(सीआरपीसी) दण्ड प्रक्रिया संहिता धारा 172 तथा 173 का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 171  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 172

इस धारा के अनुसार प्रत्येक पुलिस अधिकारी को अन्वेषण की दिन प्रतिदिन की स्थिति को इस डायरी में लिखना होगा तथा  अन्वेषण के विवरण के साथ-साथ उसे अपने द्वारा देखे गए स्थानों एवं समय को उल्लेख करने की आवश्यकता होती है। धारा 172 (1)  के  प्रत्येक पुलिस अधिकारी को जो इस अध्याय के अधीन अन्वेषण करता है। और  अन्वेषण में की गयी अपनी कार्यवाही को दिन-प्रतिदिन अपने  डायरी में लिखेगा।  

जिसमे वह समय जब उसे इत्तिला मिली, वह समय जब उसने अन्वेषण आरम्भ किया और जब समाप्त किया तथा  वह स्थान या वे स्थान जहाँ वह गया और अन्वेषण द्वारा अभिनिश्चित परिस्थितियों का विवरण होगा  आपराधिक अदालतों के पास इन डायरियों को मंगाने की शक्ति है। तथा  जो उन मामलों से सम्बंधित हैं जिन मामलों की सुनवाई चल रही है।

हालांकि प्रावधान स्पष्ट करते हैं कि डायरी का उपयोग केवल एक जांच या विचारण में सहायता करने के लिए किया जाता है।  और यह डायरी सबूत के रूप में कार्य नहीं करती है। धारा 172 (2)  के अनुसार  कोई दंड न्यायालय ऐसे न्यायालय में जांच या विचारण के अधीन मामले की पुलिस डायरी को माँगा सकता है ।

और ऐसी डायरियों को मामले में साक्ष्य के रूप में तो नहीं किन्तु ऐसी जांच या विचारण में अपनी सहायता के लिए उपयोग में ला सकता है।  नकारात्मक खंड है जिसमें यह कहा गया है कि न तो आरोपी व्यक्ति और न ही उसका कोई प्रतिनिधि जो की  डायरी में वर्णित विवरण की मांग कर सकता है।

भले ही डायरी को अदालत में संदर्भित किया गया हो जिसमे  लेकिन उन्हें इसे देखने का अधिकार नहीं है। धारा 172 (3)  के अनुसार  न तो अभियुक्त और न ही उसके अभिकर्ता ऐसी डायरियों को मांगने के हक़दार होंगे और न वह या वे केवल इस कारण उन्हें देखने के हक़दार होंगे कि वे न्यायालय द्वारा देखी गयी है, किन्तु यदि वे उस पुलिस अधिकारी द्वारा, जिसने उन्हें लिखा है।  

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अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए उपयोग में लायी जाती है।  या यदि न्यायालय उन्हें ऐसी पुलिस अधिकारी की बातों का खंडन करने के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाता है । तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की, यथास्थिति धारा 161 या धारा 145 के उपबंध लागू होंगे।

गौरतलब है कि केवल तभी एक आरोपी व्यक्ति डायरी को देख सकता है जब अदालत में पुलिस अधिकारी द्वारा प्रस्तुत किए गए सबमिशन का खंडन करने के लिए अदालत डायरी में विवरण का उपयोग करती है अथवा उस डायरी का उपयोग पुलिस अधिकारी ने अपनी स्मृति को ताज़ा करने के लिए किया है।

यह अपवाद भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 के तहत उल्लिखित प्रावधानों द्वारा प्रदान किया गया है। यह भी ध्यान रखने योग्य बात है कि केस डायरी किसी मामले की जांच या सुनवाई में अदालत की सहायता करने का एक माध्यम है, लेकिन इसका उपयोग हार्ड कोर सबूत के रूप में नहीं किया जा सकता है। इसका मतलब यह है कि इसमें निहित किसी भी तारीख, तथ्य या बयान को सबूत नहीं माना जाता है।

धारा 173

इस धारा के अनुसार अन्वेषण के समाप्त हो जाने पर पुलिस अधिकारी की रिपोर्ट के बारे मे बताया गया है।
 (1) इस अध्याय के अधीन किया जाने वाला प्रत्येक अन्वेषण अनावश्यक विलंब के बिना पूरा किया जाएगा।

(1क) बालिका के साथ बलात्संग के संबंध में अन्वेषण उस तारीख से जिसको पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी द्वारा इत्तिला अभिलिखित की गई थी। जिसको  तीन मास के भीतर पूरा किया जा सकेगा।]

(2) (i) जैसे ही वह पूरा होता है, वैसे ही पुलिस थाने का भारसाधक अधिकारी, पुलिस रिपोर्ट पर उस अपराध का संज्ञान करने के लिए सशक्त मजिस्ट्रेट को राज्य सरकार द्वारा विहित प्ररूप में एक रिपोर्ट भेजेगा इसमे निम्न बात लिखित होगी ।

