दंड प्रक्रिया संहिताके धारा 1 से 5 तक का विस्तृत अध्ययन-

दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार धारा 1

धारा 1(1)- यह कहती है कि इसका नाम दंड प्रक्रिया संहिता होगी।

धारा 1(2) इसके विस्तार को समझती हैं।

धारा 1(3)- यह संहिता 1 अप्रैल 1974 से लागू होती हैं।

 इसका विस्तार संपूर्ण भारत मे होगी केवल जम्मू कश्मीर को छोड़कर ,जम्मू कश्मीर को धारा 370 लागू होने के कारण ऐसा था जबकि अब नही हैं । अब संपूर्ण भारत मे हैं। नागालैंड और जनजाति के क्षेत्रो  मे अध्याय 8,10,11 को छोड़कर बाकी एक्ट लागू नही हैं। जो शांति ,लोक सेवा, पुलिस निवारक से संबंधित हैं। इसमे राज्य को शक्ति दी गयी हैं यदि राज्य चाहे तो राज्य मे या राज्य के कुछ भाग मे पूरा या थोड़ा या किसी अध्याय या किसी धारा को लागू करा सकता। धारा 8,10,11 सभी जगह समान रूप से लागू होगा।

यहा जनजाति क्षेत्र से मतलब असम के उस क्षेत्र से है 21 जनवरी 1972 के पहले से जिसको संविधान के 6 अनु सूची मे  बताया गया था और शिलांग के कुछ क्षेत्र से हैं।

सेक्शन 2

परिभाषा-

इसमे कुल 25 परिभाषा हैं परंतु सभी परिभाषये उतना महत्वपूर्ण नही हैं हम महत्वपूर्ण परिभाषा को पढ़ेंगे।

धारा 2a

ज़मानती अपराध से आशय ऐसे अपराध से है जो प्रथम अनु सूची में बताया गया है। जिसमे 3 साल से कम तक की सजा हो सकती है। या फिर किसी अन्य विधि द्वारा यह बताया गया है। 

अजमानतीय अपराध वो अपराध होते है जिसमे जमानत नही होता है।

धारा 2b

इसमे बताया गया है कि आरोप क्या होता है। जब आरोप में एक से अधिक शीर्ष हो तो उसमे से कोई भी शीर्ष लिया जा सकता है। 

See Also  हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 भाग- II The Hindu Succession Act, 1956 Part- II

धारा 2c

संघेय  अपराध 

ऐसे अपराध जिसमे मर्डर आदि होती है इसमे बेल मिलना मुश्किल होता है। इसमे बेल मजिस्ट्रेट के हाथ मे होता है।

असंघेय अपराध

ऐसे अपराध जो संघेय अपराध नही होता हैं। इसमे बेल आसानी से मिल जाता हैं।

कम्प्लेंट –

धारा 2d

जब भी कोई व्यक्ति मैजिस्ट्रेट के पास कोई कम्प्लेंट कराता हैं। किसी जान या अंजान व्यक्ति के खिलाफ यह किया जाता हैं। इसमे पुलिस  रिपोर्ट को शामिल नही किया जाता हैं।

उच्च न्यायालय

धारा 2e

जिस पर किसी राज्य के उच्च न्यायालय को विधि द्वारा अधिकार प्राप्त हो।

धारा 2f

भारत को इसमे बताया गया हैं।

धारा 2g जांच

ऐसे जाँच जो मजिस्ट्रेट या न्यायालय द्वारा कराया जाता हैं।

धारा 2h अन्वेषण

साछ्य एकत्र करने के लिए पुलिस  ऑफिसर द्वारा जो जाँच की जाती हैं। अन्वेषण कहलाती हैं। इसमे कई बातों को शामिल किया जाता हैं। जैसे घटना का निरीछण , समय ,संदेहित व्यक्ति से पुंछ तांछ ,अपराध कारित होने का साछ्य का होना व रिपोर्ट भेजना।

धारा 2i न्यायिक कार्यवाही

इसमे साछ्य सपत पत्र पर लिया जा सकता हैं।

धारा 2j स्थानीय अधिकारिता

इसमे न्यायालय अपनी कुछ या सभी शक्तियों का प्रयोग कर सकता हैं।

धारा 2k महानगर क्षेत्र

इसके अन्तर्गत ऐसा क्षेत्र आता है जिसमे राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना दवारा घोषित कर सकती हैं। जिसकी संख्या 10 लाख है।

धारा 2l असंघेय अपराध

ऐसे अपराध जिसमे पुलिस अधिकारी किसी को बिना वारंट के गिरफ्तार नही कर सकते हैं।ये साधारण तरह के अपराध होते हैं।

धारा 2m अधिसूचना

यह राज्य पत्र मे प्रकाशित होता हैं।

धारा 2n अपराध

See Also  (सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 271 से 275 तक का विस्तृत अध्ययन

