भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 145 और 146 का वर्णन

Constitution of India Article 145 and 146- Hindi Law Notes

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में हमने भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 144  तक का वर्णन किया था अगर आप इन धाराओं का अध्ययन कर चुके है। तो यह आप के लिए लाभकारी होगा । यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

अनुच्छेद  145

इस अनुच्छेद के अनुसार उच्चतम न्यायालय को अपने क्रियाकलापों एवं प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए खुद  के नियमों को लागू करने का अधिकार देता है । जो कि (राष्ट्रपति के अनुमोदन के साथ) मौजूद होता है।

(1) संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए इसमें  उच्चतम न्यायालय समय-समय पर जो कि  राष्ट्रपति के अनुमोदन से न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया के साधारणतया विनियमन के लिए नियम बना सकेगा तथा अंतर्गत निम्नलिखित भी आते है। –

(क) उस न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के बारे में नियम बना सकता है।
(ख) अपीलें सुनने के लिए तथा उसकी  प्रक्रिया के बारे में और अपीलों से  संबंधी अन्य विषयों के बारे में जिनके अंतर्गत
वह समय भी आता  है जिसके भीतर अपील किस न्यायालय में ग्रहण की जाती है और उसके  नियम भी

(ग) भाग 3 द्वारा प्रदत्त अधिकारों में से किसी भी अधिकार  का प्रवर्तन कराने के लिए उस न्यायालय में कार्यवाहियों के बारे में नियम
अनुच्छेद 139 क के अनुसार  उस न्यायालय में कार्यवाहियों के बारे में नियम
(घ) अनुच्छेद 134 के खंड (1) के उपखंड (ग) के अधीन  होते हुए अपीलों को ग्रहण किए जाने के बारे में नियम
(ङ) उस न्यायालय द्वारा सुनाए गए किसी निर्णय या उनके द्वारा किए गए आदेश का जिन शर्तों के अधीन रहते हुए पुनर्विलोकन किया जा सकेगा इसके बारे में और ऐसे पुनर्विलोकन के लिए प्रक्रिया के बारे में जिसके अंतर्गत वह समय भी शामिल है । जिसके भीतर ऐसे पुनर्विलोकन के लिए आवेदन उस न्यायालय में ग्रहण किए जाने हैं।
(च) उस न्यायालय में किन्हीं कार्यवाहियों के बारे मे और उनके आनुषंगिक खर्चे के बारे में तथा उसमें कार्यवाहियों के संबंध में प्रभारित की जाने वाली फीसों के बारे में नियम
(छ) जमानत मंजूर करने से समबन्धित  नियम
(ज) कार्यवाहियों को रोकने के बारे में नियम
(झ) जिस अपील के बारे में उस न्यायालय को यह प्रतीत होता है । कि वह  तंग करने वाली है।

See Also  (सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 309   से धारा 315  तक का विस्तृत अध्ययन

अथवा विलंब करने के प्रयोजन से की गई है।  इसके संक्षिप्त अवधारणा के लिए उपबंध करने वाले नियम

(ञ) अनुच्छेद 317 के खंड (1) में निर्दिष्ट जांच के लिए प्रक्रिया के बारे में जो नियम

(2) इस अनुच्छेद के अधीन बनाए गए ऐसे नियम जो कि उन न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या नियत कर सकेंगे जो किसी प्रयोजन के लिए बैठेंगे तथा जिंका एकल न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों की शक्ति के लिए उपबंध कर सकेंगे।

(3) इस मामले में इस संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का कोई सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है। उस विधि के अनुसार  इसका विनिश्चय करने के प्रयोजन के लिए या इस संविधान के अनुच्छेद 143 के अधीन निर्देश की सुनवाई करने के प्रयोजन के लिए बैठने वाले न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या 5 होगी।

पर अनुच्छेद 132 से भिन्न इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रहते हुए  अपील की सुनवाई करने वाला न्यायालय पाँच से कम न्यायाधीशों से मिलकर बना है।  और  यदि अपील की सुनवाई के दौरान उस न्यायालय का समाधान हो जाता है।  कि अपील में संविधान के निर्वचन के बारे में विधि का ऐसा सारवान् प्रश्न अंतर्वलित है।  जिसका अवधारणा अपील के निपटारे के लिए यह  आवश्यक है । तो वहाँ वह न्यायालय ऐसे प्रश्न को उस न्यायालय को जो ऐसे प्रश्न को अंतर्वलित करने वाले किसी मामले के विनिश्चय के लिए इस खंड की अपेक्षानुसार गठित किया जाता है। तथा  उसकी राय के लिए निर्देशित करेगा और ऐसी राय की प्राप्ति पर उस अपील को उस राय के अनुरूप निपटाएगा।

