दंड प्रक्रिया संहिता धारा 23 से 28 तक का अध्ययन

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 23

यह कार्य पालक मजिस्ट्रेट का अधीनस्थ होना-

यह अपर जिला मजिस्ट्रेट को छोड़कर बाकी सभी जिला मजिस्ट्रेट के अंतर्गत आता है। सभी कार्य पालक मजिस्ट्रेट जिला मजिस्ट्रेट के अंतर्गत आता है अपर जिला मजिस्ट्रेट इसकी श्रेणी मे रहेगा परंतु अंतर्गत नही होगा। उपखंड मजिस्ट्रेट के अंतर्गत आने वाले सभी मजिस्ट्रेट इसके अंदर मे कार्य करेंगे।

इसमे जिला मजिस्ट्रेट अपर जिला मजिस्ट्रेट के कार्य के आवंटन और कार्य पालक मजिस्ट्रेट को आदेश दे सकता है कार्य का अवनतंकर सकता है तथा कार्य का विभाजन कर सकता है यह सभी इस दंड संहिता के अंतर्गत आता है।

दंड प्रक्रिया संहिता 1898 के अनुसार धारा 23 को धारा 17 के रूप मे लागू हुआ था जो अब धारा 23 मे दिया गया है।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 24

इसके अंतर्गत लोक अभियोजक  को बताया गया है। इसका मतलब सरकारी वकील से है। जैसा की आपको पता होगा की सरकार को एक सरकारी वकील की आवश्यकता होती है।

प्रत्येक उच्च न्यायालय के लिए केंद्र सरकार या राज्य  सरकार उच्च न्यायालय के पश्चात भारत सरकार या राज्य  सरकार की तरफ से यदि कोई वाद चल रहा है तो एक सरकारी वकील की नियुक्ति की जाती है। यह एक से अधिक भी हो सकती है।

केंद्र सरकार किसी जिले या स्थानीय क्षेत्र मे किसी वर्ग या किसी विशेष न्यायालय के लिए एक या उससे अधिक लोक अभियोजक नियुक्त कर सकता है।

सभी जिले के लिए राज्य सरकार एक सरकारी वकील और एक या उससे अधिक अपर लोक अभियोजक की नियुक्ति कर सकती है परंतु एक जिले का सरकारी वकील अन्य जिले के लिए भी लोक अभियोजक बनाया जा सकता है।

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जिला मजिस्ट्रेट सेसन न्यायालय के अनुसार एक रिपोर्ट या पननेल तैयार किया जाता है जिससे लोक अभियोजक की नियुक्ति होगी।

जिला अभियोजक या स्थानीय लोक अभियोजक बनने के लिए व्यक्ति का पैनेल मे होना अति आवश्यक होता है। बिना पैनेल मे नाम हुए कोई भी लोक अभियुक्त नही बन सकता है।

यदि पैनल मे से किसी व्यक्ति द्वारा संगठन बनाया गया है उसमे से कोई व्यक्ति की नियुक्ति कर सकता है परंतु जहा पैनल नही है वह जिला मजिस्ट्रेट के द्वारा पैनल मे से कोई चुना जा सकता है। वह व्यक्ति 7 साल से अधिवक्ता रह चुका हो।

केंद या राज्य सरकार किसी वर्ग विशेष के लिए या विशेस सरकारी वकील बनने के लिए उसकी विधि व्यवसाय 10 वर्ष पूर्ण हो चुकी हो।

यदि किसी व्यक्ति को लोक  अभियोजक बनाया गया है। और वह लोक अभियोजक के रूप मे कार्य कर रहा है तो उस अवदी को जिस पर वह कार्य किया है उस अवधि को विधि व्यवसाय के अंतर्गत माना जाता है।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 25

यह सहायक लोक अभियोजक के बारे मे बताती है। इसमे आप जानेगे की सहायक सरकारी वकील की नियुक्ति कैसे होगीऔर कितने साल के लिए और किस प्रकार से होती है।

इनकी नियुक्ति राज्य सरकार के द्वारा होती है। इनकी नियुक्ति मजिस्ट्रेट के न्यायालय मे कोई वाद के लिए सहायक अभियोजक की नियुक्ति होती है जो मजिस्ट्रेट के अंतर्गत संचालन के लिए कार्य करेगा। यह लोक अभियोजक की सहायता करती है।