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(क) पक्षकारों के नाम

(ख) इत्तिला का स्वरूप

(ग) मामले की परिस्थितियों से परिचित प्रतीत होने वाले व्यक्तियों के नाम ;

(घ) क्या कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है और यदि किया गया प्रतीत होता है, तो किसके द्वारा ;

(ङ) क्या अभियुक्त गिरफ्तार कर लिया गया है ;

(च) क्या वह अपने बंधपत्र पर छोड़ दिया गया है और यदि छोड़ दिया गया है तो वह बंधपत्र प्रतिभुओं सहित है या प्रतिभुओं रहित;

(छ) क्या वह धारा 170 के अधीन अभिरक्षा में भेजा जा चुका है।

(ज) जहां अन्वेषण भारतीय दंड संहिता, (1860 का 45) की धारा 376,376क, धारा 376ख, धारा 376ग, धारा 3761 या धारा 3766] के अधीन किसी अपराध के संबंध में है, वहां क्या स्त्री की चिकित्सा परीक्षा की रिपोर्ट संलग्न की गई है।

(ii) वह अधिकारी अपने द्वारा की गई कार्यवाही की संसूचना, उस व्यक्ति को, यदि कोई हो, जिसने अपराध किए जाने के संबंध में सर्वप्रथम इत्तिला दी उस रीति से देगा, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए।

(3) जहां धारा 158 के अधीन कोई वरिष्ठ पलिस अधिकारी नियुक्त किया गया है वहां ऐसे किसी मामले में, जिसमें राज्य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसा निदेश देती है, वह रिपोर्ट उस अधिकारी के माध्यम से दी जाएगी और वह, मजिस्ट्रेट का आदेश होने तक के लिए, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को यह निदेश दे सकता है कि वह आगे और अन्वेषण करे।

(4) जब कभी इस धारा के अधीन भेजी गई रिपोर्ट से यह प्रतीत होता है कि अभियुक्त को उसके बंधपत्र पर छोड़ दिया गया है तब मजिस्ट्रेट उस बंधपत्र के उन्मोचन के लिए या अन्यथा ऐसा आदेश करेगा जैसा वह ठीक समझे।

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(5) जब ऐसी रिपोर्ट का संबंध ऐसे मामले से है जिसको धारा 170 लागू होती है, तब पुलिस अधिकारी मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट के साथ-साथ निम्नलिखित भी भेजेगा:

(क) वे सब दस्तावेज या उनके सुसंगत उद्धरण, जिन पर निर्भर करने का अभियोजन का विचार है और जो उनसे भिन्न हैं जिन्हें अन्वेषण के दौरान मजिस्ट्रेट को पहले ही भेज दिया गया है।

(ख) उन सब व्यक्तियों के, जिनकी साक्षियों के रूप में परीक्षा करने का अभियोजन का विचार है, धारा 161 के अधीन अभिलिखित कथन।

(6) यदि पुलिस अधिकारी की यह राय है कि ऐसे किसी कथन का कोई भाग कार्यवाही की विषयवस्तु से सुसंगत नहीं है या उसे अभियुक्त को प्रकट करना न्याय के हित में आवश्यक नहीं है और लोकहित के लिए समीचीन है तो वह कथन के उस भाग को प्रदर्शित करेगा और अभियुक्त को दी जाने वाली प्रतिलिपि में से उस भाग को निकाल देने के लिए निवेदन करते हुए और ऐसा निवेदन करने के अपने कारणों का कथन करते हुए एक नोट मजिस्ट्रेट को भेजेगा।

(7) जहां मामले का अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी ऐसा करना सुविधापूर्ण समझता है वहां वह उपधारा (5) में निर्दिष्ट सभी या किन्हीं दस्तावेजों की प्रतियां अभियुक्त को दे सकता है।

(8) इस धारा की कोई बात किसी अपराध के बारे में उपधारा (2) के अधीन मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट भेज दी जाने के पश्चात् आगे और अन्वेषण को प्रवरित करने वाली नहीं समझी जाएगी तथा जहां ऐसे अन्वेषण पर पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को कोई अतिरिक्त मौखिक या दस्तावेजी साक्ष्य मिले वहां वह ऐसे साक्ष्य के संबंध में अतिरिक्त रिपोर्ट या रिपोर्ट मजिस्ट्रेट को विहित प्ररूप में भेजेगा, और उपधारा (2) से (6) तक के उपबंध ऐसी रिपोर्ट या रिपोर्टों के बारे में, जहां तक हो सके, ऐसे लागू होंगे, जैसे वे उपधारा (2) के अधीन भेजी गई रिपोर्ट के संबंध में लागू होते हैं।

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