बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 क्या है? What is Banking Regulation Act 1949 बैंकिंग विनियमन विधेयक (संशोधन) 2020

Banking Regulation Act 1950- An introduction- Hindi Law Notes

बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 भारत में एक ऐसा कानून है जो भारत में सभी बैंकिंग फर्मों और कंपनी को नियंत्रित करता है।  इसे बैंकिंग कंपनी अधिनियम 1949 के रूप में पारित किया गया था। जो की यह 16 मार्च 1949 से लागू हुआ था  और बाद मे 1 मार्च 1966 को ये  बैंकिंग विनियमन अधिनियम 1949 के रूप मे परिवर्तित हो गया ।

यह अधिनियम भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के द्वारा   बैंकों को लाइसेंस देने की शक्ति देता है। इसके अंतर्गत शेयरधारकों के शेयरहोल्डिंग और वोटिंग अधिकारों का नियम किया जाता है । तथा यह बोर्डों और प्रबंधन की नियुक्ति की निगरानी करता है। और  बैंकों के संचालन को विनियमित, ऑडिट के लिए निर्देश देता है। और उस पर  नियंत्रण अधिस्थगन, विलय और परिसमापन; सार्वजनिक भलाई और बैंकिंग नीति के हितों में निर्देश जारी करता है और यदि आवश्यक होता है तो  दंड का प्रावधान भी करता है।

बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020 के तहत कुछ परिवर्तन किये गये हैं । यह हाल ही में भारतीय संसद के द्वारा ‘बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020’ को पारित कर दिया गया है। इस विधेयक में बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 को संशोधित करने के प्रस्ताव किया गया है। जिससे  इस नए विधेयक का उद्देश्य सहकारी बैंकों की कार्यप्रणाली में सुधार करना है।तथा  इस विधेयक के माध्यम से सहकारी बैंकों की निगरानी हेतु भारतीय रिज़र्व बैंक (Reserve Bank of India- RBI) की शक्तियों में वृद्धि की गई हैं। और यह विधेयक जून 2020 में प्रख्यापित बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अध्यादेश  लाया गया ।

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बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 में कुछ परिवर्तन किये गये हैं जो कि बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020 के तहत किये गए हैं.

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020 यह  प्रावधान करता है  कि अधिनियम, 1949 जो कि  इन दो समितियों पर लागू नहीं होगा-
 (i) प्राथमिक कृषि ऋण समितियों
 (ii) सहकारी समितियों

यह विधयक इन पर लागू नहीं होगा ।  जिसका प्रमुख व्यवसाय कृषि विकास के लिए दीर्घकालिक वित्तपोषण है।

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020  इन सहकारी सोसाइटियों को निम्न काम करने की अनुमति भी नहीं देता है। जैसे-

अपने नाम में या उनके व्यवसाय के संबंध में ‘बैंक’, ‘बैंकर’ या ‘बैंकिंग’ शब्दों का उपयोग करना

इसमे एक इकाई के रूप में कार्य करना  जो चेक को मंजूरी देता है।

सहकारी बैंकों के  द्वारा शेयरों और प्रतिभूतियों को जारी करना –

 बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020  यह प्रावधान करता है कि सहकारी बैंक अपने इक्विटी शेयरों, वरीयता शेयरों, या विशेष शेयरों को अंकित मूल्य पर या अपने सदस्यों को प्रीमियम पर या संचालन के अपने क्षेत्र में रहने वाले किसी अन्य व्यक्ति को जारी कर सकता है।

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020 के अनुसार  कोई भी व्यक्ति सहकारी बैंक द्वारा उसे जारी किए गए शेयरों के सरेंडर के लिए भुगतान की मांग का हकदार नही हो सकता है। तथा एक सहकारी बैंक RBI  के द्वारा दिए गए निर्देशों के अलावा अपनी शेयर पूंजी को निकाल या कम नहीं कर सकता है।

निदेशक मंडल का गठन-

इस अधिनियम में यह कहा गया है कि RBI एक बहु-राज्य सहकारी बैंक के निदेशक मंडल को कुछ शर्तों के साथ पांच साल तक के लिए देखभाल  कर सकता है।   इसमे वह मामला भी आता है।  जहां आरबीआई द्वारा बोर्ड को देख रेख  करना और जमाकर्ताओं की सुरक्षा करना सार्वजनिक हित मे होता है।

