सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 26 से 32 का विस्तृत अध्ययन

आपने अगर धारा 1 से 25 तक नही पढ़ा हैं। तो कृपया पहले उसको पढ़ लीजिये। इससे आपको समझने मे आसानी होगी। यह आप CPC टैग मे जाकर देख सकते है।

अब आइये समझते है धारा 26 से 32  क्या है।

धारा 26

भारत के किसी भी ऐसे क्षेत्र मे जो सिविल या राजस्व न्यायालय द्वारा जिसके बारे मे केंद्र सरकार ने सूचना दे कर बताया हो की इसपर यह धारा लागू होती है और यह भारत से बाहर माना जाएगा।

और जहा पर सिविल प्रक्रिया संहिता का विस्तार नही है। यह भारत के बाहर है।

सिविल प्रक्रिया संहिता की

धारा 26 मे

वादो को संस्थित करने के संबन्धित नियम –

इसको आदेश 4 और आदेश 6 मे बताया गया है।

हर वाद वाद पत्र के द्वारा या किसी अन्य प्रकार जो बताया गया है उसके अनुसार वाद संस्थित किया जाएगा। प्रतेयक वाद को सपद पत्र के द्वारा प्रस्तुत किया जा सकता है।

नियम 1 के अनुसार वाद पत्र को उपस्थित होना आवश्यक है यह 2 कॉपी मे उपस्थित होगा। और यह न्यायालय को दिया जाएगा। यह न्यायालय या उस अधिकारी के समझ यह प्रस्तुत किया जाएगा जो अधिकारी उसके लिए नियुक्त किया गया है।  

सभी वाद पत्र को उपस्थित करते हुए वाद प्रारम्भ होता है। इसको आदेश 6 और आदेश 7 के नियमो का पालन करते हुए दिया जाएगा।

आदेश 6 मे अभिवचन को बताया गया है और लिखित कथन को भी सम्मालित करते है। जब वादी वाद दायर करने के बाद प्रतिवादी द्वारा दिया गया उत्तर लिखित कथन कहलाता है।

आदेश 7 वाद पत्र को बताता है।

वादो का रजिस्टर ऑर्डर 4 के अंतर्गत आता है। इसमे न्यायालय के समझ एक रजिस्टर रखा होता है। नय्यलय हर वाद को उसमे रजिस्टर कराता है। और उस रजिस्टर मे वाद संखया आदि लिखा होता है। यह सिविल वाद को रजिस्टर करती है यह हर वर्ष क्रम से लिखा होता है।

See Also  सिविल प्रक्रिया संहिता 151 से लेकर के 155 तक

ऑर्डर 7 के नौसार रजिस्टर मे वाद पत्र के अनुसार न्यायालय का नाम लिखा होता है। उसमे वादी का नाम पता तथा प्रतिवादी का नाम वर्णन आदि होना चाहिए यदि वादी या प्रतिवादी अवयस्क या पागल है तो वह सब भी लिखना होता है। इसमे न्यायालय के अधिकार को भी लिखना होता  है। वादी के दावे आदि को भी इसमे लिखा होता है। यदि कोई रकम वादी के भाग का त्याग दिया गया है तो वह भी लिखा होता है। वाद के मूल्य को भी इसमे लिखना होता है।

धारा 27

ऑर्डर 5 समन भेजना और उसका प्रभाव –

जब अदालत में किसी आरोपी के खिलाफ वाद  चलता है और आरोपी को न्यायालय  में उपस्थित  होने के लिए कहा जाता है।  तो इसे अदालत की भाषा में समन कहा जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो समन एक कानूनी नोटिस है जो सिविल और आपराधिक मामलों में जारी किया जाता है। समन में अदालत किसी आरोपी को व्यकितगत रूप से पेश होने के लिए कहती है। समन किसी भी आरोपी को रजिस्टर्ड डाक की सहायता से भेजा जाता है। जब ये समन आरोपी को मिलता है तो उसे उसपर हस्ताक्षर करने होते हैं।

समन एक न्यायालय के द्वारा जारी दस्तावेज़ होता है यह किसी व्यक्ति को जारी किया जाता है यह या तो व्यक्ति को खुद या उसके द्वारा कोई दस्तावेज़ के संबंध मे जारी किया जाता है।

