Labour law यानि की श्रम कानून क्या होता है। इसकी आवश्यकता क्यो पड़ी?

Labour Law in India- Hindi Law Notes


जैसा की आप सभी को ज्ञात होगा करोना महामारी की वजह से अधिकांश राज्य  आर्थिक मंदी से निपटने के लिए श्रम कानून को 3 साल के लिए स्थगित कर दिया है।

यह concurrent लिस्ट मे आता है। यह मालिक और लेबर के बीच सामञ्जसय बनाए रखने के लिए किया जाता है। यह विशेष कर श्रमिक के लिए लाभदायक होता है। इसमे 3 लॉं को एकट्ठा करके 2005 मे नया श्रम कानून बनाया गया। इसमे ट्रेड यूनियन 1919,dispute act 1947 और labour लॉं 1948 को एक्काठा करके बनाया गया। up गवर्नमेंट ने हाल मे कई संशोधन किए। यह श्रमिक को एक अधिकार प्रदान करता है।

कर्मचारियो या श्रमिक को समान अधिकार ,समान वेतन ,समान सुरक्षा आदि को सुनश्चित करने वाले कानून को श्रम कानून कहा जाता है। यह निजी और सार्वजनिक दोनों क्षेत्रो मे लागू होता है। इसका मुख्य उद्देश्य श्रमिक के मानशिक और शारीरिक शोषण को रोकना होता है।

यदि कोई व्यक्ति किसी उधोग मे कार्य करता है तो वह श्रमिक कहलाता है। और यदि उस पर किसी तरह का अत्याचार हो रहा होता है तो वह श्रम कानून की मदत ले सकता है।

श्रम कानून के अनुसार श्रमिक की दिहाड़ी 300 रुपये सुनश्चित की गयी तो हर श्रमिक का यह अधिकार है की उसको 300 रुपये कार्य करने के लिए प्राप्त हो। यदि कोई इसका उलंघन करता है तो मालिक को जुर्माना देना पड़ेगा ।

यदि कोई श्रमिक किसी कारखाने मे कार्य करता है तो उसके स्वास्थ का भी ध्यान रखना कारखाने के मालिक का उत्तरदायित्व है।

यह 2 भागो मे बाटा गया है।

उधोग और श्रम संबंधी विधान

सामाजिक सुरक्षा संबंधी विधान

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जब हम श्रम कानून की बात करते है तो श्रम कानून का मुख्य रूप अधोगिक संबंध और सामाजिक सुरक्षा है। यह बताता है की कर्मचारी का श्रमिक से कैसा संबंध होना चाहिए। यह कार्य विविधता को बताता है। श्रम कानून श्रमिक और उद्धोगपतियों को सम्मलित करता है। श्रम कानून सबसे पहले इंग्लैंड मे आया ।

उधोग और श्रम संबंधी विधान

यह ऐसे अधिनियम आते है जो उद्धोगपतियों से संबन्धित होता है।इसमे निम्न को सम्मलित किया जाता है।

श्रमजीवी क्षतिपूर्ति अधिनियम – यह अधिनियम 1923 मे पास हुआ। उस समय बड़ी  बड़ी फ़ैक्टरिया लगती थी और बड़ी मशीनों का प्रयोग होता था । इसमे कार्य करते हुए कई बार कर्मचारी और श्रमिक घायल हो जाते थे। कंपनी या फ़ैक्टरी उसको कुछ भी नही देती थी । उपर से उसको फ़ैक्टरी से निकाल देती थी अतः श्र्मिकों की सुरक्षा के लिए यह कानून लाया गया जिसको श्रमिक क्षतिपूर्ति अधिनियम का नाम दिया गया।

भारतीय श्रम संघ अधिनियम –

यह 1926 मे लाया गया । यह संघ का निर्माण करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इसके अंतर्गत श्रमिक अपनी एक संघ का निर्माण कर सकते है। तथा आवश्यकता पड़ने पर वह संघ इनके हिट मे कार्य करती है।

भ्रति भुगतान अधिनियम – यह अधिनियम 1936 मे लागू हुआ था। इसके अंतर्गत श्र्मिकों से संबन्धित सभी अधिकार को सरकार ने सुनश्चित कर दिया था। सरकार ने श्र्मिकों के लिए वेतन का निर्धारण कर रखा था जिससे सभी को समान रूप से वेतन मिल सके।

