड़ दिया जाता है। अगर इस धारा  में किसी को पाबंद किया जाता है तो उसकी समय अवधि 6 माह होती है।

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