भारतीय साक्ष्य अधिनियम- एक परिचय

आज हम आपको साक्ष्य अधिनियम के बारे मे बताने जा रहे है। इसके बारे मे और जानकारी के लिए hindilawnotes हमेशा पढ़ते रहे।

मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। और यह समाज का निर्माण करता है तथा समाज इंसान को मनुष्य बनाता है। अर्थात हम यह कह सकते है की जब बच्चा जन्म लेता है तो उसको कुछ भी नही पता होता है फिर वह समाज मे रहकर बोल चाल की भाषा सीखता है। और यहा के रहन सहन के अनुसार अपने को ढाल लेता है।

समाज मे सभी मनुष्य एक दूसरे से मिल जुलकर रहता है।और समाज का निर्माण करता है और समाज राज्य का निर्माण करता है और कभी कभी उनके बीच मे लड़ाई झगड़ा भी होता रहता है। और इससे एक दूसरे के अधिकार प्रभावित होता है। और वह न्यायालय जाते है और न्यायालय तथ्यों के आधार पर इनका निवारण करता है।

मनुष्य का हित और स्वार्थ प्रभावित होता है जब दूसरे व्यक्ति को हानी होता है तो वह न्यायालय जाता है न्यायालय साक्ष्य को देखता है। विधि मे साक्ष्य का बहुत महत्व है। व्यक्ति के रूप मे मनुष्य निगम और कंपनी आदि हो सकती है। न्यायालय दस्तावेजो के माध्यम से उसका निर्धारण करता है।

साक्ष्य विधि का कार्य नियमो का प्रतिपादन करना होता है। जिसके द्वारा न्यायालय के सामने साक्ष्य का साबित करना या न साबित करना शामिल होता है।

पुराने समय मे भी यह प्रक्रिया होती है और यह राजा के द्वारा निर्णय दिया जाता था और उसके अनुसार दंड दिया जाता था।

सभी प्रकार के झगड़े का निपटारा सामाज के प्रचलित विधि के अनुसार किया जाता है। विधि ही ऐसे साधन है जो सभी का सीमा तय करती है। विधि मे समाज के हर व्यक्ति की सीमा तय करती है। हर व्यक्ति का अपना अधिकार होता है। और विधि उनकी सीमा तय कर उपचार प्रदान करती है जो कि न्यायालय के द्वारा किया जाता है निर्णय के लिए साक्ष्य कि आवश्यकता होती है। न्यायालय अभिलेख के भीतर ही न्याय प्रदान करता है। न्यायालय खुद से कोई निर्णय नही लेता है। वह साक्ष्य के माध्यम से निर्णय देता है।

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न्यायालय मे एक पक्ष जहा साक्ष्य को साबित करता है दूसरा पक्ष उसको नही साबित करता है न्यायालय उस अनुसार निर्णय देता है।

भारतीय साक्ष्य अधिनियम 1872 मे लागू हुआ है। साक्ष्य का मतलब यहा सही और गलत को साबित करना है कोई भी साक्ष्य तथ्यो के रूप मे मिलता है। जैसे यह एफ़आईआर के रूप मे या अन्य किसी रूप मे इसको न्यायालय मे पेश करना होता है चाहे यह तथ्यो के रूप मे ,डॉकयुमेंट फॉर्म मे या मौखिक रूप से किसी व्यक्ति द्वारा न्यायालय मे पहुँच कर बयान देकर साक्ष्य को प्रस्तुत किया जाता है।

यह 1 सितम्बर 1872 को लागू हुआ था जिसका प्रारूप सर जेम्स फ़िच्जेम्स स्टीफन ने तैयार किया था।

साक्ष्य अधिनियम मे 3 भाग है इसमे 11 अध्ययाय और 167  धाराये है। यह पूरे भारत मे लागू होता है।

साक्ष्य का अर्थ किसी अपराध का दस्तावेज़ प्रस्तुत करना होता है। यह लिखित और मौखिक रूप मे हो सकता है।

साक्ष्य अधिनयम विस्तृत है परंतु यह पूर्ण नही है। क्योकि यह साक्ष्य विधि कि परिभाषा देता है। और उसका समेकन और संसोधन करता है।

