(सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 316  से धारा 320  तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 315  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं
नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 316  

इस धारा के अनुसार प्रकटन उत्प्रेरित करने के लिए किसी असर का काम में न लाया जाना बताया गया है।
जिसके अनुसार धारा 306 और धारा 307 में जैसा उपबन्धित है। तथा  उसके सिवाय, किसी वचन या धमकी द्वारा या अन्यथा कोई असर अभियुक्त व्यक्ति पर इस उद्देश्य से नहीं डाला जाएगा कि उसे अपनी जानकारी की किसी बात को प्रकट करने या न करने के लिए उत्प्रेरित किया जाय।

धारा 317  

इस धारा के अनुसार कुछ मामलों में अभियुक्त की अनुपस्थिति में जांच और विचारण किए जाने के लिए उपबन्ध के बारे मे बताया गया है।

(1) इस संहिता के अधीन जाँच या विचारण के किसी प्रक्रम में यदि न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट का उन कारणों से जो भी अभिलिखित किए जाएंगे तथा जिसका  समाधान हो जाता है।  कि न्यायालय के समक्ष अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी न्याय हित में आवश्यक नहीं है।  या अभियुक्त न्यायालय की कार्यवाही में बार-बार विघ्न डालता है।  तो ऐसे अभियुक्त का प्रतिनिधित्व प्लीडर द्वारा किए जाने की दशा में, वह न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट उसकी हाजिरी से उसे अभिमुक्ति दे सकता है और उसकी अनुपस्थिति में ऐसी जाँच या विचारण करने के लिए अग्रसर हो सकता है और कार्यवाही के किसी पश्चात्वर्ती प्रक्रम में ऐसे अभियुक्त को वैयक्तिक हाजिरी का निदेश दे सकता है।
(2) यदि ऐसे किसी मामले में अभियुक्त का प्रतिनिधित्व प्लीडर द्वारा नहीं किया जा रहा है अथवा यदि न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट का यह विचार है कि अभियुक्त की वैयक्तिक हाजिरी आवश्यक है तो ऐसे दशा मे यदि वह ठीक समझता है तो  उन कारणों से जो उसके द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे, वह या तो ऐसी जांच या विचारण स्थगित कर सकता है, या आदेश दे सकता है कि ऐसे अभियुक्त का मामला अलग से लिया जाए या विचारित किया जाए।

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धारा 318

इस धारा के अनुसार प्रक्रिया जहां अभियुक्त कार्यवाही नहीं समझता है यहा पर ऐसे प्रक्रिया को बताया गया है।
यदि अभियुक्त विकृतचित्त न होने पर भी ऐसा है कि उसे कार्यवाही समझाई नहीं जा सकती तो न्यायालय जांच या विचारण में अग्रसर हो सकता है; और उच्च न्यायालय से भिन्न न्यायालय की दशा में, यदि ऐसी कार्यवाही का परिणाम दोषसिद्धि है।  तो कार्यवाही को मामले की परिस्थितियों की रिपोर्ट के साथ उच्च न्यायालय भेज दिया जायगा और उच्च न्यायालय उस पर ऐसा आदेश देगा जैसा वह ठीक समझे।

धारा 319

इस धारा के अनुसार अपराध के दोषी प्रतीत होने वाले अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही करने की शक्ति को  बताया गया है।

(1) जहां किसी अपराध की जांच या विचारण के दौरान साक्ष्य से यह प्रतीत होता है । कि किसी व्यक्ति ने जो की अभियुक्त नहीं है। या फिर  कोई ऐसा अपराध किया है।  जिसके लिए ऐसे व्यक्ति का अभियुक्त के साथ विचारण किया जा सकता है। तो  वहाँ न्यायालय उस व्यक्ति के विरुद्ध उस अपराध के लिए जिसका उसके द्वारा किया जाना प्रतीत होता है। तो वह  कार्यवाही कर सकता है।
(2) जहां ऐसा व्यक्ति न्यायालय में हाजिर नहीं है वहां पूर्वोक्त प्रयोजन के लिए उसे मामले की परिस्थितियों की अपेक्षानुसार, गिरफ्तार या समन किया जा सकता है।
(3) कोई व्यक्ति जो गिरफ्तार या समन न किए जाने पर भी न्यायालय में हाजिर है। और  ऐसे न्यायालय द्वारा उस अपराध के लिए, जिसका उसके द्वारा किया जाना प्रतीत होता है। जाँच या विचारण के प्रयोजन के लिए। निरुद्ध किया जा सकता है।

