(सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 266 से 270 तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 265  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं
नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 266  

इस धारा के अनुसार

 (क) “निरुद्ध” के अन्तर्गत निवारक निरोध के लिए उपबंध करने वाली किसी विधि के अधीन निरुद्ध भी है;

(ख) “कारागार” के अन्तर्गत निम्नलिखित भी हैं–

(i) कोई ऐसा स्थान जिसे राज्य सरकार ने, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, अतिरिक्त जेल घोषित किया है;

(ii) कोई सुधारालय तथा  बोर्स्टल-संस्था या इसी प्रकार की अन्य संस्था ।

धारा 267  

इस धारा के अनुसार बन्दियों को हाजिर कराने की अपेक्षा करने की शक्ति को बताया गया है।

(1) जब कभी इस संहिता के अधीन किसी जांच, विचारण या अन्य कार्यवाही के दौरान किसी दंड न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि,

(क) कारागार में परिरुद्ध या निरुद्ध व्यक्ति को किसी  भी अपराध के आरोप का उत्तर देने के लिए या उसके विरुद्ध किन्हीं कार्यवाहियों के प्रयोजन के लिए न्यायालय के समक्ष लाया जाना चाहिए।

(ख) न्याय के उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कि ऐसे व्यक्ति की साक्षी के रूप में परीक्षा की जाए।

तब वह न्यायालय, कारागार के भारसाधक अधिकारी से यह अपेक्षा करने वाला आदेश दे सकता है कि वह ऐसे व्यक्ति को, यथास्थिति, आरोप का उत्तर देने के लिए या ऐसी कार्यवाहियों के प्रयोजन के लिए या साक्ष्य देने के लिए न्यायालय के समक्ष पेश करे।

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(2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा दिया जाता है, वहां वह कारागार के भारसाधक अधिकारी को तब तक भेजा नहीं जाएगा या उसके द्वारा उस पर तब तक कोई कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक वह ऐसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित न हो, जिसके अधीनस्थ वह मजिस्ट्रेट है।

धारा 268

इस धारा के अनुसार  धारा 267 के प्रवर्तन से कतिपय व्यक्तियों को अपवर्जित करने की राज्य सरकार की शक्ति को बताया गया है। जिसके अनुसार —

(1) राज्य सरकार जो की  उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट बातों को ध्यान में रखते हुए किसी समय, साधारण या विशेष आदेश द्वारा यह निदेश दे सकती है कि किसी व्यक्ति को या किसी वर्ग के व्यक्तियों को उस कारागार से नहीं हटाया जाएगा जिसमें उसे या उन्हें परिरुद्ध या निरुद्ध किया गया है, और तब, जब तक ऐसा आदेश प्रवृत्त रहे । तथा  धारा 267 के अधीन दिया गया कोई आदेश चाहे वह राज्य सरकार के आदेश के पूर्व किया गया हो या उसके पश्चात् किसी  ऐसे व्यक्ति या ऐसे वर्ग के व्यक्तियों के बारे में प्रभावी न होगा।

(2) उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश देने के पूर्व, राज्य सरकार निम्नलिखित बातों का ध्यान रखेगी, अर्थात् :

(क) उस अपराध का स्वरूप जिसके लिए, या वे आधार, जिन पर, उस व्यक्ति को या उस वर्ग के व्यक्तियों को कारागार में परिरुद्ध या निरुद्ध करने का आदेश दिया गया है।

(ख) यदि उस व्यक्ति को या उस वर्ग के व्यक्तियों को कारागार से हटाने की अनुज्ञा दी जाए तो लोक-व्यवस्था में विघ्न की संभाव्यता:

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(ग) लोक हित, साधारणतः।

धारा 269

इस धारा के अनुसार कारागार के भारसाधक अधिकारी का कतिपय आकस्मिकताओं में आदेश को कार्यान्वित न करना  बताया गया है जहाँ वह व्यक्तिजिसके बारे में धारा 267 के अधीन कोई आदेश दिया गया है–

(क) बीमारी या अंग-शैथिल्य के कारण कारागार से हटाए जाने के योग्य नहीं है।  अथवा

(ख) विचारण के लिए सुपुर्दगी के अधीन है या विचारण के लंबित रहने तक के लिए या प्रारंभिक अन्वेषण तक के लिए प्रतिप्रेषणाधीन है।  अथवा

(ग) इतनी अवधि के लिए अभिरक्षा में है जितनी आदेश का अनुपालन करने के लिए और उस कारागार में जिसमें वह परिरुद्ध या निरुद्ध है, उसे वापस ले आने के लिए अपेक्षित समय के समाप्त होने के पूर्व समाप्त होती है।  अथवा

(घ) ऐसा व्यक्ति है जिसे धारा 268 के अधीन राज्य सरकार द्वारा दिया गया कोई आदेश लागू होता है, वहाँ कारागार का भारसाधक अधिकारी न्यायालय के आदेश को कार्यान्वित नहीं करेगा और ऐसा न करने के कारणों का विवरण न्यायालय को भेजना ।

परन्तु जहाँ ऐसे व्यक्ति से किसी ऐसे स्थान पर, जो कारागार से पच्चीस किलोमीटर से अधिक दूर नहीं है, साक्ष्य देने के लिए हाजिर होने की अपेक्षा की जाती है, वहाँ कारागार के भारसाधक अधिकारी के ऐसा न करने का कारण खण्ड (ख) में वर्णित कारण नहीं होगा।

धारा 270

इस धारा के अनुसार बन्दी का न्यायालय में अभिरक्षा में लाया जाना बताया गया है।

इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए कोई भी  कारागार का भारसाधक अधिकारी जो की धारा 267 की उपधारा (1) के अधीन दिए गए और जहां आवश्यक है, वहां उसकी उपधारा (2) के अधीन सम्यक् रूप से प्रतिहस्ताक्षरित आदेश के परिधान पर, आदेश में नामित व्यक्ति को ऐसे न्यायालय में, जिसमें उनकी हाजिरी अपेक्षित है, भिजवाया जिससे वह आदेश में उल्लिखित समय पर वहां उपस्थित हो सके, और उसे न्यायालय में या उसके पास अभिरक्षा में तब तक रहूंगा जब तक उसकी परीक्षा न कर ली जाए या जब तक न्यायालय उसे उस कारागार को, जिसमें वह परिरुद्ध या निरुद्ध था, वापस ले जाए जाने के लिए प्राधिकृत न करे।

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