भारत का संविधान अनुच्छेद 216 से 220 तक

जैसा की आप सबको पता ही है कि भारत का संविधान अनुच्छेद 201 से लेकर के 215तक हम पहले ही वर्णन कर चुके हैं। इस पोस्ट पर हम भारत का संविधान अनुच्छेद 216 से 220 तक `आप को बताएंगे अगर आपने इससे पहले के अनुच्छेद नहीं पढ़े हैं तो आप सबसे पहले उन्हें पढ़ ले जिससे कि आपको आगे के अनुच्छेद पढ़ने में आसानी होगी।

अनुच्छेद 216

उच्च न्यायालयों का गठन को बताया गया है।
प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक मुख्य न्यायाधीश और ऐसे अन्य न्यायाधीश होंगे जिन्हें राष्ट्रपति समय-समय पर नियुक्त करना आवश्यक समझे।

अनुच्छेद 217

उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की नियुक्ति और उसके पद की शर्ते को बताया गया है।

(1) 1[अनुच्छेद 124क में निर्दिष्ट राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की सिफारिश पर, राष्ट्रपति अपने हस्ताक्षर और मुद्रा सहित अधिपत्र द्वारा उच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को नियुक्त करेगा ।  और वह न्यायाधीश 2[अपर या कार्यकारी न्यायाधीश की दशा में अनुच्छेद 224 में उपबंधित रूप में पद धारण करेगा और किसी अन्य दशा में तब तक पद धारण करेगा जब तक वह 3[बासठ वर्ष] की आयु प्राप्त नहीं कर लेता है।

परंतु-

(क) कोई न्यायाधीश, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा

(ख) किसी न्यायाधीश को उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को हटाने के लिए अनुच्छेद 124 के खंड (4) में उपबंधित रीति से उसके पद से राष्ट्रपति द्वारा हटाया जा सकेगा ।

(ग) किसी न्यायाधीश का पद, राष्ट्रपति द्वारा उसे उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किए जाने पर या राष्ट्रपति द्वारा उसे भारत के राज्यक्षेत्र में किसी अन्य उच्च न्यायालय को, अंतरित किए जाने पर रिक्त हो जाएगा ।

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(2) कोई व्यक्ति जो कि किसी उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत का नागरिक है और-

(क) भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम दस वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुका है ।  या

(ख) किसी 4उच्च न्यायालय का या ऐसे दो या अधिक न्यायालयों का लगातार कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहा है।

5[(ग) *                                *                              *                                   *

स्पष्टीकरण दिया गया है।

6[(क) भारत के राज्यक्षेत्र में न्यायिक पद धारण करने की अवधि  की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान  कोई व्यक्ति न्यायिक पद धारण करने के पश्चात् किसी उच्च न्यायालय का  अधिवक्ता रहा है या उसने किसी अधिकरण के सदस्य का पद धारण किया  है अथवा संघ या राज्य के अधीन कोई ऐसा पद धारण किया है जिसके लिए विधि का विशेष ज्ञान अपेक्षित है ;]

7[(क2) किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहने की अवधि की संगणना करने में वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान  किसी व्यक्ति ने अधिवक्ता होने के पश्चात् न्यायिक पद धारण किया है या  किसी अधिकरण के सदस्य का पद धारण किया है अथवा संघ या राज्य  के अधीन कोई ऐसा पद धारण किया है जिसके लिए विधि का विशेष ज्ञान  अपेक्षित है।

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(ख) भारत के राज्यक्षेत्र में न्यायिक पद धारण करने या किसी  उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहने की अवधि की संगणना करने में इस  संविधान के प्रारंभ से पहले की वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी  जिसके दौरान किसी व्यक्ति ने, यथास्थिति, ऐसे क्षेत्र में जो 15 अगस्त, 1947 से पहले भारत शासन अधिनियम, 1935 में परिभाषित भारत में  समाविष्ट था, न्यायिक पद धारण किया है या वह ऐसे किसी क्षेत्र में किसी  उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा है।

9[(3) यदि उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश की आयु के बारे में कोई प्रश्न उठता है तो उस प्रश्न का विनिश्वय भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात्  राष्ट्रपति द्वारा किया जाएगा और राष्ट्रपति का विनिश्चय अंतिम होगा।

अनुच्छेद- 218

उच्चतम न्यायालय से संबंधित उपबंधों का उच्च न्यायालयों को लागू होना बताया गया है।

अनुच्छेद 124 के खंड (4) और खंड (5 ) के उपबंध, जहां-जहां उनमें उच्चतम न्यायालय के प्रति निर्देश है वहां- वहां उच्च न्यायालय के प्रति निर्देश प्रतिस्थापित करके, उच्च न्यायालय के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उच्चतम न्यायालय के संबंध में लागू होते हैं।

अनुच्छेद 219

उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों द्वारा शपथ या प्रतिज्ञान को बताया गया है।

उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति, अपना पदग्रहण करने से पहले, उस राज्य के राज्यपाल या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति के समक्ष, तीसरी अनुसूची में इस प्रयोजन के लिए दिए गए प्ररूप के अनुसार, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर अपने हस्ताक्षर करेगा।

अनुच्छेद- 220

 स्थायी न्यायाधीश रहने के पश्चात् विधि-व्यवसाय पर निर्बंधन को बताया गया है । –

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कोई व्यक्ति, जिसने इस संविधान के प्रारंभ के पश्धात् किसी उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायाधीश के रूप में पद धारण किया है, उच्चतम न्यायालय और अन्य उच्च न्यायालयों के सिवाय भारत में किसी न्यायालय या किसी प्राधिकारी के समक्ष अभिवचन या कार्य नहीं करेगा |

स्पष्टीकरण-

इस अनुच्छेद में, “उच्च न्यायालय” पद के अंतर्गत संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1956 के प्रारंभ2 से पहले विद्यमान पहली अनुसूची के भाग ख में विनिर्दिष्ट राज्य का उच्च न्यायालय नहीं है।

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