औधोगिक संघर्ष अधिनियम –

यह अधिनियम 1947 मे लागू हुआ था। इसमे श्रम को परिभाषित किया गया था। तथा इसमे सभी के कार्य और उसके वेतन को परिभाषित किया था और यह भी बताया गया था की इससे संबन्धित कभी किसी को परेशानी आती है तो वह किस कोर्ट मे जाएगा।

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कारख़ाना अधिनियम –

कारख़ाना अधिनियम 1948 मे लागू हुआ था। जिसका उद्देश्य कारखानो मे कार्य करने वाले मजदूरो के अधिकारो को सुनश्चित किया गया था। इसमे बताया गया था की मजदूर को कम से कम कितने घंटे कार्य करना होगा। और अधिकतम कितने घंटे कार्य कर सकते है। इनको समय से अधिक कार्य करने पर ओवरटाइम मिलेगा। इनकी सैलरी कितनी होगी। कारखाने के अंदर और कारखाने के बाहर का समय सुनश्चित किया गया है। यह बताया गया है की कोई कारखाने के अंदर कार्य करता है तो वह प्रतिदिन 8 घंटे से जादा कार्य नही कर कर सकता है और यदि वह कारखाने के बाहर कार्य करता है तो वह 9 घंटे कार्य करेगा ।

सामजिक सुरक्षा संबंधित अधिनियम-

इसके अंतर्गत समाज से संबन्धित अधिनियम पारित किया गया है।

इसके अंतर्गत निम्न को शामिल किया जाता है।

भारतीय गोदी श्रमिक अधिनियम –

यह अधिनियम 1934 मे लागू हुआ था। इसमे सरकार ने समुद्र के अंदर कार्य करने वाले श्रमिक के अधिकार को सुनश्चित किया है।

कोयला खान श्रमिक अधिनियम –

यह भी कारख़ाना अधिनियम के अनुसार ही कार्य करता है इसमे बच्चो को कारख़ाना मे कार्य कराना दंडनीय है। इसमे व्यष्क व्यक्ति ही कारखानो मे कार्य कर सकता है। तथा इसमे भी कारखाने के अंदर 8 घंटे कार्य कर सकते है तथा बाहर 9 घंटे कार्य कर सकते है।

कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम-

यह 1948 मे लाया गया था। यह 19 अप्रैल को लागू हुआ था यह सभी कारखानो मे लागू होता है। जिसमे सरकार के कारखानो मे लागू होता है। यह मौशमी कारखानो मे लागू नही होता है। यह उनपर लागू होता है जो एक साल मे 7 या उससे अधिक माह तक कार्य करती है। यह अधिनियम कर्मचारी को लाभ और उनके जीवन को सुरक्षित करने के लिए लाया जाता है। इसकी पूर्ति नियम करती है।

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धारा 3 के अनुसार नियम का गठन होता है। केंद्र इसका गठन सूचना द्वारा करती है इसमे एक उपाध्यछ होगा 5 से कम होगा जो अपने अपने राज्य से एक प्रतिनिधि होगा। संघ राज्य क्षेत्र से 1 व्यक्ति केंद्र नियुक्त करेगी। नियोजको के 10 प्रतिनिधि होगे । उनकी भी नियुक्ति केंद्र करेगी। कर्मचारियो के प्रतिनिधि भी 10 होंगे जो संघ दावरा चुने जाएंगे। संसद के3 सदस्य होंगे 2 लोकसभा से 1 राज्य सभा से होंगे। यह नियमित निकाय होती है इसकी अपनी स्टैम्प होता है। यह किसी के खिलाफ वाद प्रस्तुत कर सकती है और इसके खिलाफ भी कोई वाद कर सकता है।

निगम अपनी राशि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया मे जमा करेगा या उस बैंक मे जमा करेगा जिसमे केंद्र कहती है। सभी खर्च और धनराशि का हिशाब किताब रखता है। निगम अपने आय और खर्च का लेखा जोखा रखता है। यह 5 वर्ष के बाद निधियो का मूल्यांकन किया जाएगा। और यह समय समय पर इसका ध्यान रखता है।

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