केंद्र सरकार मजिस्ट्रेट के मामले के प्रयोजन के लिए 1 या उससे अधिक सहायक अभियोजक की नियुक्ति कर सकती है।

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जहा सहायक अभियोजक किसी विशिस्ट मामलो मे सहायता के लिए उपलब्ध नही है तो राज्य सरकार किसी अन्य व्यक्ति को सहायक अभियोजक नियुक्ति कर सकती है।

परंतु पुलिस अधिकारी इसमे सम्मलित नही है जो उस अपराध मे भाग लिया है जिसका वाद चलना हो।

कह सकते है जो पुलिस अधिकारी उस मामले का इन्वैस्टिगेशन किया है तो वह सहायक अभियोजक नही बनाया जा सकता है। यदि वह इंस्पेक्टर से कम पोस्ट का है तो उसको सहायक अभियोजक नही बनाया जा सकता है इसके अलावा भी कोई पुलिस सहायक लोक अभियोजक बनाया जा सकता है।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 26

इसमे यह बताया गया है की वो अपराध जो न्यायालय के द्वारा विचारणीय है।

धारा 26 मे यह बताया गया है की कौन सा न्यायालय कौन से मामलो का निपटारा करेगा। इस संहिता के अनुसार इसके अधीन रहते हुए किसी अपराध का विचारण और किसी अन्य दंड संहिता के अधीन अपराध का विचार उच्च न्यायालय और सेसन न्यायालय द्वारा किया जाएगा। उच्च न्यायालय द्वारा भारतीय दंड संहिता के अपराध का विचारण किया जा सकता है।

यह किसी अन्य न्यायालय द्वारा भी किया जा सकता है जो प्रथम अनु सूची मे वर्णित है। उसके अनुसार किया जा सकता है।

अन्य अपराधों के लिए यदि अपराध के अनुसार कोई न्यायालय का निर्माण हुआ है तो उस न्यायालय इसके अंतर्गत यदि कोई अन्य वाद है तो उच्च न्यायालय द्वारा उसकी सुनवाई होगी या फिर प्रथम अनु सूची के द्वारा उसका निस्पादंन किया जायेगा। 

धारा 27 के अनुसार –

यह किशोरों के मामले मे सुनवाई को बताता है। 

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इसके अंतर्गत कौन कौन से न्यायालय किशोरों के मामले की सुनवाई कर सकते है। यह बताया गया है। 

इसमे कोई भी अपराध आजीवन कारावास और मृत्यु दंड से संबंधित न हो। और व्यक्ति की उम्र 16 साल से अधिक न हो तो ऐसे मामलों की सुनवाई मुख्य मजिस्ट्रेट के अंतर्गत की जा सकती है।

ऐसे न्यायालय जो बाल विकास या किशोर संबंधित मामलों के लिए विशेष रूप से गठित किये गए है इसकी सुनवाई कर सकते हैं। 

इसमे यह बताया गया है की व्यक्ति की अदालत मे पेश होने के समय आयु 16 वर्ष से कम होनी चाहिये। 

धारा 28 के अनुसार

दंड देने के न्यायालय की शक्ति को बताया गया है। 

इसमे उच्च न्यायालय और सत्र न्यायालय किस प्रकार के दंड दे सकते है बताया गया है। 

इस विधि के अनुसार उच्च न्यायालय किसी भी प्रकार का दंड दे सकता है। 

इसके अनुसार सत्र न्यायालय विधि द्वारा अनुकरणीय कोई भी दंड दे सकता है परंतु मृत्यु दंड देने पर वह उच्च न्यायालय द्वारा विचारणीय होगा। या उसपर उच्च न्यायालय की सहमति होना आवश्यक है। 

सहायक सत्र न्यायाधीश को मृत्यु दंड, आजीवन कारावास, और 10 वर्ष से अधिक का कारावास को छोड़कर बाकी दंड दें सकते हैं। 

सहायक न्यायाधीश के द्वारा दिया गया दंड 5 वर्ष से कम का कारावास की अपील सत्र न्यायालय मे किया जा सकता है।  

इस पोस्ट के माध्यम से हम आपको धार 23 से 28 तक की जानकारी दे रहे है इससे संबन्धित सुझाव आप हमे कमेंट बॉक्स मे दे सकते है।

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