दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 11 से 15 तक का विस्तृत अध्ययन

इससे पहले हमने आपको धारा 1 से 10  तक समझाया है। आपने अगर धारा 1 से 10  नही पढ़ा हैं। तो कृपया पहले उसको पढ़ लीजिये। इससे आपको समझने मे आसानी होगी। यह आप दंड प्रक्रिया संहिता के  टैग मे जाकर देख सकते है।

धारा 11

दंड संहिता के अनुसार न्यायिक मजिस्ट्रेट और उसके न्यायालय –

इसमे यह बताया गया है की न्यायिक मजिस्ट्रेट और उसका न्यायालय कहा कहा स्थापित है। जो महानगर क्षेत्र नही होता है जहा प्रथम वर्ग और दीतीय वर्ग मजिस्ट्रेट की स्थापना राज्य सरकार के आज्ञा अनुसार किया जाएगा । अर्थात जहा जहा राज्य सरकार आवश्यकता महसूस करेगी वहा वहा न्यायिक मजिस्ट्रेट की स्थापना होगी।

राज्य सरकार उच्च न्यायालय के आज्ञा अनुसार प्रथम और दीतीय वर्ग मजिस्ट्रेट और विशेष न्यायालय की स्थापना केआर सकती है। विशेष न्यायालय विशेष विषयों पर निर्णय लेने के लिए स्थापित किया जा सकता है। इसके लिए उच्च न्यायालय से परामर्श की आवश्यकता होती है। ऐसे विशेष प्रकरण के मामले के विचार के लिए विशेष स्थानीय न्यायालय की स्थापना की जाती है । इसलिए दूसरा कोई न्यायालय इसका निवारण नही कर सकता है।

प्रथम वर्ग न्यायालय और दीतीय वर्ग न्यायालय सेसन वर्ग के अनुसार और मुख्य न्यायाधीश के अधीन कार्य करेगा। सेसन न्यायालय इसकी देख रेख करेगा।

ऐसे न्यायालय के पीठासीन अधिकारी को उच्च न्यायालय दावरा नियुक्त किया जाएगा।

कोई सिविल न्ययालाय को आपराधिक मामले मे भी उनकी सेवा ली जा सकती है और उनको प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट या दीतीय वर्ग मजिस्ट्रेट बनाया जा सकता है।

धारा 12-

दंड संहिता के अनुसार मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और सह न्यायिक मजिस्ट्रेट –

See Also  (सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 300 से धारा 302  तक का विस्तृत अध्ययन

इस धारा के अनुसार हम मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और सह न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्तियों को पढ़ेंगे। और इनकी नियुक्ति कैसे और कौन करेगा। उच्च न्यायालय प्रत्येक जिले मे प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट नियुक्त करेगा। उच्च न्यायालय प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को सह न्यायिक मजिस्ट्रेट भी नियुक्त कर सकता है। ऐसे मजिस्ट्रेट को दंड प्रक्रिया के अधीन या फिर उस समय के विधि के अनुसार मुख्य न्यायाधीश के पास उच्च न्यायालय के द्वारा प्रदान की गयी शक्तिया होंगी।

उच्च न्यायालय किसी तहसील या किसी अन्य क्षेत्र मे प्रथम वर्ग न्यायिक मैजिस्ट्रेट को उप खंड न्यायिक मैजिस्ट्रेट का पद दिया जा सकता है। और इसकी कुछ शक्तियों को कम भी किया जा सकता है।

उपखंड न्यायाधीश को उच्च न्यायालय दावरा दी गयी शक्तिया प्राप्त होगी।

दंड प्रक्रिया के धारा 29 के अनुसार मुख्य न्यायधीश को 7 साल तक सजा देने का अधिकार हो सकता है। और सह न्यायाधीश को उच्च न्यायालय द्वारा प्रदान की गयी शक्तिया होती है जो की मुख्य न्यायाधीश के समान भी हो सकती है। और उनसे अलग भी हो सकती है। प्रथम वर्ग मैजिस्ट्रेट 3 साल तक की सजा देने का अधिकार है। इसके अनुसार जहा मुख्य नय्यधीश का पद रिक्त हो तो जिला न्यायाधीश या उससे नीचे का कोई रिक्त पद पर कार्य कर सकते है।

धारा 13

दंड संहिता के अनुसार विशेष न्यायिक मैजिस्ट्रेट –

केंद्र या राज्य सरकार उच्च न्यायालय से इसके लिए निवेदन कर सकती है ऐसा व्यक्ति जो राज्य या केंद्र सरकार मे कोई विशेष पद धारण किया हो तो उसको न्यायिक मैजिस्ट्रेट बना दिया जा सकता है परंतु तब तक उसको यह पद नही दिया जाएगा जब तक उसके पास न्यायिक पद पर कार्य करने की योग्यता न हो। उसमे विधिक अनुभव और योग्यता होनी चाहिए।

See Also  अपकृत्य विधि के अनुसार उपताप क्या होता है?