अपराध से संबंध ऐसे कार्यो से हैं जिसको विधि ने दण्डनीय बनाया हैं।

धारा 2o पुलिस थाने का भार साधक अधिकारी

थाने पर नियुक्त वह अधिकारी जो सबसे वारिस्ठ होता हैं वह पुलिस अधीक्षक कहलाता हैं।

धारा 2p स्थान

यहा पर स्थान से आशय ऐसे क्षेत्र से हैं। इसमे यान ,जलयान,तम्बू आदि भी शामिल हैं।

धारा 2q  प्लीडर

वह व्यक्ति जो न्यायालय दावरा किसी व्यक्ति का वाद लड़ने के लिए नियुक्त किया गया हो। वह व्यक्ति जो दूसरे के लिए कोर्ट मे प्रस्तुत होता हैं उसका वाद लड़ता हैं तो वह प्लीडर कहलाता है। जिसमे एडवोकेट, वकील, हाई कोर्ट के अटॉर्नी सम्मलित होते हैं।

धारा 2r पुलिस रिपोर्ट

इसमे पुलिस द्वारा फ़र्स्ट रिपोर्ट को मैजिस्ट्रेट को सम्मलित किया जाता हैं। मैजिस्ट्रेट उस अनुसार जांच करता हैं।

धारा 2s पुलिस स्टेशन

कोई भी स्थान जिसको राज्य सरकार द्वारा पुलिस स्टेशन के रूप मे घोसित किया गया हैं।

धारा 2u  

लोक अभियोजक

ऐसा व्यक्ति जिसको दण्ड संहिता के धारा 24 के अनुसार लोक अभियोजक के रूप मे नियुक्त किया गया हैं। या फिर वह व्यक्ति जो इसके अनुसार कार्य कर रहा हैं।

धारा 2v  उपखंड

धारा 2w समन मामला

जो अपराध से संबन्धित होते हुए वारंट मामला नही हैं।

धारा 2x  वारंट मामला

जो मामला म्र्त्यु या 2 वर्ष से अधिक के कारावास से संबन्धित होता हैं चाहे वह जिस भी वाद के लिए हो वारंट मामला होता हैं।

धारा 3

निर्देशों का अर्थ लगाना जिसको इंग्लिश मे कहेंगे construction of refrences  इसमे न्ययालयों के पदनाम का विशेस अर्थो मे प्रयोग किया जाएगा जैसे मुख्य न्यायाधीश ,मैजिस्ट्रेट, प्रथम वर्ग मैजिस्ट्रेट ,द्वितीय वर्ग मैजिस्ट्रेट ,त्रतीय वर्ग मैजिस्ट्रेट ,न्यायिक मैजिस्ट्रेट आदि शब्दो का प्रयोग हुआ हैं जिसको सामान्य और महानगर क्षेत्रो मे अलग अलग देखते हैं। प्रथम वर्ग न्यायिक मैजिस्ट्रेट को सामान्य क्षेत्र मे प्रथम न्यायिक मैजिस्ट्रेट कहते हैं जबकि महानगर मे केवल महानगर  न्यायिक मैजिस्ट्रेट कहा जाता हैं। समान्य मे  मुख्य मैजिस्ट्रेट को मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट कहते हैं। जबकि महानगर मे महानगर मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट कहा जाता हैं। कार्य पलाक मैजिस्ट्रेट का कार्य धारा 109,110, मे वर्णित हैं । इसके कार्य प्रशासनिक और न्यायिक दोनों हो सकते हैं परंतु यह विचारण योग्य नही होता हैं। और यह विचारक न्यायालय मे नही आते हैं।

See Also  (सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 216 से धारा 220 का विस्तृत अध्ययन

धारा 4

यह अन्य विधि द्वारा किए गए अपराधो के बारे मे बताती है।

यह भारतीय दंड संहिता के अनुसार किसी भी अपराध मे  अनवेशण या जांच या विचार या साक्ष्य आदि की जांच करनी हैं तो इसमे धारा 4 की सबधारा 1 लगेगा।

यदि किसी विधि की बात करते हैं जो अन्य विधि लागू हो रही हैं फिर भी यही लागू होगा इसमे भी किसी भी अपराध मे  अनवेशण या जांच या विचार या साक्ष्य आदि की जांच करनी हैं तो इसी अनुसार होगा यदि किसी अन्य विधि मे कोई और प्रक्रिया बतायी गयी हैं तो उसको ध्यान मे रखते हुए इसका पालन करेंगे।

धारा 5

यह बचत को बताती हैं । यदि किसी विधि मे कोई शक्ति प्रदान की गयी हैं या कोई रीति बतायी गयी हैं तो उस क्षेत्राधिकार को दंड संहिता का कोई उपबंध प्रभावित नही करेगा। वह दिये गए रीति विधि के अनुसार ही उसका अन्वेशण, जांच या विचार होगा।

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