वर्किंग कैपिटल यानी की कार्यशील पूंजी क्या होता है? वर्किंग कैपिटल साइकल क्या होता है?

किसी भी बिज़नस को चलाने के लिए हमे पूंजी की आवश्यकता होती है। और उनही Daily business operations के लिए जैसे कच्चे माल की खरीद से लेकर उसकी बिक्री तक सभी कार्य करने हेतु बहुत सारे धन की जरूरत पड़ती है।  और ऐसे ही कार्य को करने  के लिए Working Capital बहुत ही महत्वपूर्ण हो जाती है।

वर्किंग कैपिटल फॉर्मूला-

Working Capital= Current Assets —- Current Liabilities.

कार्यशील पूंजी = वर्तमान संपत्ति – वर्तमान देयताएं

किसी भी बिज़नस में  या किसी भी प्रकार का व्यापार शुरू करने से पहले पुरे वित्त यानि की धन पूंजी  की जानकारी लेनी पड़ती है।  यदि आप day to day business operations के लिए fपूंजी का प्रबंधन नहीं कर सकते है तो आप कभी भी व्यापार में सफल नहीं हो सकते हैं। वर्किंग कैपिटल यानि की कार्यशील पूंजी management के बिना  यह नही हो सकता है की creditors आपका पीछा ना छोड़े।

वर्किंग कैपिटल   यानी की कार्यशील पूंजी प्रबंधन के माध्यम से वित्त प्रबंधक वर्तमान परिसंपत्तियों तथा  वर्तमान देनदारियों का प्रबंधन करने और उन दोनों के बीच मौजूद अंतर संबंधों का मूल्यांकन करने की कोशिश करता है। तथा  यानी इसमें फर्म की अल्पकालिक संपत्तियों और अल्पकालिक देनदारियों के बीच संबंध  इसमे शामिल होता है।

कोई भी  व्यापर छोटा है या बड़ा नही होता है। या Working capital केवल बड़े व्यापार के लिए ही जरुरी होता हैयह आवश्यक नही है। यदि आप कोई व्यापार में संलग्न हैं या भविष्य में कोई व्यापार करना चाहते हैं तो इसकी महत्व को समझें यह किसी भी व्यापार के लिए चाहे वो छोटा हो या बड़ा हो बेहद महत्वपूर्ण है।

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कार्यशील पूंजी प्रबंधन का उद्देश्य वर्तमान परिसंपत्तियों और वर्तमान देनदारियों की मात्रा को तय करना होता है।  ताकि अल्पकालिक तरलता को अधिकतम किया जा सके।तथा  कार्यशील पूंजी के प्रबंधन में नकदी के रूप में प्राप्य सूची, लेखा प्राप्य और देय प्रबंधन आदि को  शामिल किया जा सकता हैं।

किसी भी व्यापार के दैनिक कार्यों को सुचारु रूप से चलने के लिए जिस पूंजी की आवश्यकता होती है उसे ही हम वर्किंग कैपिटल  यानि की कार्यशील पूंजी के नाम से जानते हैं। इतना ही नहीं की केवल व्यापार के दैनिक कार्यों को ही सुचारू रूप से चलाने के लिए नही  बल्कि व्यापार के विस्तार करने के लिए भी वर्किंग कैपिटल  यानि की कार्यशील पूंजी हमारे व्यापार में प्रयाप्त मात्रा में होना चाहिये।

वर्किंग कैपिटल साइकिल-

वर्किंग कैपिटल यानि की कार्यशील पूंजी को अच्छे से समझने के लिए हमे वर्किंग कैपिटल साइकिल को समझना पड़ेगा। इसे कैश साइकल  भी कहते हैं। इसमे  किसी भी तरह का प्रॉडक्शन  की शुरुआत कच्चे माल की खरीद के साथ शुरू होती है। तथा  जिसके लिए आपको धन  की जरूरत पड़ेगी।

