दण्ड प्रक्रिया संहिता धारा 124 और 125 का विस्तृत अध्ययन

CrPC Section 124 and 125- Hindi Law Notes

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 123 तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 124

इस धारा मे बंधपत्र की शेष अवधि के लिए प्रतिभूति के बारे मे बताया गया है।
इस धारा के अनुसार जब किसी व्यक्ति को हाजिरी लगाने के लिए जो की 121 की उपधारा (3) के परंतुक के अधीन या धारा 123 की उपधारा (10) के अधीन समन या वारंट जारी किया गया है तो वहाँ पर मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष वह हाजिर होता है। या फिर उसको लाया जाता है । तब वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय ऐसे व्यक्ति द्वारा निष्पादित बंधपत्र को रद्द कर देगा । और उस व्यक्ति को ऐसे बंधपत्र की अवधि के शेष भाग के लिए उसी भांति की जैसी मूल प्रतिभूति थी उसको नई प्रतिभूति देने के लिए आदेश देगा।

इस धारा के अनुसार ऐसा प्रत्येक आदेश धारा 120 से धारा 123 तक की धाराओं के अंतर्गत प्रयोजनों के लिए जो की धारा 106 या धारा 117 के अधीन दिया गया आदेश समझा जाएगा।

धारा 125

इस धारा मे पत्नी तथा संतान और माता-पिता के भरणपोषण के लिए आदेश को बताया गया है।

जिसके अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पास पर्याप्त साधन उपलब्ध है।

(क) तो वह अपनी पत्नी का जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है। या

(ख) अपनी धर्मज या अधर्मज अवयस्क संतान का चाहे विवाहित हो या न हो जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है। या

(ग) अपनी धर्मज या अधर्मज संतान का (जो विवाहित पुत्री नहीं है)। जिसने वयस्कता प्राप्त कर ली है। जहां ऐसी संतान किसी शारीरिक या मानसिक असामान्यता या क्षति के कारण अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है। या

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(घ) अपने माता पिता का जो अपना भरणपोषण करने में असमर्थ है। और वह भरणपोषण करने में उपेक्षा करता है या भरणपोषण करने से इनकार करता है । तो वह व्यक्ति प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट के सामने ऐसी उपेक्षा या इनकार के साबित हो जाने पर प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को यह निदेश दे सकता है। कि वह अपनी पत्नी या ऐसी संतान पिता या माता के भरणपोषण के लिए ऐसी मासिक दर पर जो प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा बताई जाएगी उसके अनुसार मासिक भत्ता दे। और उस भत्ते का संदाय ऐसे व्यक्ति को करे जिसको संदाय करने का मजिस्ट्रेट समय-समय पर निर्देश देते रहे।

परंतु मजिस्ट्रेट खंड (ख) में निर्दिष्ट अवयस्क पुत्री के पिता को यह निर्देश दे सकता है। कि वह उस समय तक ऐसा भत्ता दे जब तक वह वयस्क नहीं हो जाती है। यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि ऐसी अवयस्क पुत्री के जो की वह विवाहित होऔर उसके पति के पास पर्याप्त साधन नहीं है।

इस उपधारा के अधीन भरणपोषण के लिए मासिक भत्ते के संबंध में कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति को यह आदेश दे सकता है। कि वह अपनी पत्नी या ऐसी संतान पिता या माता के अंतरिम भरणपोषण के लिए मासिक भत्ता और ऐसी कार्यवाही का व्यय दे। जिसे मजिस्ट्रेट के द्वारा बताया गया हो । और ऐसे व्यक्ति को उसका संदाय करे जिसको संदाय करने का मजिस्ट्रेट समय-समय पर निर्देश देते रहते है।

परंतु यह भी कि दूसरे परंतुक के अधीन अंतरिम भरणपोषण के लिए मासिक भत्ते और कार्यवाही के व्ययों का कोई आवेदन, यथासंभव, ऐसे व्यक्ति पर आवेदन की सूचना की तामील की तारीख से साठ दिन के भीतर निपटाया जाएगा।

