भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 88 से 93 तक का वर्णन

Constitution of India Article 88-93- Hindi Law Notes

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे हमने भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 87 तक का वर्णन किया था अगर आप इन धाराओ का अध्ययन कर चुके है। तो यह आप के लिए लाभकारी होगा । यदि आपने यह धाराये नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराये समझने मे आसानी होगी।

अनुच्छेद 88

इस अनुच्छेद मे सदनों के बारे में मंत्रियों और महान्यायवादी के अधिकार के बारे मे बताया गया है।

इस अनुच्छेद के अनुसार इसमे संसद के सदनो के बारे मे बताया गया है।जिसके अनुसार प्रत्येक मंत्री और भारत के महान्यायवादी को यह अधिकार दिया गया होगा कि वह किसी भी सदन में या सदनों की किसी सयुंक्त बैठक में और संसद की किसी समिति में जिसमें उसका नाम सदस्य के रूप में दिया गया हो या बोले और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग ले परंतु इस अनुच्छेद के आधार पर वह मत देने का हकदार नहीं होगा ।

अनुच्छेद 89

इस अनुच्छेद के अनुसार राज्य सभा का सभापति और उपसभापति को बताया गया है।जिसके अनुसार भारत का उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होगा। और राज्य सभाजितना जल्दी संभव होता है। अपने किसी सदस्य को अपना उपसभापति चुनेगी और जब-जब उपसभापति का पद रिक्त होता है। तब राज्य सभा किसी अन्य सदस्य को अपना उपसभापति चुनेगी।

अनुच्छेद 90

इस अनुच्छेद के अनुसार उपसभापति का पद रिक्त होना या पद हटाया जाना बताया गया है। जिसके अनुसार राज्य सभा के उपसभापति के रूप में पद धारण करने वाला व्यक्ति निम्न स्थित मे पद त्याग कर सकता है।

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राज्य सभा का सदस्य नहीं रहता है। तो अपना पद रिक्त कर देगा।

किसी समय सभापति को संबोधित करके अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा ।

राज्य सभा के समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकता है।

परन्तु खंड (ग) के प्रयोजन के लिए कोई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के आशय की कम से कम चौदह दिन पूर्व की सूचना न दे दी गई हो ।

निम्न संशोधन किया गया है।

संविधान (संशोधन) अधिनियम 1951 की धारा 6 के अनुसार अनुच्छेद 85 के स्थान पर प्रतिस्थापित।

अनुच्छेद 91

इस अनुच्छेद के अनुसार इसमे सभापति के पद के कर्तव्यों का पालन करने या सभापति के रूप में कार्य करने की उपसभापति या अन्य व्यक्ति की शक्ति को बताया गया है। जिसके अनुसार जब सभापति का पद रिक्त रहता है । तब ऐसी अवधि में जब उपराष्ट्रपति, राष्ट्रपति के रूप में कार्य कर रहा होता है। या उसके कृत्यों का निर्वहन कर रहा है। तब उपसभापति या यदि उपसभापति का पद भी रिक्त है। तो ऐसे स्थित मे राज्य सभा का ऐसा सदस्य जिसको राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए नियुक्त किया गया हो उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा।

राज्य सभा की किसी बैठक से सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति या यदि वह भी अनुपस्थित रहता है। तो ऐसा व्यक्ति जो राज्य सभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाता है। या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है । तो ऐसा अन्य व्यक्ति जो राज्य सभा द्वारा अवधारित किया जाए सभापति के रूप में कार्य करेगा।

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अनुच्छेद 92

इस अनुच्छेद मे जब सभापति या उपसभापति को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है। तब उसका पीठासीन न होना बताया गया है।
यदि राज्य सभा की किसी बैठक में जब उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है । तब ऐसे स्थित मे सभापति या जब उपसभापति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है। तब उपसभापति उपस्थित रहने पर भी पीठासीन नहीं होगा तब अनुच्छेद 91 के खंड (2) के उपबंध ऐसी प्रत्येक बैठक के संबंध में वैसे ही लागू होता है। जैसे की वह तब लागू होगा जब सभापति या उपसभापति अनुपस्थित है ।

जब उपराष्ट्रपति को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प राज्य सभा में विचाराधीन है। तब सभापति को राज्य सभा में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु वह अनुच्छेद 100 में किसी बात के होते हुए भी ऐसे संकल्प पर या ऐसी कार्यवाहियों के दौरान किसी अन्य विषय पर मत देने का बिल्कुल हकदार नहीं होगा ।

अनुच्छेद 93

इस अनुच्छेद के अनुसार लोकसभा का अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के बारे मे बताया गया है। लोकसभा के लिये एक अध्यक्ष और एक उपाध्यक्ष तथा राज्यसभा हेतु एक सभापति एवं एक उपसभापति होता है। जैसे की लोकसभा देश में सर्वोच्च विधायी निकाय है। जो की अपने अध्यक्ष का चुनाव करती है। और जो सदन के दिन-प्रतिदिन के कामकाज की अध्यक्षता करता है।

लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव प्रत्येक नवगठित सदन के प्राथमिक कार्यों में से एक है।अध्यक्ष चुने जाने के लिये कोई विशिष्ट योग्यता निर्धारित नहीं की गयी है। इस पद के लिये संविधान और देश के कानूनों की समझ रखने वाले व्यक्ति को वरीयता क्रम में रखा जाता है।

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लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव होने के बाद उपाध्यक्ष का चुनाव भी लोकसभा द्वारा अपने सदस्यों में से ही करती है।
उपाध्यक्ष के चुनाव की तिथि अध्यक्ष द्वारा अध्यक्ष के चुनाव की तिथि राष्ट्रपति द्वारा निर्धारित की जाती है। निर्धारित की जाती है।

अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी आमतौर पर लोकसभा के कार्यकाल (5 वर्ष) तक अपने पद पर बना रहता है।तथा जब-जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का पद रिक्त होता है। तब-तब लोकसभा किसी अन्य सदस्य को यथास्थिति अध्यक्ष या उपाध्यक्ष का चुनाव करती है।

यदि आपको इन को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है। तो कृपया हमे कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है।

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