दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 29 से 32 तक का अध्ययन


धारा 29 दंड प्रक्रिया संहिता 1973

मजिस्ट्रेट के द्वारा दिये गए दंड

धारा 29 के अनुसार मजिस्ट्रेट कारावास की सजा दे सकते है। यह इस प्रकार है। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट 7 साल से कम या 7 साल तक की सजा प्रदान कर सकता है।

प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट 3 वर्ष से  अधिक का दंड नही दे सकता है। 3 वर्ष से जादा के कारावास के लिए वह मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के पास जा सकता है। वह दंड और जुर्माना दे सकता है।

द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट 1 वर्ष से अधिक कारावास और 1000 रुपये जुर्माना लगा सकता है। कारावास की सजा इस शक्ति से जादा अवधि की सजा नही दे सकता है। कोई मजिस्ट्रेट व्यक्ति  के जुर्माना न देने पर दंड एक चौथाई हिस्से से जादा का कारावास  नही दे सकता है।

यदि किसी व्यक्ति ने ऐसा अपराध किया है जिसकी सजा 3 वर्ष है तो मजिस्ट्रेट जुर्माना न देने पर 6 माह से अधिक की सजा नही दे सकता है।

जुर्माना न देने पर मजिस्ट्रेट की कारावास की शक्ति को बढ़ाया जा सकता है। जैसे यदि मुख्य मजिस्ट्रेट की शक्ति 7 साल तक की सजा देने की है और साथ मे जुर्माना भी नही दिया गया है तो मजिस्ट्रेट 7 साल और जुर्माना के अनुसार दंड को बढ़ा सकता है। अतिरिक्त सजा मजिस्ट्रेट के द्वारा बढ़ाया जा सकता है।

धारा 30 दंड प्रक्रिया संहिता

जुर्माना न देने पर कारावास की सजा –

जब मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति को जुर्माना देने का दंड देता है और वह जुर्माना नही दे पाता है तो उसको कारावास की सजा दी जाएगी और कारावास की अवधि बढ़ा सकता है। मजिस्ट्रेट कानून विधि के अनुसार जुर्माना न देने पर सजा दी जाएगी।

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धारा 31

एक ही अपराधी को एक से जादा अपराध करने की सजा का प्रावधान –

यदि एक ही अपराधी को एक से अधिक अपराध के लिए दंडित किया जा सकता है।

इसमे भारतीय दंड संहिता की धारा 71 को भी बताया गया है। जिसके अनुसार यदि एक व्यक्ति के द्वारा दूसरे व्यक्ति के उपर वार किया गया उसके लिए उसको दंड दिया जाएगा और यदि एक ही व्यक्ति को कई बार मारा है तो ऐसा माना जाएगा की एक बार ही बार मारा है। परंतु यदि एक ही व्यक्ति ने एक से अधिक व्यक्ति को मारा है तो यह 2 अपराध माना जाएगा और उसको अलग अलग दंड दिया जा सकता है।

न्यायालय उस समय की परिस्थिति को देखते हुए मामले को एक साथ लेगा या अलग अलग इसका निर्धारण करेगा।

न्यायालय ने यदि यह नही बताया की दंड एक साथ दिया जाएगा की अलग अलग तो दंड अलग अलग दिया जाएगा।

यदि न्यायालय ऐसा दंड दिया है जो 2 अपराध के लिए है और क्रम अनुसार है तो उच्चतम न्यायालय  से परामर्श लेना पड़ेगा और यह कारावास की सजा 14 साल से अधिक नही हो सकता है।

परंतु वह अपराध आजीवन कारावास और मृतु दंड का नही होना चाहिए।

न्यायालय अपनी शक्ति से दुगने से जादा का दंड नही दे सकती है। जैसे मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट 7 साल से कम या 7 साल तक की सजा प्रदान कर सकता है। तो यह 14 साल तक की सजा दे सकेगा।

प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट 3 वर्ष से  अधिक का दंड नही दे सकता है। वह दंड और जुर्माना दे सकता है। तो इस अनुसार यह 6 साल की सजा दे सकता है।

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द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट 1 वर्ष से अधिक कारावास और 1000 रुपये जुर्माना लगा सकता है। तो इसके अनुसार यह 2 साल तक की सजा दे सकता है।                                                                                          

अपील के लिए अलग अलग दंड को एक दंड समझा जाएगा। और न्यायाधीश एक पर ही हस्ताक्षर करेंगे।

अपराध के दंड के क्रम का निर्धारण भी न्यायालय द्वारा किया जाएगा। जुर्माना की सजा अतिरिक्त 6 माह तक भुगतना पड़ेगा।

धारा 32

शक्ति प्रदान करने का तरीका –

इसके अनुसार उच्च न्यायालय और राज्य सरकार विशेष शक्तिया और साधारण शक्तिया प्रदान करेगा। विशेष शक्तिया नाम और पद के अनुसार प्रदान की जाएगी। साधारण शक्तिया मजिस्ट्रेट के वर्ग को प्रदान की जाएगी। और विशेष सकती एक मजिस्ट्रेट को दी जाएगी।

ऐसा आदेश जो राज्य सरकार और उच्च न्यायलय द्वारा दिया गया है वह आदेश उस दिन से माना जाएगा जिस दिन वह आदेश मजिस्ट्रेट को मिल गया है। अर्थात जिस दिन मजिस्ट्रेट को सूचित किया गया है। उस दिन उस पर शक्तिया लागू हो जाएगी।

यदि आदेश पहले दे दिया जाता है और मजिस्ट्रेट को वह सूचना नही मिलते है तो मजिस्ट्रेट के द्वारा उस दिन किया गया कार्य शून्य होगा।

इसका प्रभाव उस दिन से लागू होगा जिस दिन से उसको शक्तिया प्रदान कर दी गयी है उस दिन से उसका उपयोग वैध माना जाएगा।

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे हमने  दंड प्रक्रिया  संहिता धारा 1 से 32  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है। यदि आपको इन धारा को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है। तो कृपया हमे कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है। 

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