उसके बाद उत्पादन का कार्य सुरू  होता है जिसे हम work in progress के नाम से भी जानते हैं। उत्पादन जब हो जाता है तो उसे हम finished goods कहते हैं और उसके बाद sales का कार्य शुरू होता है।

तथा जब  हम उत्पादित माल को बेचते है यानि की सेल  करते हैं तो पैसा हमे तुरंत नहीं मिलता है, इसका कुछ टाइम पीरियड होता है उसके बाद ही हमें cash प्राप्त होगा।

तो cash से लेकर cash मिलने तक का पुरे process को ही वर्किंग कैपिटल साइकिल कहते हैं। अब ध्यान देने वाली बात यह है की cash से लेकर cash मिलने तक का पुरे process के बीच जो खर्चे होंगे उसकी पूर्ति भी इसी से होता है। जिसको हम कैश कनवर्जन साइकिल भी कहते है।

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 कैश कन्वर्जन साइकिल को अगर हम उदाहरण के द्वारा समझे तो इस प्रकार है।  एक रेडी मेड कपड़ों का डीलर है जो कई करघे (looms) से कपड़े इकट्ठा करता है। तथा वह करघे से कपास खरीदता है और उसकी रंगाई करता है।  रंगाई के बाद बुनाई करता है तथा फिर  वह कपड़ों के निर्माताओं के लिए उधारी पर कपड़े बेचता है।

यदि आप इस  रेडी मेड कपड़ा डीलर के लिए एक बैलेंस शीट तैयार करते हैं।  तो आप देखते है की  current assets के तहत कन्वर्जन साइकिल की शुरुआत में कुछ राशि जो अधूरी वस्तुओं और तैयार माल की सुचि दिखेगी जिसे वर्तमान संपत्ति कहा जा सकता है। तथा  सामान को बेचने और ग्राहकों के भुगतान के बाद फर्म को नकद प्राप्त होता है।

इससे  साबित होता है  कि प्रोडक्शन के दौरान वर्किंग कैपिटल के घटक बदल सकते हैं लेकिन नेट वर्किंग कैपिटल एक समान रहता है।

इसको आप इस प्रकार भी समझ सकते है।

 कच्चे माल  की खरीद के द्वारा फर्म प्रोडक्शन साइकिल शुरू होता है। तथा  प्रोडक्शन साइकिल कच्चे माल का तुरंत भुगतान नहीं करता है। जो  देरी  होती है उसको को ‘खाता देय अवधि’ कहा जाता है।

 फर्म फिर कच्चे माल  को अंतिम उत्पाद में बदलता है और इसे बिक्री पर लगाता है। और फिर कच्चे माल और उन्हें बिक्री पर रखने के बीच की अवधि को ‘इन्वेंटरी पीरियड’ कहा जाता है।

  फर्म फिर उन वस्तुओं की बिक्री कर लाभ  प्राप्त करता है। और धन प्राप्त करता था।  ग्राहकों को बिक्री से लेकर धन प्राप्त करने के बीच की अवधि को “खाता प्राप्य ‘अवधि  कहा जाता है। और   इसलिए कच्चे माल  की खरीद और ग्राहकों से भुगतान की प्राप्ति के बीच कुल लगा समय खाता प्राप्य ‘अवधि और सूची अवधि का जोड़ कहा जाता है।

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अर्थात कच्चे माल से तैयार माल बनाकर बेचने से पैसा प्राप्त करने तक की प्रक्रिया को वर्किंग कैपिटल साइकिल कहा जाता है।

Working Capital = Current Assets – Current Liabilities होता है।

जिसमे यहाँ पर CURRENT ASSET (करंट एसेट) से मतलब होता है – CASH, BANK BALANCE, ग्राहकों से प्राप्त होने वाली बकाया राशि, बिकने से बचे हुए माल का स्टॉक, और तैयार माल आदि शामिल होता है।

 CURRENT LIABILITIES (करेंट लाईबिलितिज ) से मतलब यहां पर  – SUPPLIER और अन्य लोगों को दी जाने वाली बकाया राशि, लोन, आदि होती है।

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