(4) उच्चतम न्यायालय प्रत्येक निर्णय खुले न्यायालय में ही सुना जाएगा।  अन्यथा नहीं और अनुच्छेद के अधीन प्रत्येक प्रतिवेदन खुले न्यायालय में सुनाई गई राय के अनुसार ही दिया जाएगा अन्यथा नहीं।

See Also  (सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 239 से धारा 243 का विस्तृत अध्ययन

(5) उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रत्येक निर्णय और ऐसी प्रत्येक राय जो कि किसी  मामले की सुनवाई में उपस्थित न्यायाधीशों की बहुसंख्या की सहमति से ही दी जाएगी अन्यथा नहीं किन्तु इस खंड की कोई बात किसी ऐसे न्यायाधीश को जो इससे सहमत नहीं है वह  अपना विसम्मत निर्णय या राय देने से निवारित नहीं करेगी।

इसमे निम्न संशोधन किए गए है।

 संविधान (बयालीसवाँ संशोधन)अधिनियम 1976 की धारा 26 के  द्वारा (1-2-1977 से) अंतःस्थापित।

 संविधान (तैंतालीस वाँ संशोधन) अधिनियम 1977 की धारा 6 के द्वारा (13-4-1978 से) “अनुच्छेद 131क और 139क” के स्थान पर प्रतिस्थापित।

संविधान (बयालीसवाँ संशोधन)अधिनियम 1976 की धारा 26 के  द्वारा (1-2-1977 से) “खंड (3) के उपबंधों” के स्थान पर प्रतिस्थापित।

संविधान (बयालीसवाँ संशोधन)अधिनियम 1976 की धारा 26  के द्वारा (1-2-1978 से) कुछ शब्दों, अंकों और अक्षरों का लोप किया गया

संविधान (बयालीसवाँ संशोधन)अधिनियम 1976 की धारा 26 के  द्वारा (1-2-1977 से) “न्यूनतम संख्या” के स्थान पर प्रतिस्थापित।

अनुच्छेद 146

इस अनुच्छेद के अनुसार उच्चतम न्यायालय के अधिकारी और सेवक तथा व्यय को बताया गया है।

(1)- उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति भारत का मुख्य न्यायमूर्ति के द्वारा होगी।  या उस न्यायालय का ऐसा अन्य न्यायाधीश या अधिकारी करेगा जिसे यह निर्दिष्ट करे ।

परंतु राष्ट्रपति नियम द्वारा यह अपेक्षा की जा सकती है  कि ऐसी किन्हीं दशाओं में जो की नियम में विनिर्दिष्ट की जाएं। उस अनुसार  किसी ऐसे व्यक्ति को जो पहले से ही न्यायालय से संलग्न नहीं है। जिसको  न्यायालय से संबंधित किसी पद पर संघ लोक सेवा आयोग से परामर्श करके ही नियुक्त किया जाएगा अन्यथा नहीं ।

See Also  भारत का संविधान अनुच्छेद 221 से 225 तक

(2)-संसद द्वारा बनाई गई विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए उच्चतम न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों की सेवा की शर्तें ऐसी होगी जो कि  भारत के मुख्य न्यायमूर्ति या उस न्यायालय के ऐसे अन्य न्यायाधीश या अधिकारी के  द्वारा जिसे भारत के मुख्य न्यायमूर्ति ने इस प्रयोजन के लिए नियम बनाने के लिए प्राधिकृत किया है या फिर  बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाएं ।

परन्तु इस खंड के अधीन बनाएं गए नियमों के लिए जो कि वेतन ,भत्ते ,पेंशन से संबन्धित होता है वह राष्ट्रपति के अनुमोदन की अपेक्षा होगी ।

(3)-उच्चतम न्यायालय के प्रशासनिक व्यय जिनके अंतर्गत उस न्यायालय के अधिकारियों और सेवकों को या उनके संबंध में संदेय सभी वेतन, भत्ते और पेंशन आती है। वह  भारत की संचित निधि पर भारित होंगे और उस न्यायालय द्वारा ली गई फीस और अन्य धनराशि में उस निधि का भाग होंगी ।

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