जहा कोई वाद पत्र दायर किया गया और नय्ययाली प्रतिवादी को एक समन दायर करेगा की आपको इस दिन इस समय नियम के अनुसार सूचित किया जाता है की आपको यहा पाहुचना होगा। वाद के संस्थित होने के 30 दिन के अंडर समन पहुच जाना चाहिए।

See Also  सिविल प्रक्रिया संहिता 126  से लेकर के 130 तक

धारा 28

समन को एक राज्य से दूसरे राज्य मे भेजना-

समन को एक राज्य से दूसरे राज्य मे उस नियम के अनुसार समन भेजा जाएगा जो नियम वहा लागू होता है।

जिस न्यायालय को यह प्राप्त होता है वह ऐसा प्रस्तुत करेगा जैसे यह समन उसी के द्वारा निकाला गया है। और जब तक की उसपर कोई कार्यवाही नही हो जाती और उसके अभिलेखो को वापस उस राज्य मे पाहुचाएगा।

यदि समन जारी करने वाले नयायालय की भाषा भिन्न है तो हिन्दी, अँग्रेजी के साथ वह भाषा मे भी समन को लिखा जाएगा।

धारा 29

विदेशी समन को भेजना-

भारत के किसी भी ऐसे क्षेत्र मे जो सिविल या राजस्व न्यायालय द्वारा जिसके बारे मे केंद्र सरकार ने सूचना दे कर बताया हो की इसपर यह धारा लागू होती है और यह भारत से बाहर माना जाएगा।

और जहा पर सिविल प्रक्रिया संहिता का विस्तार नही है। यह भारत के बाहर है।

भारत के किसी भी ऐसे क्षेत्र मे जो सिविल या राजस्व न्यायालय द्वारा जिसके बारे मे केंद्र सरकार ने सूचना दे कर बताया हो की इसपर यह धारा लागू नही होती है।  और यह भारत से बाहर माना जाएगा।

और जहा पर सिविल प्रक्रिया संहिता का विस्तार नही है। यह भारत के बाहर है। वहा राज्य सरकार द्वारा समन ऐसे भेजा जाएगा जैसे उसको वही से निकाला गया हो अर्थात वो वही का वाद को । जिस न्यायालय मे यह धारा लागू होगी वाद को वहा सन्स्थ्गित कर दिया जाएगा।

धारा 30

प्रकटीकरण और परिसीमाओ का वर्णन-

ऐसे शर्तो और परिसीमाओ के अधीन रहते हुए नयायालय खुद या किसी भी पक्षकार के आवेदन पर आदेश कर सकेगा –

See Also  क्षतिपूर्ति भारतीय संविदा अधिनियम 1872

वह किसी भी प्रश्न का उत्तर देने के लिए किसी दस्तावेज़ के निरीक्षण के लिए आदेश कर सकता है।

उनके नाम समन निकाल सकेगा जिसको दस्तावेज़ देना है।

यह उनको भी समन भेज सकता है जिनके पास साछ्य है या फिर जिनको दस्तावेज़ देना आवश्यक है।

धारा 31

साक्षी को समन-

यदि कोई समन साच्छ देने के लिए प्रस्तुत किया गया है तो उनपर धारा 27,धारा 28,धारा 29 लागू होगा। और यह उनही उपबंधो के अधीन कार्य करेगा।

धारा 32

पेनलिटी फॉर डिफ़ाल्ट –

न्यायालय किसी व्यक्ति जिसके अधीन धारा 30 का समन निकाला गया है कोर्ट उसको गिरफ्तार करने के लिए विवश कर सकता है।

वह उसपर 5000 का जुर्माना लगा सकता है।

उसके खिलाफ वारंट निकाल सकता है।

संपत्ति को कुर्क या विकय कर सकता है।

यह आदेश कर सकेगा की अपनी उपस्थित के लिए प्रतिभूति दे ।

उसको सिविल कोर्ट के कारागार मे भी भेज सकता है।

इस प्रकार हमने आपको इस पोस्ट के माध्यम से धारा 26से 32 तक समझाने का प्रयास किया है यदि कोई गलती हुई हो या आप इसमे और कुछ जोड़ना चाहते है या इससे संबंधित आपका कोई सुझाव हो तो आप हमे अवश्य सूचित करे।

Leave a Comment