प्रशासकीय कानून विकास (Development of Administrative Law) के कारण क्या है । तथा इसकी आलोचना भी बताये।

Developement of Administrative Law- Hindi Law Notes

सभी क्षेत्र में प्रशासनिक कानूनों की संख्या निरंतर बढ रही है । यद्यपि इसका अस्तित्व और महत्व प्राचीनकाल से चलता आ रहा है। परंतु  जहां अधिकारियों को राजाज्ञा द्वारा उनके अधिकारोंऔर  दायित्वों से संबंधित ‘विवेक’ सौंपा जाता था। अब   आधुनिक युग की जटिलताओं ने इसे सरकार में अत्यन्त आवश्यक प्रकार्य बना दिया है । इसके अद्‌भूत विकास का उदाहरण अब देखने को मिलता है जो समय समय पर परिवर्तित होता रहता है।

प्रशासकीय कानून विकास के निम्न  कारण (Development of Administrative Law) हो सकते है।

1. औद्योगिक क्रांति-

जहा एक ओर  औद्योगिक क्रांति आने से समाज का विकास हुआ वही पर  नमूनों को मेट करने की एक नई विधि की कोशिश की गयी और फिर अपनी संतानों को प्रजातियों की बेहतर बनाने के लिए सभी  ने अपने व्यवसाय और प्रशासनिक कौशल को व्यापक समामेलन और उनके सामान्य चलन में सुधार लाने के की कोसिस की जिससे औद्योगिक क्रांति ने राज्य को सामाजिक और आर्थिक जीवन में नागरिक कल्याण हेतु अत्यधिक हस्तक्षेप के लिए बाध्य किया । इन चुनौतियों से निपटने हेतु प्रशासन को अनेक स्वविवेकीय शक्तियो का विकास करना पड़ा जिससे  प्रशासकीय विधि का अत्यधिक विस्तार हुआ और हो रहा हैं ।

2. शीघ्रगामी कार्य करने की शक्ति-

प्रशासनिक कानून की व्याख्याकरके  उनको लागू करने वाले न्यायाधिकरणों की कार्य विधि सामान्य न्यायालयों की तुलना में अधिक शीघ्रगामी होती हैं ।जिससे व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने मे मदद मिलती है।

3. लोचदार-

सामान्य न्यायालयों केतुलना मे प्रशासकीय न्यायालय और अधिकारी स्थानीय परिस्थितियों से अधिक अच्छे सें अवगत होते है तथा उसके अनुसार निर्णयलेने  की भी स्वतन्त्रता उन्हें होती है । इस लोचशीलता ने प्रशासकीय विधि को अधिक लोकप्रिय बनाया हैं।

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4. विशेषज्ञों तथा वैज्ञानिकों का सहयोग-

प्रशासन को अनेक वैज्ञानिक और तकनीक प्रकृति के कार्यों का नियमन करना होता है । कुछ विवाद ऐसे होते है जिनके लिए तकनीक का ज्ञान आवश्यक होता है। प्रशासकीय विधि के तहत इनका निर्णय नियमन विशेषज्ञों को सौंपकर उनका अच्छा प्रबन्धन या निपटारा किया जा सकता है।  जो सामान्य न्यायालयों में संभव नहीं होता ।

5. प्रयोगात्मक व्यवहारिक विधि-

प्रशासकीय विधि जड़ नहीं होती है । और उसे लागू करके परिणाम देखा जाता है  और उसमेंसमय समय पर  सुधारतथा  संशोधन होते रहते हैं ।जिससे यह व्योहारिक विधि बन सके।यह समय समय पर जब जरूरत होती है अपने नीतियो मे परिवर्तन लाता है।

6. स्वविवेकीय छूट समय की जरूरत-

लोक प्रशासन में अधिकारियों को अपने कर्तव्यों दायित्वों के उचित संपादन हेतु स्वाववेकीय शक्तियाँ देना आवश्यक होता है।  ताकि वह समय पर इसका उपयोग कर सके जहा पर समान्य विधि कार्य नही कर पा रही हो , वहाँ वे अपने स्वविवेक से समस्या का उचित समाधान कर सके ।यह विकास के लिए कुछ कार्यक्रम बनाता है और उसको लागू भी करता है।