यदि कोई ऐसा व्यक्ति पद धारण करता है तो ऐसे व्यक्ति को किसी स्थानीय क्षेत्र मे जो महानगर नही है उसको दीतीय  वर्ग मैजिस्ट्रेट को या उसके अधीन या राज्य सरकार के अनुसार शक्तिया प्रदान कर सकती है।

इनकी नियुक्ति 1 वर्ष तक होती है। उच्च न्यायाधीश किसी महानगर मे उसको महानगर मैजिस्ट्रेट  की शक्तिया प्रदान कर सकता है। और इसके लिए भी राज्य सरकार और केंद्र सरकार की सहमति होना आवश्यक है।

धारा 14-

दंड संहिता के अनुसार न्यायिक मैजिस्ट्रेट की स्थानीय अधिकारिता-

 उच्च न्यायालय के अधीन मुख्य  मैजिस्ट्रेट उन सभी शक्तियों का परीक्षण कर सकता है जो की धारा 11 और धारा 12 के अनुसार क्षेत्राधिकार का निर्धारण कर सकता है।

विशेष न्यायिक मैजिस्ट्रेट  अपने क्षेत्र मे कही भी बैठक कर सकता है।

इसके अलावा कोई नयायिक मैजिस्ट्रेट को उसकी सीमा नही बताया गया है तो उनकी अधिकारिता संपूर्ण जिले मे होगा।

धारा 13, धारा 18 ,धारा 11 के अनुसार वह अपनी बैठक कर सकता है। सेसन न्यायालय और मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट पूरे जिले मे अपनी अधिकारिता रख सकता है। उसको पूरे जिले मे न्याय की शक्तिया प्राप्त होगी। मुख्य नाय्यधीश अपने से नीचे स्तर पर सभी न्यायालयों के होने वाले निर्णय पर नजर रख सकता है। तथा उच्च न्यायालय के साथ सहमति के द्वारा किसी की शक्तियों को घटा और बढ़ा भी सकता है। तथा आवश्यकता पड़ने पर किसी का कार्य किसी और को सौप सकता है। वह पूरे जिले की निगरानी कर सकता है। और न्याय संगत नियम बना सकता है।

धारा 15 –

 दंड संहिता के अनुसार न्यायिक मजिस्ट्रेट का अधीनस्थ होना।

See Also  (सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 231 से धारा 235 का विस्तृत अध्ययन

इसमे बताया गया है न्यायिक मजिस्ट्रेट किसके अधीन होगा। जिला न्यायालय सेसन् मजिस्ट्रेट के अधीन होता है। इसके अतिरिकत अन्य न्यायालय जैसे प्रथम मजिस्ट्रेट और दितीय मजिस्ट्रेट मुख्य न्यायाधीश के अधीन होता है।  

मुख्य न्यायधीश अपने अधीनस्थ न्यायालय को कार्य का वितरण करता है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायिक मजिस्ट्रेट के समछ् कार्य का वितरण करते है।

इस संहिता के अनुसार समय समय पर इसमे परिवर्तन किया जा सकता है।

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए नियम बना सकते हैं। यह उसके झेत्राधिकार् का भी निर्धारण करता है तथा समय समय पर इसका परीक्षण भी कर सकता है।

यह न्यायिक मजिस्ट्रेट के झेत्र को बढ़ा और धटा भी सकता है।

मुख्य न्यायाधीश न्यायधीश के कार्यो को वापस ले सकता है। उसके कार्य को किसी दूसरे को दे सकता है या खुद रख सकता है।

इस पोस्ट के माध्यम से हम अपने ज्ञान को आप तक पहुचाने का प्रयास कर रहे है। यदि इसमे कोई त्रुटि मिलती है या इसको बेहतर बनाने से संबन्धित आपका कोई सुझाव हो  या इससे संबन्धित कोई ज्ञान की बढ़ोतरी करनी है तो कृपया आप कमेंट बॉक्स के माध्यम से हमे सूचित करे ।

Leave a Comment