(सीआरपीसी) दंड प्रक्रिया संहिता धारा 329  तथा धारा 330  का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट में दंड प्रक्रिया संहिता धारा 328   तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं
नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने में आसानी होगी।

धारा 329

इस धारा के अनुसार न्यायालय के समक्ष विचारित व्यक्ति के विकृतचित्त होने की दशा में प्रक्रिया को बताया गया है।

(1) यदि किसी मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय के समक्ष किसी व्यक्ति के विचारण के समय उस मजिस्ट्रेट या न्यायालय को वह व्यक्ति विकृतचित्त और परिणामस्वरूप अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ प्रतीत होता है, तो वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय, प्रथमतः ऐसी चित्त-विकृति और असमर्थता के तथ्य का विचारण करेगा और यदि उस मजिस्ट्रेट या न्यायालय का ऐसे चिकित्सीय या अन्य साक्ष्य पर, जो उसके समक्ष पेश किया जाता है, विचार करने के पश्चात् उस तथ्य के बारे में समाधान हो जाता है तो वह उस भाव का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और मामले में आगे की कार्यवाही मुल्तवी कर देगा।

(1क) यदि मजिस्ट्रेट या सेशन न्यायालय विचारण के दौरान इस निष्कर्ष पर पहुंचता है । कि जब अभियुक्त विकृतचित्त है तो वह ऐसे व्यक्ति को देखभाल और उपचार के लिए मनश्चिकित्सक या रोग विषयक मनोविज्ञानी को निर्देशित करेगा और, यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक मनोविज्ञानी मजिस्ट्रेट या न्यायालय को रिपोर्ट करेगा कि अभियुक्त चित्तविकृति से ग्रस्त है या नहीं।

परंतु यदि अभियुक्त. यथास्थिति, मनश्चिकित्सक या रोग विषयक मनोविज्ञानी द्वारा मजिस्ट्रेट को दी गई सूचना से व्यथित है तो वह चिकित्सा बोर्ड के समक्ष अपील कर सकेगा, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगा—-

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(क) निकटतम सरकारी अस्पताल में मनश्चिकित्सा एकक प्रमुख ; और

(ख) निकटतम चिकित्सा महाविद्यालय में मनश्चिकित्सा संकाय का सदस्य।

(2) यदि ऐसे मजिस्ट्रेट या न्यायालय को सूचना दी जाती है कि उपधारा (1क) में निर्दिष्ट व्यक्ति विकृतचित्त का व्यक्ति है, तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय आगे अवधारित करेगा कि चित्त विकृति के कारण अभियुक्त व्यक्ति अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है और यदि अभियुक्त इस प्रकार असमर्थ पाया जाता है तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा और अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्य के अभिलेख की परीक्षा करेगा और अभियुक्त के अधिववक्ता को सुनने के पश्चात् किंतु अभियुक्त से प्रश्न पूछे बिना, यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त के विरुद्ध कोई प्रथमदृष्टय़ा मामला नहीं बनता है, तो वह विचारण को स्थगित करने की बजाए अभियुक्त को उन्मोचित कर देगा और उसके संबंध में धारा 330 के अधीन उपबंधित रीति में कार्यवाही करेगा:

 परंतु यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि उस अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्टय़ा मामला बनता है जिसके संबंध में विकृतचित्त होने का निष्कर्ष निकाला गया है तो वह विचारण को ऐसी अवधि के लिए मुल्तवी कर देगा जो मनश्चिकित्सक या रोग विषयक मनोविज्ञानी की राय में अभियुक्त के उपचार के लिए अपेक्षित है।

(3) यदि मजिस्ट्रेट या न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि अभियुक्त के विरुद्ध प्रथमदृष्टय़ा मामला बनता है और वह मानसिक मंदत्ता के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है तो मजिस्ट्रेट या न्यायालय विचारण नहीं करेगा और यह आदेश देगा कि अभियुक्त के संबंध में धारा 330 के अनुसार कार्यवाही की जाए।]

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धारा 330

इस धारा के अनुसार अन्वेषण या विचारण के लंबित रहने तक विकृतचित्त व्यक्ति का छोड़ा जाना—

(1) जब कभी कोई व्यक्ति धारा 328 या धारा 329 के अधीन चित्तविकृति या मानसिक मंदता के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाया जाता है तब, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय, चाहे मामला ऐसा हो जिसमें जमानत ली जा सकती है या ऐसा न हो, ऐसे व्यक्ति को जमानत पर छोड़े जाने का आदेश देगा:

परंतु अभियुक्त ऐसी चित्तविकृति या मानसिक मंदता से ग्रस्त है जो अंतरंग रोगी उपचार के लिए समादेशित नहीं करती हो और

कोई मित्र या नातेदार किसी निकटतम चिकित्सा सुविधा से नियमित बाह्य रोगी मनि चिकित्सा उपचार कराने और उसे अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाने से निवारित रखने का वचन देता है।

(2) यदि मामला ऐसा है जिसमें, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय की राय में, जमानत नहीं दी जा सकतीया यदि कोई समुचित वचनबंध नहीं दिया गया है तो वह अभियुक्त को ऐसे स्थान में रखे जाने का आदेश देगा, जहां नियमित मनि चिकित्सा उपचार कराया जा सकता है और की गई कार्रवाई की रिपोर्ट राज्य सरकार को देगा ।

परंतु पागलखाने में अभियुक्त को निरुद्ध किए जाने के लिए कोई आदेश राज्य सरकार द्वारा मानसिक स्वास्थ्य अधिनियम, 1987 (1987 का 14) के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं।

(3) जब कभी कोई व्यक्ति धारा 328 या धारा 329 के अधीन चित्त विकृति या मानसिक मंदता के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाया जाता है तब, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय कारित किए गए कार्य की प्रकृति और चित्तविकृति या मानसिक मंदता की सीमा को ध्यान में रखते हुए आगे यह अवधारित करेगा कि क्या अभियुक्त को छोड़ने का आदेश दिया जा सकता है: परंतु

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(क) यदि चिकत्सा राय या किसी विशेषज्ञ की राय के आधार पर, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय धारा 328 या धारा 329 के अधीन उपबंधित रीति में अभियुक्त के उन्मोचन का आदेश करने का विनिश्चय करता है तो ऐसे छोड़े जाने का आदेश किया जा सकेगा, यदि पर्याप्त प्रतिभूति दी जाती है कि अभियुक्त को अपने आपको या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति पहुंचाने से निवारित किया जाएगा:

(ख) यदि, यथास्थिति, मजिस्ट्रेट या न्यायालय की यह राय है कि अभियुक्त के उन्मोचन का आदेश नहीं दिया जा सकता है तो अभियुक्त को चित्त विकृति या मानसिक मंदता के व्यक्तियों के लिए आवासीय सुविधा में अंतरित करने का आदेश दिया जा सकता है जहां अभियुक्त की देखभाल की जा सके और समुचित शिक्षा और प्रशिक्षण दिया जा सके।

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