(सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 206 से धारा 208 का विस्तृत अध्ययन

crpc section 206 to 208- Hindi Law Notes

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 205  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं
नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 206

इस धारा के अनुसार छोटे अपराधों के मामले में विशेष समन के बारे मे बताया गया है।

जिसके अनुसार  यदि किसी छोटे अपराध का संज्ञान करने वाले मजिस्ट्रेट की राय में,यदि  मामले को धारा 260 या धारा 261 के अधीन संक्षेपतः निपटाया जा सकता है । तो उस दशा मे वह मजिस्ट्रेट उस दशा के सिवाय जहां उन कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे उसकी प्रतिकूल राय है। तथा अभियुक्त से यह अपेक्षा करते हुए उसके लिए समन जारी करेगा कि वह विनिर्दिष्ट तारीख को मजिस्ट्रेट के समक्ष या तो स्वयं या प्लीडर द्वारा हाजिर हो या वह मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर हुए बिना आरोप का दोषी होने का अभिवचन करना चाहता है  तो लिखित रूप में उक्त अभिवाक और समन में विनिर्दिष्ट जुर्माने की रकम डाक या संदेशवाहक द्वारा विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व भेज दे या यदि वह प्लीडर हाज़िर होना चाहता है ।

और ऐसे प्लीडर द्वारा उस आरोप के दोषी होने का अभिवचन करना चाहता है । तो प्लीडर को अपनी ओर से आरोप के दोषी होने का अभिवादन करने के लिए लिखकर प्राधिकृत करे और ऐसे प्लीडर की मार्फत जुर्माने का संदाय करे ।
परन्तु ऐसे समन में विनिर्दिष्ट जुर्माने की रकम 1000 से अधिक नही होनी चाहिए।

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इस धारा के प्रयोजनों के लिए “छोटे अपराध” मे से कोई ऐसा अपराध अभिप्रेत है । जो केवल एकहजार रुपये से अनधिक जुर्माने से दण्डनीय है किन्तु इसके अन्तर्गत कोई ऐसा अपराध नहीं है।  जो मोटर यान अधिनियम, 1939 (1939 का 4) के अधीन या किसी अन्य ऐसी विधि के अधीन पाया गया है।  जिसमें दोषी होने के अभिवाक् पर अभियुक्त की अनुपस्थिति में उसको दोषसिद्ध करने के लिए उपबन्ध है।  इस प्रकार दण्डनीय है।

इसमे  राज्य सरकार, किसी मजिस्ट्रेट को उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे अपराध के सम्बन्ध में करने के लिए जो धारा 320 के अधीन शमनीय है।  या जो कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से अधिक नहीं है, या जुर्माने से या दोनों से दण्डनीय है। तो वह  अधिसूचना द्वारा विशेष रूप से वहां सशक्त कर सकती है।  जहां मामले के तथ्यों और परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए मजिस्ट्रेट की राय है कि केवल जुर्माना अधिरोपित करने से ही न्याय के उद्देश्य पूरे हो जाएंगे।

धारा 207

इस धारा के अनुसार अभियुक्त को पुलिस रिपोर्ट या अन्य दस्तावेजों की प्रतिलिपि देने को बताया गया है।

किसी ऐसे मामले में जहां कार्यवाही पुलिस रिपोर्ट के आधार पर संस्थित की गई है, मजिस्ट्रेट निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रतिलिपि अभियुक्त को अविलम्ब निःशुल्क देगा :-
(i) पुलिस रिपोर्ट
(ii) धारा 154 के अधीन लेखबद्ध की गई प्रथम इत्तिला रिपोर्ट
(iii) धारा 161 की उपधारा (3) के अधीन अभिलिखित उन सभी व्यक्तियों के वह  कथन जिनकी अपने साक्षियों के रूप में परीक्षा करने का अभियोजन का विचार है। तथा  उनमें से किसी ऐसे भाग को छोड़कर जिनको ऐसे छोड़ने के लिए निवेदन धारा 173 की उपधारा (6) के अधीन पुलिस अधिकारी द्वारा किया गया है।
(iv) धारा 164 के अधीन लेखबद्ध की गई संस्वीकृति में या कथन, यदि कोई हों तो
(v) कोई अन्य दस्तावेज या उसका सुसंगत उद्धरण, जो धारा 173 की उपधारा (5) के अधीन पुलिस रिपोर्ट के साथ मजिस्ट्रेट को भेजी गई है;
परन्तु मजिस्ट्रेट खण्ड

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(vi) में निर्दिष्ट कथन के किसी ऐसे भाग का परिशीलन करने और ऐसे निवेदन के लिए पुलिस अधिकारी द्वारा दिए गए कारणों पर विचार करने के पश्चात् यह निदेश दे सकता है कि कथन के उस भाग की या उसके ऐसे प्रभाग की, जैसा मजिस्ट्रेट ठीक समझे, एक प्रतिलिपि अभियुक्त को दी जाए ;
परन्तु यह और कि यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि खण्ड

 (vii) में निर्दिष्ट कोई दस्तावेज विशालकाय है तो वह अभियुक्त को उसकी प्रतिलिपि देने के बजाए यह निदेश देगा कि उसे स्वयं या प्लीडर द्वारा न्यायालय में उसका निरीक्षण ही करने दिया जाएगा

धारा 208

इस धारा के अनुसार सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय अन्य मामलों में अभियुक्त को कथनों और दस्तावेजों की प्रतिलिपि में देना बताया गया है।

इसके अनुसार जहां पुलिस रिपोर्ट से भिन्न आधार पर संस्थित किसी मामले में जहा पर  धारा 204 के अधीन आदेशिका जारी करने वाले मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है, वहां मजिस्ट्रेट निम्नलिखित में से प्रत्येक की एक प्रतिलिपि अभियुक्त को अविलंब निःशुल्क देगा–

(i) उन सभी व्यक्तियों के, जिनकी मजिस्ट्रेट द्वारा परीक्षा की जा चुकी है। जहा पर  धारा 200 या धारा 202 के अधीन लेखबद्ध किए

गए कथन

(ii) धारा 161 या धारा 164 के अधीन लेखबद्ध किए गए कथन, और संस्वीकृतियां, यदि कोई हों–

(iii) मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश की गई कोई दस्तावेजें, जिन पर निर्भर रहने का अभियोजन का विचार है : परंतु यदि मजिस्ट्रेट का समाधान हो जाता है कि ऐसी कोई दस्तावेज विशालकाय है, तो वह अभियुक्त को उसकी प्रतिलिपि देने के बजाय यह निदेश देगा कि उसे स्वयं या प्लीडर द्वारा न्यायालय में उसका निरीक्षण ही करने दिया जाएगा।

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