(सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 209 से धारा 212 का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 208  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं
नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझनेमें आसानी होगी।

धारा 209

इस धारा के अनुसार जब अपराध अनन्यत: सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है तब मामला उसे सुपुर्द करना बताया गया है।

इस धारा के अनुसार जब पुलिस रिपोर्ट पर या अन्यथा संस्थित किसी मामले में अभियुक्त मजिस्ट्रेट के समक्ष हाजिर होता है।  या लाया जाता है । और मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि अपराध अनन्यतः सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय है । तो वह

(क) यथास्थिति, धारा 207 या धारा 208 के उपबंधों का अनुपालन करने के पश्चात् मामला सेशन न्यायालय को सुपुर्द करेगा । और जमानत से संबंधित इस संहिता के उपबंधों के अधीन रहते हुए अभियुक्त व्यक्ति को अभिरक्षा में तब तक के लिए प्रतिप्रेषित करेगा जब तक ऐसी सुपुर्दगी नहीं कर दी जाती है :]

(ख) जमानत से संबंधित इस संहिता के उपबंधों के अधीन रहते हुए विचारण के दौरान और समाप्त होने तक अभियुक्त की अभिरक्षा में प्रतिप्रेषित करेगा।

(ग) मामले का अभिलेख तथा दस्तावेजें और वस्तुं, यदि कोई हों, जिन्हें साक्ष्य में पेश किया जाना है, उस न्यायालय को भेजेगा।

(घ) मामले के सेशन न्यायालय को सुपुर्द किए जाने की लोक अभियोजक को सूचना देगा।

धारा 210

इस धारा के अनुसार परिवाद वाले मामले में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया और उसी अपराध के बारे में पुलिस अन्वेषण को बताया गया है।

(1) इस धारा के अनुसार जब पुलिस रिपोर्ट से भिन्न आधार पर संस्थित किसी मामले में जिसे इसमें इसके पश्चात् परिवाद वाला मामला कहा गया है। जिसमे मजिस्ट्रेट द्वारा की जाने वाली जांच या विचारण के दौरान उसके समक्ष यह प्रकट किया जाता है । कि उस अपराध बारे में जो उसके द्वारा की जाने वाली जांच या विचारण का विषय है पुलिस द्वारा अन्वेषण हो रहा है, तब मजिस्ट्रेट ऐसी जांच या विचारण की कार्यवाहियों को रोक देगा और अन्वेषण करने वाले पुलिस अधिकारी से उस मामले की रिपोर्ट मांगेगा।

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(2) यदि अन्वेषण करने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा धारा 173 के अधीन रिपोर्ट की जाती है और ऐसी रिपोर्ट पर मजिस्ट्रेट द्वारा ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध किसी अपराध का संज्ञान किया जाता है । जिसमे  परिवाद वाले मामले में अभियुक्त है । तोउसमे  मजिस्ट्रेट परिवाद वाले मामले की और पुलिस रिपोर्ट से पैदा होने वाले मामले की जांच या विचारण साथ-साथ ऐसे करेगा मानों दोनों मामले पुलिस रिपोर्ट पर संस्थित किए गए हैं।

(3) यदि पुलिस रिपोर्ट परिवाद वाले मामले में किसी अभियुक्त से सम्बन्धित नहीं है या यदि मजिस्ट्रेट पुलिस रिपोर्ट पर किसी अपराध का संज्ञान नहीं करता है तो वह उस जांच या विचारण में जो उसके द्वारा रोक ली गई थी, इस संहिता के उपबन्धों के अनुसार कार्यवाही करेगा।

धारा 211

इस धारा के अनुसार आरोप की अंतर्वस्तु को बताया गया है।
(1) इस संहिता के अधीन प्रत्येक आरोप में उस अपराध का कथन होगा जिसका अभियुक्त पर आरोप है।

(2) यदि उस अपराध का सुजन करने वाली विधि द्वारा उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम दिया गया है।  तो आरोप में उसी नाम से उस अपराध का वर्णन किया जाएगा।

(3) यदि उस अपराध का सृजन करने वाली विधि द्वारा उसे कोई विनिर्दिष्ट नाम नहीं दिया गया है । तो अपराध की इतनी परिभाषा देनी होगी जितनी से अभियुक्त को उस बात की सूचना हो जाए जिसका उस पर आरोप है।

(4) वह विधि और विधि की वह धारा, जिसके विरुद्ध अपराध किया जाना कथित है, आरोप में उल्लिखित होगी।

(5) यह तथ्य कि आरोप लगा दिया गया है इस कथन के समतुल्य है कि विधि द्वारा अपेक्षित प्रत्येक शर्त जिससे आरोपित अपराध बनता है उस विशिष्ट मामले में पूरी हो गई हैं।

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(6) आरोप न्यायालय की भाषा में लिखा जाएगा।

(7) यदि अभियुक्त किसी अपराध के लिए पहले दोषसिद्ध किए जाने पर किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए ऐसी पूर्व दोषसिद्धि के कारण वर्धित दंड का या भिन्न प्रकार के दंड का भागी है और यह आशयित है कि ऐसी पूर्व दोषसिद्धि उस दंड को प्रभावित करने के प्रयोजन के लिए साबित की जाए जिसे न्यायालय पश्चात्वर्ती अपराध के लिए देना ठीक समझे तो पूर्व दोषसिद्धि का तथ्य, तारीख और स्थान आरोप में कथित होंगे; और यदि ऐसा कथन रह गया है तो न्यायालय दंडादेश देने के पूर्व किसी समय भी उसे जोड़ सकेगा।

धारा 212

इस धारा के अनुसार समय, स्थान और व्यक्ति के बारे में विशिष्टियां को बताया गया है।
(1) इस धारा के अनुसार अभिकथित अपराध के समय और स्थान के बारे में और जिस व्यक्ति के  बारे मे यदि कोई हो विरुद्ध अथवा जिस वस्तु के (यदि कोई हो) विषय में वह अपराध किया गया उस व्यक्ति या वस्तु के बारे में ऐसी विशिष्टियां जैसी अभियुक्त को उस बात की, जिसका उस पर आरोप है।  सूचना देने के लिए उचित रूप से पर्याप्त हैं आरोप में अंतर्विष्ट होंगी।

(2) जब अभियुक्त पर आपराधिक न्यासभंग या बेईमानी से धन या अन्य जंगम संपत्ति के दुर्विनियोग का आरोप है तब इतना ही पर्याप्त होगा कि विशिष्ट मदों का जिनके विषय में अपराध किया जाना अभिकथित है।  या अपराध करने की ठीक-ठीक तारीखों का विनिर्देश किए बिना यथास्थिति, उस सकल राशि का विनिर्देश या उस जंगम संपत्ति का वर्णन कर दिया जाता है । जिसके विषय में अपराध किया जाना अभिकथित है।  और उन तारीखों का, जिनके बीच में अपराध का किया जाना अभिकथित हैऔर  विनिर्देश कर दिया जाता है । और ऐसे विरचित आरोप धारा 219 के अर्थ में एक ही अपराध का आरोप समझा जाएगा।

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परंतु ऐसी तारीखों में से पहली और अंतिम के बीच का समय एक वर्ष से अधिक का न होगा।

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