7. प्रशासन की निरंकुशता पर रोक-

जहाँ एक तरफ प्रशासनिक विधि अधिकारियों को विवेक की शक्ति सौंपती है।  वही उसकी सीमा का भी निर्धारण करती है।  ताकि इस विवेक का मनमाना या जन विरूद्ध प्रयोग न हो सके ।इससे प्रशासन की निरंकुशता पर रोक लग सकती है। यह जनसहभागिता को बढ़वा देता है और किसी भी विधि का विकास जन साधारण को ध्यान मे रख कर के की जाती है।

8. व्यापक हितों की पूर्ति-

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प्रशासनिक कानून का उद्देश्य सामाजिक हितों की पूर्ति होता है । वह जनता के लिए कार्य करता है और जनहित के लिए ही नियम बनाता है और उसको लागू करता है। वह न तो प्रशासनिक अधिकारियों को अनुचित कार्य करने की प्रेरणा देता है। और  न ही जनता को लोकहित का उल्लंघन करने देता है। राज्य की क्रियाओ के साथ साथ प्रशासन मे भी सुधार होता रहता है। जो विकास के लिए आवश्यक होता है।

प्रशासनिक विधि विस्तृत होते सरकारी दायित्वों को पूरा करने का एक प्रयोगात्मक उपकरण है । जिसके अंतर्गत  रूढ़िवादिता को तोड़ने, वैज्ञानिकता को सुनिश्चित करने तथा विभिन्न सामाजिक-आर्थिक हितों की पूर्ति करने के लिए एक लोचदार, प्रगतिशील प्रशासन का निर्माण करना आवश्यक होता है। समन्वय किसी भी विकास के लिए पहला सिधान्त होता है और प्रशासन इससे अछूता नही है। समन्वय के अभाव मे प्रशासन अपने नीतियो कार्यकर्मों को अच्छे से पूरा नही कर सकता है।

 आलोचना-

इसके निम्न आलोचना है।
वर्तमान में प्रशासन की शक्तियों का निरन्तर विकास हो रहा है ।और  यह विकास राज्य के निरन्तर बढ़ते दायित्वों का परिणाम है । लोक प्रशासन की इन अतुलित शक्तियों को नियन्त्रित करने की आवश्यकता भी जरूरी दिख रही है । लोकतान्त्रिक समाज में शक्ति पर नियन्त्रण उतना ही  आवश्यक है । शक्ति जितनी अधिक होती है।  नियन्त्राग की भी उतनी ही अधिक आवश्यकता है

जब भी प्रशासनिक नियन्त्रण की बात करते है। तो स्वाभाविक रूप से प्रशासन-तन्त्र की भूमिका, संगठन, प्रकृति आदि से सम्बन्धित प्रश्न उभरकर सामने आते हैं । इसके साथ ही प्रशासनिक नियन्त्रण के सम्बन्ध में ‘उत्तरदायित्व’ अथवा ‘जवाबदेहिता’ का प्रश्न भी  सामने आता है ।तो इनके दोषो को भी दूर किया जाना आवश्यक होता है।

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कानून के नियम का पालन नही करना-

कानून का शासन लोकतन्त्र का आधार शीला है और यह उसका ही पालन नही करते है।  प्रशासनिक नियन्त्रण की बात यदि करते है तो  तो स्वाभाविक रूप से प्रशासन-तन्त्र की भूमिका, संगठन, प्रकृति आदि का ध्यान रखना आवश्यक होगा। कानून की म्ध्यस्थता और सरकारी क्रियान्वय पर कानून की उचित प्रक्रिया निर्भर है।

कमजोर प्राकृतिक न्याय-

यह न्याय के सिधान्त को कमजोर करता है। इसके अंतर्गत आने वाले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का यह उलंघन करता है।इसकी जांच की गुणवत्ता भी सही से कार्य नही करती है। प्रशासनिक अदालते मौखिक बयान पर भी निर्भर करती है। यह सही निर्णय नही दे पाती है।

अपील का सीमित अधिकार-

इन न्याय्यलयों के द्वारा दिया गया निर्णय या तो सीमित होता है नही तो अस्तित्वहीन होता है। न्यायिक हित की समीक्षा करना इसमे कठिन होता है।

प्रशासन को अधिकांश कार्यों से पूर्व संसद की अनुमति लेना अनिवार्य होता है।

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