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इस धारा के प्रयोजन के अनुसार-

(क) इसमे अवयस्क से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है। जिसके बारे में भारतीय वयस्कता अधिनियम, 1875 (1875 का 9) के उपबंधों के अधीन यह समझा जाता है कि उसने बयस्कता प्राप्त नहीं की है।

(ख) इसमे पत्नी के अंतर्गत ऐसी स्त्री भी शामिल है जिसके पति ने उससे विवाह-विच्छेद कर लिया है। या जिसने अपने पति से विवाहविच्छेद कर लिया है । और जिसने पुनर्विवाह नहीं किया है।

(2) भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण के लिए ऐसा कोई भत्ता और कार्यवाही के लिए व्यय, आदेश की तारीख से. या. यदि ऐसा आदेश दिया जाता है तो, यथास्थिति, भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण और कार्यवाही के व्ययों के लिए आवेदन की तारीख से संदेय होंगे।

(3) यदि कोई व्यक्ति जिसे यह आदेश दिया गया हो। कि उस आदेश का अनुपालन करने में पर्याप्त कारण के बिना असफल रहता है। तो उस आदेश के प्रत्येक भंग के लिए ऐसा कोई मजिस्ट्रेट देय रकम के ऐसी रीति से उद्गृहीत किए जाने के लिए वारंट जारी कर सकता है। जैसी रीति जुर्माने उद्गृहीत करने के लिए उपबंधित है। और ऐसे रीत के अनुसार उस वारंट के निष्पादन के पश्चात् प्रत्येक मास के न चुकाए गए ‘यथास्थिति, भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण के लिए पूरे भत्ते और कार्यवाही के व्यय या उसके किसी भाग के लिए ऐसे व्यक्ति को एक मास तक की अवधि के लिए अथवा यदि वह उससे पूर्व चुका दिया जाता है तो चुका देने के समय तक के लिए उसको कारावास का दंडादेश दे सकता है।

परंतु इस धारा के अधीन देय किसी रकम की वसूली के लिए कोई वारंट तब तक जारी न किया जाएगा जब तक उस रकम को उद्गृहीत करने के लिए उस तारीख से जिसको बह देय हुई एक वर्ष की अवधि के अंदर न्यायालय से आवेदन नहीं किया गया है।

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परंतु यह और कि यदि ऐसा कोई व्यक्ति इस शर्त पर भरणपोषण करने की प्रस्थापना कर सकता है कि उसकी पत्नी उसके साथ रहे । और वह पति के साथ रहने से इनकार करती है। तो ऐसे स्थित मे ऐसा मजिस्ट्रेट उसके द्वारा कथित इनकार के किन्हीं आधारों पर विचार कर सकता है। और ऐसी प्रस्थापना के किए जाने पर भी वह इस धारा के अधीन आदेश दे सकता है । और यह न्याय संगत होना चाहिए।

स्पष्टीकरण-
यदि पति ने अन्य किसी स्त्री से विवाह कर लिया है । या वह कोई रखेल रखता है। तो यह उसकी पत्नी द्वारा उसके साथ रहने से इनकार का न्यायसंगत आधार माना जाएगा।

(4) कोई पत्नी यदि वह जारता की दशा में रह रही है अथवा यदि वह पर्याप्त कारण के बिना अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है अथवा यदि वे पारस्परिक सम्मति से पृथक् रह रहे हैं। अपने पति से इस आधार के अधीन यथास्थिति, भरणपोषण या अंतरिम भरणपोषण के लिए भत्ता और कार्यवाही के व्यय प्राप्त करने की हकदार न होगी।

(5)कोई पत्नी यदि वह जारता की दशा में रह रही है अथवा यदि वह पर्याप्त कारण के बिना अपने पति के साथ रहने से इनकार करती है अथवा यदि वे पारस्परिक सम्मति से पृथक् रह रहे हैं तो मजिस्ट्रेट यह साबित होने पर आदेश को रद्द कर सकता है ।

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