भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 168 से 170 तक का वर्णन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में हमने भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 167 तक का वर्णन किया था अगर आप इन धाराओं का अध्ययन कर चुके है। तो यह आप के लिए लाभकारी होगा । यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

अनुच्छेद 168

इस अनुच्छेद के अनुसार राज्यों के विधान-मंडलों का गठन को बताया गया है।

(1) इस अनुच्छेद के अनुसार प्रत्येक राज्य के लिए एक विधानमंडल होगा और जो राज्यपाल और –

(क) बिहार ,कर्नाटक उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में दो सदनों से तथा
(ख) अन्य राज्यों में एक सदन से
मिलकर बनेगा।

(2) किसी राज्य के विधानमंडल के दो सदन हैं । तो वहां एक का नाम विधान परिषद और दूसरे का नाम विधानसभा होगा।  और  यदि केवल एक ही  सदन है  तो वहां उसका नाम विधानसभा होगा।

इसमे निम्न संशोधन किया गया है।

इसमे ” आंध्र प्रदेश” शब्दों का आंध्र प्रदेश विधान परिषद (उत्सादन) अधिनियम 1985 (1985 का 34) की धारा 4 के द्वारा (1-6-1985 से) लोप किया गया।

मुंबई पुनर्गठन अधिनियम 1960 (1960 का 11) की धारा 20  के द्वारा (1-5-1960 से) ” मुंबई” शब्द का लोप किया गया।

इस उपखंड में ” मध्य प्रदेश” शब्दों के अंतःस्थापन के लिए संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 8(2) के अधीन कोई तारीख नियत नहीं की गई है।

तमिलनाडु विधान परिषद (उत्सादन) अधिनियम 1986 (1986 का 40) की धारा 4 के द्वारा (1-11-1986 से) ” तमिलनाडु” शब्द का लोप किया गया।

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मुंबई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 (1960 का 11) की धारा 20  के द्वारा (1-5-1960 से ) अंतःस्थापित।

मैसूर राज्य (नाम-परिवर्तन) अधिनियम, 1973 (1973 का 31) की धारा 4 के  द्वारा (1-11-1973 से) ” मैसूर” के स्थान पर प्रतिस्थापित जिसे संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम, 1956 की धारा 8(1) द्वारा अंतःस्थापित किया गया था।

पंजाब विधान परिषद (उत्सादन) अधिनियम, 1969 (1969 का 46) की धारा 4 के द्वारा (7-1-1970 से) ” पंजाब” शब्द का लोप किया गया।

पश्चिमी बंगाल विधान परिषद (उत्सादन) अधिनियम, 1969 (1969 का 20) की धारा 4 के द्वारा (1-8-1969 से) ” उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बंगाल” के स्थान पर प्रतिस्थापित।

अनुच्छेद 169

इस अनुच्छेद के अनुसार राज्यों में विधान परिषदों का उत्सादन या सृजन को बताया गया है।

(1) अनुच्छेद 168 में किसी बात के होते हुए भी किसी विधि के द्वारा  किसी विधान परिषद वाले राज्य में विधान परिषद के उत्सादन के लिए या ऐसे राज्य में जिसमें विधान परिषद नहीं होती है। वहा  विधान परिषद के सृजन के लिए उपबंध कर सकेगी। तथा  यदि उस राज्य की विधानसभा ने इस आशय का संकल्प विधानसभा की कुल सदस्य संख्या के बहुमत द्वारा तथा उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों की संख्या के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित कर दिया है।

(2) इस अनुच्छेद के खंड (1) में विनिर्दिष्ट किसी विधि में इस संविधान के संशोधन के लिए ऐसे उपबंध अंतर्विष्ट किए गए होंगे । जो उस विधि के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए आवश्यक होते है। तथा ऐसे अनुपूरक, आनुषंगिक और पारिणामिक उपबंध भी अंतर्विष्ट हो सकेंगे जिन्हें संसद आवश्यक समझती है।

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(3) पूर्वोक्त प्रकार की कोई विधि अनुच्छेद 368 के प्रयोजनों के लिए इस संविधान का संशोधन नहीं समझी जाएगी।

अनुच्छेद 170

इस अनुच्छेद मे विधान सभाओं की संरचना को बताया गया है।

(1) अनुच्छेद 333 के उपबंधों  के अधीन रहते हुए  यह कहा गया है कि प्रत्येक राज्य की विधान सभा उस राज्य में प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से संबन्धित प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने हुए पांच सौ से अनधिक और साठ से अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगी ।

(2)इसमे अनुच्छेद के अनुसार  खंड (1) के प्रयोजनों के लिए जिसमें प्रत्येक राज्य को प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में ऐसी  रीति से विभाजित किया जाएगा।   कि प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र की जनसंख्या का उसको आवंटित स्थानों की संख्या से अनुपात समस्त राज्य में यथासाध्य एक ही हो ।]

स्पष्टीकरण —

इस खंड में “जनसंख्या”पद  से ऐसी  अंतिम पूर्व वर्ती जनगणना में अभिनिाश्चित की गई जनसंख्या को अभिप्रेत किया गया है जिसके सुसंगत आंकड़े प्रकाशित हो गए हैं ।  परंतु  इस स्पष्टीकरण में अंतिम पूर्ववर्ती जनगणना के प्रति जिसके सुसंगत आंकड़े प्रकाशित हो गए हैं।   इस अनुसार  पहली  जनगणना के सुसंगत आंकड़े प्रकाशित नहीं  हो जाते हैं। तब तक  यह अर्थ लगाया जाएगा  कि वह  2001  की जनगणना के प्रति निर्देश है ।

(3) प्रत्येक जनगणना की समाप्ति  पर यहा   प्रत्येक राज्य की विधान सभा में स्थानों की कुल संख्या और प्रत्येक राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन क्षेत्रों में विभाजन का ऐसे  प्राधिकारी द्वारा या फिर किसी  ऐसी  रीति से पुनः समायोजन किया जाएगा ।  जो संसद् विधि  के द्वारा अवधारित करता है।  परंतु  ऐसे  पुनः समायोजन से विधान सभा में प्रतिनिधित्व पद  पर  तब तक कोई प्रभाव नहीं  पड़ेगा जब तक उस समय विद्यमान विधान सभा का विघटन नहीं  हो जाता है ।

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स्पष्टीकरण –

इस अनुसार   पुनः  समायोजन उस तारीख से प्रभावी होगा जो राष्ट्रपति  के आदेश के  द्वारा विनिर्दिष्ट  करे । और उसे  पुनः  समायोजन के प्रभावी होने तक विधान सभा के लिए  कोई निर्वाचन उन प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों के आधार पर  हो सकेगा । जो कि ऐसे  पुनः  समायोजन के पहले  विद्यमान हैं

इस खंड के अधीन –

प्रत्येक राज्य की विधान सभा में 1971 की जनगणना के आधार पर  पुनः  समायोजित स्थानों की कुल संख्या का और उन संख्या का जो –

ऐसे  राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन का जो कि 2001 की जनगणना के आधार पर पुनः  समायोजित किए  जाएं या फिर  उसका  पुनः  समायोजन आवश्यक नहीं  होगा ।

हमारी Hindi law notes classes के नाम से video भी अपलोड हो चुकी है तो आप वहा से भी जानकारी ले सकते है। कृपया हमें कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है।और अगर आपको किसी अन्य पोस्ट के बारे मे जानकारी चाहिए तो आप उससे संबन्धित जानकारी भी ले सकते है।

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