भारतीय दंड संहिता धारा 34 से 40 तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्टों मे हमने  भारतीय दंड संहिता धारा 1 से 33  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराये नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लिजिये जिससे आपको आगे की धाराये समझने मे आसानी होगी।

धारा 34

भारतीय दंड संहिता की धारा 34 के अनुसार किसी भी उद्देश्य के लिए कोई कार्य किया जाता है समान्य आशय से संबंध 2 या 2 से अधिक व्यक्तियों को मिल कर या अकेले किसी उद्देश्य से कार्य करता है तो यह आशय होता है।

उदाहरण के लिए यदि 2 व्यक्ति ए और फ  स को मारना चाहते है और उसको लेकर नदी मे गए और ए ने उसको डूबा दिया और फ ने उसको पकड़ कर रखा जिससे वह बाहर न निकाल सके तो इसमे दोनों का आशय स को मारना है।

समान्य आशय से मतलब एक से अधिक व्यक्ति  के द्वारा किया गया आपराधिक कार्य जो कई व्यक्ति के द्वारा मिल कर किया गया है तो सभी उसमे समान रूप से मिलकर एक ही कार्य कर रहे है। और यदि वह आशय को नही भी बताए तो भी वह एक ही आशय के अंतर्गत आएगा जिसको समान्य आशय भी कहा जा सकता है। इसके मुख्य तत्व इस प्रकार है।

2 या 2 से अधिक व्यक्ति के समान आशय होना चाहिए।

वह व्यक्ति उस जगह मौजूद होना चाहिए।

आपराधिक कार्य एक से अधिक व्यक्ति के द्वारा होना चाहिए।

कार्य योजना के तहत होना चाहिए।

धारा 35

जब कोई कार्य कई लोगो के द्वारा किया जा रहा है। और आपराधिक प्रव्रति से किया गया है तो कब यह कहा जा सकता है कि कोई कार्य आपराधिक आशय और ज्ञान से किया गया है। यह धारा 35 मे बताया गया है। ऐसा कार्य आपराधिक तब कहा जाएगा जब वह आपराधिक ज्ञान और आशय से किया गया हो। ऐसे हर व्यक्ति जो उस कार्य मे सम्मलित है वह उसी प्रकार जिम्मेदार है जैसे वह कार्य अकेले किया गया हो

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इसके मुख्य तत्व इस प्रकार है।

इसमे कोई कार्य होना चाहिए।

कार्य आपराधिक प्रव्रति का होना चाहिए।

यह कई लोगो के द्वारा होना चाहिए।

इसका कारण आपराधिक ज्ञान और आशय होना चाहिए।

आदम आली तालुकदार बनाम एआईआर 1927

इस मामले मे क और खा मिलकर ग को खूब मारा क का आशय ग कि मृतु करना था और खा का आशय ग को चोट पहुँचाना  था और ग कि मृतु हो गयी इसमे क को मृतु के लिए सजा मिली और खा का आशय चोट पहुचाना था इसलिए उसको घोर उत्पत्ति की सजा मिली।

धारा 36

यह कहता है कि कोई ऐसा कार्य जो छोटे रूप मे किया गया है और कम किया गया है। इसमे किसी छोटे  कार्य या लोप द्वारा कारित परिणाम के बारे मे बताया गया है जहा कोई कार्य करना अपराध है वह यह समझा जाएगा कि उसका अंशता कार्य या लोप करना भी उसी प्रकार का अपराध है।

उदाहरण

जय ने अपनी पत्नी को मारने के लिए खाने मे थोड़ा जहर रोज मिलाया करता था और इस प्रकार कुछ दिन बाद उसने उसको खाना भी कम कम देना सुरू कर दिया था जिससे भूख और जहर कि वजह से उसकी मृतु हो गयी जय अपनी पत्नी कि मृतु का दोषी है।