इसके अनुसार यदि अधिनयम मे किसी भी प्रकार का स्पष्ट नियम दिया है तो न्यायालय उस अनुसार निर्णय देती है परंतु यदि कही नियम स्पष्ट नही है तो वह अन्य देश का भी प्रारूप देख सकती है और अन्य नियमो के अनुसार निर्णय दे सकती है।

1850 मे इसका स्पस्टिकरण हुआ था जिसके अनुसार कहा गया था कि साक्ष्य विधि न्यायालय कि विधि है और न्यायालय उसको अधिसाशित करती है।

कोई साक्ष्य किसी व्यक्ति द्वारा साबित किया जा रहा है या नही

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कोई साक्ष्य लिखित रूप मे साबित होगा या नही

कोई साक्ष्य उस विधि को साबित कर पा रहा है या नही

यह उस देश के नियम के अनुसार लागू होगा।

साक्ष्य विधि प्रक्रियात्म्क विधि है और यह भूतलक्षी विधि भी है इसके अनुसार देश परिस्थिति के अनुसार वादो का निपटारा किया जाता है। विधि का सामान्य नियम भी यही है।

साक्ष्य को विवादित तथ्य तक सीमित होना आवश्यक है।

सभी वाद मे साक्ष्य का होना आवश्यक है।

साक्ष्य बिस्वास पूर्ण होना चाहिए जैसे गवाह किसी घटना का वीडियो आदि जो सही प्रारूप दे सके।

सुनी हुई साक्ष्य या मौखिक साछ्य का इसमे कोई महत्व नही होता है।

धारा 3 निर्वचन खंड

इन शब्दो का अर्थ यही होगा जो निर्वचन खंड मे दिया गया है जब तक कि किसी अन्य धारा मे इस शब्द का कोई अलग अर्थ नही दिया गया था।

न्यायालय –

इसमे सभी न्यायधीश और सभी मैजिस्ट्रेट और साछ्य लेने के लिए वैध रूप से प्राधिक्रत व्यक्ति आते है। वह मैजिस्ट्रेट या न्यायालय इसमे नही आते है जो इसके अतिरिक्त कोई अन्य कार्य करते है।

तथ्य –

ये इसके अंतर्गत आते है।

ऐसे कोई वस्तु या वस्तु और वस्तु का स्वरूप और उसकी अवस्था ।ऐसी अवस्था जो इंद्रियों द्वारा अभीबोधित हो। 

जिसमे किसी तथ्य का बोध हो जो इमोशन और भाव से जुड़े हुए होते है। 

तथ्य को हम 2 भागो मे बाँट सकते है। 

भौतिक तथ्य

मानसिक तथ्य

भौतिक तथ्य 

इसके अंतर्गत वह तथ्य आते है जो बाहरी विचारों से अभिप्रेरित होते है। 

मानसिक तथ्य

यह वह तथ्य होते है जो मनुष्य के मस्तिष्क के अंदर के वातावरण से अभिप्रेरित होता है। यदि कोई व्यक्ति के अंदर आशय, दया भाव आदि आ जाता है। तो वह इसके अंतर्गत आता है।

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यदि किसी व्यक्ति ने कुछ देखा।

यदि किसी व्यक्ति ने कुछ सुना।

यदि किसी व्यक्ति ने कपट  भाव रखा ।

यदि किसी व्यक्ति का कोई भाव बिस्वास आस्था आदि किसी वस्तु को लेकर है यह सभी तथ्य है।

किसी व्यक्ति के प्रति सजग होना भी तथ्य कहलाता है। कोई बात यदि दिमाग मे है वह भी एक तथ्य है।

सुसंगत

जब कोई एक तथ्य दूसरे से जुड़ा हुआ होता है तो उसको हम सुसंगत कहते है। जब कोई न्यायालय किसी वाद का विचारण करता है तो तथ्यो का विवादक तथ्य क्या है।

जैसे क ने स की मृत्यु की तो न्यायालय पहले देखेगा की क्या क का आशय स की मृतु करना था या नही । क्या क ने स की मृत्यु  किस वजह से किया और उसके तथ्य क्या क्या है।

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