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 सहकारी बैंकों को छूट देने की शक्ति-

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020  में कहा गया है कि RBI सहकारी बैंक या सहकारी बैंकों के वर्ग को अधिसूचना के माध्यम से अधिनियम के कुछ प्रावधानों से छूट भी दे सकता है।  इसमे यह प्रावधान दिया गया है कि रोजगार, निदेशक मंडल की योग्यता और, एक अध्यक्ष की नियुक्ति से संबंधित। हैं. इनके चयन में किसको क्या छूट मिलेगी यह  रिज़र्व बैंक के द्वारा तय किया जायेगा। देश में लगभग 1,500 सहकारी बैंक हैं।  जिनमें से 75% महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात, तमिलनाडु और उत्तरप्रदेश जैसे राज्यों में स्थित  हैं। इस सहकारी बैंकों में लोगों द्वारा लगभग 5 लाख करोड़ रुपए जमा किये गए है । और इसके साथ ही सहकारी बैंकों द्वारा लगभग 3 लाख करोड़ रुपए  का ऋण प्रदान किया जाता है। यह शहरी सहकारी बैंक प्राथमिकता प्राप्त क्षेत्रों के लिये वित्तीय सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं।  

बैंकिंग कानून (सहकारी समितियाँ) अधिनियम, 1965’ के तहत सहकारी बैंकों विनियमन की दोहरी प्रणाली की व्यवस्था दी गई है।
इसके अनुसार  सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार को बैंकों के निगमन, पंजीकरण, प्रबंधन, विलय, परिसमापन आदि का अधिकार दिया गया जबकि RBI को सहकारी बैंकों की बैंकिंग प्रणाली (लाइसेंसिंग, ब्याज दर का निर्धारण आदि) की निगरानी का कार्य दिया गया था।

विधेयक के लाभ-

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020  के एक कानून के रूप में लागू होने के बाद RBI को सहकारी बैंकों की कार्यप्रणाली के बारे में जादा अच्छे से  जानकारी उपलब्ध हो पाएगी जिससे RBI को इन बैंकों के विनियमन में आसानी होगी।

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020  के लागू होने के बाद सहकारी बैंकों के निदेशक मंडल में शामिल 51% सदस्यों के पास बैंकिंग, विधि, अर्थशास्त्र आदि क्षेत्रों में विशेष अनुभव होना अनिवार्य कर दिया गया है, जिससे सहकारी बैंकों की कार्यप्रणाली में अब सुधार होगा।

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इन सुधारों के माध्यम से सहकारी बैंक के शेयर और ऋण-पत्र के माध्यम से अब अधिक पूँजी की व्यवस्था  हो पाएगी।

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020 के माध्यम से RBI को सहकारी बैंकों के ऑडिट (Audit) से जुड़े अधिकार भी दे दिए जाएंगे जिससे सहकारी बैंकों की कार्यप्रणाली में अधिक पारदर्शिता अब  सुनिश्चित की जा सकेगी।

बैंकिंग विनियमन (संशोधन) विधेयक, 2020  के माध्यम से अब सहकारी बैंकों की कार्यप्रणाली में आवश्यक सुधार किये जा सकेंगे । जिससे उनकी वित्तीय स्थिरता तो  बढ़ेगी ही और जनता में सहकारी बैंकों के प्रति विश्वास बढ़ाने में सहायता प्राप्त होगी।  

हानि –

इस विधेयक में प्रस्तावित सुधारों के पहले भी सहकारी बैंकों की बैंकिंग गतिविधियों की निगरानी का दायित्व RBI के अधिकार क्षेत्र (शहरी बैंक विभाग के माध्यम से) में होने के बावजूद पिछले कुछ वर्षों में इन बैंकों में भारी वित्तीय गड़बड़ियाँ देखने को मिली है।

इस विधेयक में प्रस्तावित सुधारों के साथ RBI के निगरानी तंत्र में भी कुछ आवश्यक सुधारों की आवश्यकता होगी।  

सहकारी बैंकों की निगरानी के संदर्भ में RBI की शक्तियों में वृद्धि से RBI पर कार्य का दबाव बढ़ेगा।

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