धारा 37

किसी अपराध को करने के लिए कई अपराध मे से कोई एक कार्य करना

इसको हम आपको उदाहरण से समझाते है। जैसे आज कल आपने देखा है बच्चो का हॉस्टल चल रहा है। वह उनको खाना पीना सब मिलता है और दिन तथा रात के लिए अलग अलग वार्डेन होते है जो उनकी देख रेख करते है।

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अगर दिन वाले वार्डेन ने बच्चो को खाना नही दिया और रात वाले वार्डेन ने भी खाना नही दिया जिससे बच्चे बीमार हो गए और मर गए तो दोनों ही समान रूप से उत्तरदाई होंगे।

यदि दोनों व्यक्ति कार्य का लोप करते है। और दोनों एक दूसरे से संबन्धित नही है फिर भी वह सहयोगी समझे जाएंगे और दोनों धारा 37 के लिए उत्तरदाई होंगे।

उदाहरण

क खा को किडनैप कर रखा है और 2 व्यक्ति स और ज को खा कि देख रेख के लिए नियुक्त किया था और स को 10 दिन और उसके बाद ज को 10 दिन उसकी देख रेख करनी होती है स और ज दोनों एक दूसरे को नही जानते है और स खा को खाना नही देता है सोचता है कि ज देगा और ज खाना नही देता कि स देता होगा और इससे खा कमजोर हो गया और ज के समय मे मर गया तो ज मुतु के लिए दोषी होगा और स धारा 37 के अनुसार दोषी होगा और क किडनैप के लिए दोषी होगा।

धारा 38

यह कहती है कि आपराधिक कार्य मे संयुक्त सभी दोषी होगे। यदि क खा और ग तीनों दोस्त है और क और ग कि खा से लड़ाई है। और खा क को लड़ाई के लिए उकसाया है जिससे क गुस्से मे खा को मारने लगता है और ग भी बदला लेने के लिए उसको मारता है और चाहता है कि वह मर जाये और मार खा कर खा मर गया तो क मानव बध के लिए और ग हत्या का दोषी माना जाएगा। इसमे उद्देश्य के अनुसार दंड दिया जाता है।

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आपराधिक कार्य मे संयुक्त व्यक्ति अलग अलग कार्य के लिए दोषी होने और इसका अपराध इनके आशय के अनुसार तय होगा और यह उस अनुसार दोषी होंगे

धारा 39

स्वेच्छा को बताता है।

कोई चीज जब जान बुझ कर किसी आशय के द्वारा किसी चीज के साथ विश्वास के साथ किया जाये तो यह स्वेछया कहलाता है।

यदि एक व्यक्ति लूट करना चाहता है और लौटने के लिए वह एक घर मे आग लगा देता है जिसमे कई व्यक्ति है। उसका आशय किसी को मारना नही था उसने लूट के लिए यह किया परंतु यह समझा जाएगा कि उसने स्वेछया से उन सबको मारा है क्योंकि उसको पता था कि आग लगाने  से ये लोग मर जाएंगे। इसलिए वह व्यक्ति इसका दोषी है।

धारा 40

यह अपराध को बताता है। यह धारा 3 खंड मे विभाजित है। पहले मे यह बताया गया है कि खंड 2 या 3 मे जिस धारा को  बताया गया है उसके अतिरिक्त सभी धाराये  अपराध है। ये धाराये और अध्याय 4 और 5 क  धारा 64,65,  66, 67,71, 109,110 , 114, 115, 116 117, 187, 194, 203, 211, 213 ,214, 221, 222, 223, 224, 225, 124 ,327, 328 329 ,330. 331 ,

347, 348, 388 ,389, 443 मे अपराध शब्द इसके अधीन यथा परिभाषित विशेष स्थानीय विधि का घोटक है।

141, 176, 177, 201 ,201,202, 212, 216 ,441 मे अपराध का अर्थ उन्ही है जिसमे दंडनीय वाद को 6 माह या उससे अधिक जुर्माना या जुर्माना सहित या रहित दंडित किए गए है।

यदि आपको इन धाराओ को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है। तो कृपया हमे कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है। 

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