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(4) जहां न्यायालय किसी व्यक्ति के विरुद्ध उपधारा (1) के अधीन कार्यवाही करता है वहां-
(क) उस व्यक्ति के बारे में कार्यवाही फिर से प्रारम्भ की जाएगी और साक्षियों को फिर से सुना जाएगा।a
(ख) खंड (क) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए मामले में ऐसे कार्यवाही की जा सकती है, मानो वह व्यक्ति उस समय अभियुक्त व्यक्ति था जब न्यायालय ने उस अपराध का संज्ञान किया था जिस पर जांच या विचारण प्रारम्भ किया गया था।

धारा 320

इस धारा के अनुसार धारा 320 का सम्बन्ध उन अपराधों से है । जिनमें कोर्ट की अनुमति के बिना समझौता हो सकता है तथा कुछ मामले ऐसे होते हैं जिनमें समझौता कोर्ट की अनुमति से होता है।

जिन अपराधों में दो पक्षों के बीच समझौता हो जाता है उन अपराधों को शमनीय अपराध (compoundable offences) कहा जाता है और जिन अपराधों में दोनों पक्षों के बीच में समझौता नहीं होता है उन अपराधों को अशमनीय अपराध (Non Compoundable Offences) कहा जाता है.

जिन अपराधों में न्यायालय की अनुमति के बिना भी समझौता हो सकता है । हालंकि इस समझौते की जानकारी पुलिस को देनी पड़ती है. जिन मामलों में न्यायालय की सहमती से समझौता हो सकता है ।

न्यायालय के अनुमति के बिना होने वाले समझौते इस प्रकार के है।

1. चोरी का मामला: इंडियन पैनल कोड के सेक्शन 379 के इसके बारे में प्रावधान है. इसमें वह व्यक्ति समझौता कर सकता है जिसका सामान या कुछ अन्य चीज चोरी हुई है. इस मामले में पुलिस की मध्यस्थता में दोनों पक्षों के बीच समझौता होता है.

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2. किसी को चोट पहुँचाना: इसके बारे में इंडियन पैनल कोड के सेक्शन 323 में प्रावधान है. ऐसे मामले में वह व्यक्ति ही समझौता कर सकता है जिसको चोट पहुंचाई गयी है या जो पीड़ित है. अर्थात अपराध का आरोपी समझौता करने की पहल शुरू नहीं कर सकता है.
3. धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाना: इंडियन पैनल कोड के सेक्शन 379 के तहत यह एक दंडनीय अपराध है. अगर कोई व्यक्ति किसी की धार्मिक भावनाओं को जानबूझकर चोट पहुंचाता है तो आहत होने वाला व्यक्ति आरोपी के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करा सकता है. लेकिन पुलिस इस मामले में न्यायालय की अनुमति के बिना समझौता कर सकती है.

4. किसी को गलत तरीके से बंधक बनाना: इस अपराध को IPC के सेक्शन 341, 342 में अपराध माना गया है।  हालाँकि इसमें जिस व्यक्ति को बंधक बनाया गया है वह चाहे तो कोर्ट के बाहर समझौता कर सकता है.

5. विवाहित महिला को बंधक बनाना या भगा ले जाना: यदि कोई व्यक्ति किसी महिला को बहला फुसलाकर भगा ले जाता है या अपराध करने के उद्येश्य के बंधक बनाता है तो यह IPC की धारा 498 के तहत अपराध है. इस मामले में बंधक महिला के पति को आरोपी के साथ समझौता करने का अधिकार है.

6. अनधिकार गृहप्रवेश: यदि किसी व्यक्ति के घर में कोई व्यक्ति या अपराधी बिना आज्ञा के घुसता है तो यह काम IPC के सेक्शन 448 के तहत अपराध है. एक दंडनीय अपराध है और जिस व्यक्ति के घर में घुसने का प्रयास किया गया है वह इसके खिलाफ रिपोर्ट कर सकता है. हालाँकि पुलिस की मध्यस्थता में कोर्ट के बाहर भी इस ममाले में समझौता किया जा सकता है।

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