(सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 256 से 260 तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 255 तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं
नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 256

इस धारा के अनुसार परिवादी का हाजिर न होना या उसकी मृत्यु को बताया गया है।

(1) यदि परिवाद पर समन जारी कर दिया गया हो । और  वह अभियुक्त की हाजिरी के लिए नियत दिन तारीख  या उसके पश्चात्वर्ती किसी दिन, जिसके लिए सुनवाई स्थगित की जाती है। तो परिवादी हाजिर नहीं होता है तो मजिस्ट्रेट इसमें इसके पूर्व किसी बात के होते हुए भी अभियुक्त को दोषमुक्त कर देगा जब तक कि वह किन्हीं कारणों से किसी अन्य दिन के लिए मामले की सुनवाई स्थगित करना ठीक न समझे ।

परन्तु जहां परिवादी का प्रतिनिधित्व प्लीडर द्वारा या अभियोजन का संचालन करने वाले अधिकारी द्वारा किया जाता है।  या फिर जहां मजिस्ट्रेट की यह राय है कि परिवादी की वैयक्तिक हाजिरी आवश्यक नहीं है। तो  वहां मजिस्ट्रेट उसकी हाजिरी से उसे अभिमुक्ति दे सकता है । और मामले में कार्यवाही कर सकता है।
(2) उपधारा (1) के उपबन्ध, जहां तक हो सके, उन मामलों को भी लागू होंगे, जहां परिवादी के हाजिर न होने का कारण उसकी मृत्यु है।

धारा 257

इस धारा के अनुसार यदि परिवादी किसी मामले में इस अध्याय के अधीन अंतिम आदेश पारित किए जाने के पूर्व किसी समय मजिस्ट्रेट का समाधान कर देता है । कि अभियुक्त के विरुद्ध या जहां एक से अधिक अभियुक्त हैं । वहां उन सब या उनमें से किसी के विरुद्ध उसका परिवाद वापस लेने की उसे अनुज्ञा देने के लिए पर्याप्त आधार है तो मजिस्ट्रेट उसे परिवाद वापस लेने की अनुज्ञा दे सकेगा और तब उस अभियुक्त को, जिसके विरुद्ध परिवाद इस प्रकार वापस लिया जाता है। तो उसको  दोषमुक्त कर देगा ।

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धारा 258

इस धारा के अनुसार  कुछ मामलों में कार्यवाही रोक देने की शक्ति को बताया गया है। जिसमे परिवाद से भिन्न आधार पर संस्थित किसी समन-मामले में कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट अथवा मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की पूर्व मंजूरी से कोई अन्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ऐसे कारणों से जो उसके द्वारा लेखबद्ध किए जाएंगे। उसको कार्यवाही को किसी भी प्रक्रम में कोई निर्णय सुनाए बिना रोक सकता है । और जहां मुख्य साक्षियों के साक्ष्य को अभिलिखित किए जाने के पश्चात् इस प्रकार कार्यवाहियां रोकी जाती हैं वहां दोषमुक्ति का निर्णय सुना सकता है और किसी अन्य दशा में अभियुक्त को छोड़ सकता है और ऐसे छोड़ने का प्रभाव उन्मोचन होगा ।

धारा 259

इस धारा के अनुसार समन-मामलों को वारण्ट-मामलों में संपरिवर्तित करने की न्यायालय की शक्ति-

जब किसी ऐसे अपराध से सम्बन्धित समन-मामले के विचारण के दौरान जो छह मास से अधिक अवधि के कारावास से दण्डनीय है। जिसको  मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि न्याय के हित में उस अपराध का विचारण वारण्ट-मामलों के विचारण की प्रक्रिया के अनुसार किया जाना चाहिए । तो ऐसा मजिस्ट्रेट वारण्ट-मामलों के विचारण के लिए इस संहिता द्वारा उपबन्धित रीति से उस मामले की पुनः सुनवाई कर सकता है । और ऐसे साक्षियों को पुनः बुला सकता है जिनकी परीक्षा की जा चुकी है।

धारा 260

इस धारा के अनुसार संक्षिप्त विचारण करने की शक्ति–
(1) इस संहिता में किसी बात के होते हुए भी यदि,

(क) कोई मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट; (ख) कोई महानगर मजिस्ट्रेट ;

(ख) कोई प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट जो उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त विशेष सशक्त किया गया है, ___ठीक समझता है तो वह निम्नलिखित सब अपराधों का या उनमें से किसी का संक्षेपतः विचारणीय कर सकता है.

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(1) वे अपराध जो मृत्यु, आजीवन कारावास या दो वर्ष से अधिक की अवधि के लिए कारावास से दंडनीय नहीं है;

(i) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 379, धारा 380 या धारा 381 के अधीन चोरी, जहां चुराई हुई संपत्ति का मूल्य [दो हजार रुपए] से अधिक नहीं है :

(ii) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 411 के अधीन चोरी की संपत्ति को प्राप्त करना या रखे रखा, जहां ऐसी संपत्ति का मूल्य दो हजार रुपए] से अधिक नहीं है।

(iii) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 454 और 456 के अधीन अपराध ।

(iv) भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 504 के अधीन लोकशांति भंग कराने को प्रकोपित करने के आशय से अपमान और धारा 506 के अधीन [आपराधिक अभित्रास, जो ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडनीय होगा।

(v) पूर्ववर्ती अपराधों में से किसी का दुप्रेरण; (viii) पूर्ववर्ती अपराधों में से किसी को करने का प्रयत्न, जब ऐसा प्रयत्न, अपराध है;

(vi) ऐसे कार्य से होने वाला कोई अपराध, जिसकी बाबत पशु अतिचार अधिनियम, 1871 (1871 का 1) की धारा 20 के अधीन परिवाद किया जा सकता है।

(2) जब संक्षिप्त विवरण के दौरान मजिस्ट्रेट को प्रतीत होता है कि मामला इस प्रकार का है कि उसका विचारण संक्षेपतः किया जाना वांछनीय है तो वह मजिस्ट्रेट किन्हीं साक्षियों को, जिनकी परीक्षा की जा चुकी है. पुन: बुलाया और मामले को इस संहिता द्वारा उपबंधित रीति से पुनः सुनने के लिए अग्रसर होगा।

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1 thought on “(सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 256 से 260 तक का विस्तृत अध्ययन”

  1. मेरे हिसाब से जो संशोधन किए गए हैं काफी मददगार साबित हो सकते हैं मुल्जिम पक्ष को।

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