अपकृत्य विधि के अनुसार संयुक्त अपकृत्यकर्ता क्या होता है?

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे अप्क्रत्य विधि संबन्धित कई पोस्ट का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की पोस्ट समझने मे आसानी होगी।

अपकृत्य एक विकास शाली विधि है। और समय समय पर इस विधि का विकास होता रहता है। समाज के सामाजिक तथा आर्थिक परिस्थितियों में परिवर्तन होते रहने के कारण अपकृत्य विधि में नए-नए सिद्धांत प्रतिपादित होते हैं।और नया नया विकास होता रहता है।

इसके अनुसार इंग्लैंड के विधिक इतिहास में अपकृत्य विधि का विकास वहां के न्यायिक कार्यवाहियों के विस्तार से हुआ। पहले वहां कुछ निश्चित मामले इसके अंतर्गत आते थे। धीरे-धीरे उन कार्यवाही के क्षेत्र में विस्तार हुआ। और अपकृत्य के बाद उन मामलों के संबंध में भी दायर होने लगे जिनके संबंध में उसके पूर्व क्षतिपूर्ति धारक मुकदमा दायर नहीं हो सकता था। इस प्रकार अपकृत्य विधि वहां की विधि के क्रमिक विकास का एक अभूतपूर्ण अंग है।और इसका विकास समाज के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जब दो या 2 से अधिक व्यक्ति कोई आपराधिक कार्य करते है या सलाह देते है या उसको करने के लिए बाध्य करते है। वह सब इसमे सम्मलित है। सबसे पहले इसका प्रतिपादन कॉक्स के मामले मे किया गया था।

संयुक्त अपकृत्यकर्ता वह होता है। जिसमे केवल एक ही वाद कारण होता है।संयुक्त अपकृत्यकर्ताओं में से यदि केवल एक के ही विरुद्ध निर्णय प्राप्त किया जाता है। और इससे वाद का हेतुक समाप्त हो जाता है। यदि वादी का दावा इस पर भी सन्तुष्ट नहीं होता तो ऐसे स्थित मे वह शेष संयुक्त अपकृत्यकर्ता के विरुद्ध कार्यवाही नहीं कर सकता। स्वतन्त्र अपकृत्यकर्ता की स्थिति में यह माना गया कि उतने वाद कारण हो सकते हैं।

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जितने कि स्वतन्त्र अपकृत्यकर्ता होते हैं। अतः ऐसे किसी एक अपकृत्यकर्ता के विरुद्ध की गयी कार्यवाही बाकी अन्य अपकृत्यकर्ताओं के विरुद्ध कार्यवाही करने के लिये बाधा नहीं बन सकती है।

अपकृत्य पूर्ण दायित्व समाज के सभी व्यक्तियों के प्रति होते हैं। ना कि किसी विशेष व्यक्ति के प्रति | अतः जो भी कार्य संबंधी अधिकारों के विपरीत होते हैं। उसके संबंध में अपकृत्य पूर्ण दायित्व हो जाता है।चाहे वह अकेले किसी एक व्यक्ति के द्वारा हो या संयुकत रूप से संयुक्त अपक्र्त्य कर्ता के द्वारा हुआ हो जैसे पुत्र डॉक्टर के असावधानी पूर्ण अपकृत्य से उत्पन्न आघात के लिए नुकसानी के लिए मुकदमा चला सकता है।

संयुक्त अपकृत्यकर्ताओं में से किसी एक की मुक्ति अन्य समस्त की मुक्ति में प्रतिफलित होती है। जब तक कि ऐसे स्थित न आ जाये कि इसके विपरीत कोई अभिसंविदा न हो। स्वतन्त्र अपकृत्यकर्ताओं की स्थिति इससे भिन्न है। अर्थात् उनमें से किसी एक स्वतन्त्र अपकृत्यकर्ता की मुक्ति अन्य अपकृत्यकर्ताओं को मुक्त नहीं करती। संयुक्त अपकृत्यकर्ताओं का दायित्व संयुक्त एवं पृथक् दोनों प्रकार का होता है।

उदाहरण –

दो जहाज समुद्र मे जा रहा था और एक दूसरे से टकरा गया तो यह संयुक्त अपकृत्य मे नही आएगा क्योकि दोनों जहाज स्वतंत्र है।
दूसरा उदाहरण हम बस मे चल रहे 6 नागरिकों का देते है जो कि बस मे चोरी के उद्देश्य से घुसे थे जिसमे से 3 ने बंदूक दिखा कर खड़े थे और 3 चोरी कर रहे थे तो यह संयुक्त अपकृत्य माना जाएगा और उन व्यक्तियों को संयुक्त अपकृत्यकर्ता माना जाएगा।
इसको 3 श्रेणी मे बाटा गया है।

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अभिकरण
प्रतिनिधिक दायित्व
संयुक्त कृत्य

अभिकरण – अभिकरण के अंतर्गत यदि कोई अपना कार्य करने के लिए दूसरे की नियुक्ति करता है तो वह अभिकरण कहलाता है। इसमे दोनों व्यक्ति आपराधिक प्रक्रति के होंगे।

उदाहरण –

जब कोई ठेकेदार किसी व्यक्ति को कार्य के बदले घूस लेने के लिए नियुक्त करता है और वह व्यक्ति उस कार्य को करता है तो ठेकेदार और वह व्यक्ति दोनों ही इसके लिए उत्तरदायी होंगे।

प्रतिनिधिक दायित्व

इसमे व्यक्ति अपकर्त कार्य करने के लिए साथ देते है जैसे मालिक और सेवक इसमे मालिक प्रतिनिधित्व करता है और सेवक कार्य करता है। तो दोनों इसके लिए उत्तरदायी होता है।

जब कोई भी समूह या गुट आवश्यक निर्णय लेने तथा बातचीत के लिए अपने बड़े आकार के कारण प्रत्येक अवसर पर अपने सभी सदस्यों को एकत्रित नहीं कर सकते। इसके लिए वे अपने कुछ प्रतिनिधि को सदस्यों के रूप मे चुनाव कर लेते हैं। जो भविष्य में प्रत्येक निर्णय में भागीदार बनते हैं। और समूह या गुट का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस दृष्टि से प्रतिनिधियों द्वारा समूह के लिए अधिकृत शक्ति के तहत कार्य करना प्रतिनिधित्व कहलाता है।
इसके निम्न प्रकार होते है।

  1. प्रादेशिक प्रतिनिधित्व
  2. व्यावसायिक प्रतिनिधित्व
  3. आनुपातिक प्रतिनिधित्व
  4. अल्पसंख्यक प्रतिनिधित्व

संयुक्त कृत्य

इसके अंतर्गत कई व्यक्ति जिसने अपराध किया है उसे दोषी सिद्ध किया जाए औरवह दंडित किया जाए। किन्तु कुछ ऐसे अपराध हैं । जहां व्यक्ति को कुछ कारणों से अन्यों के साथ संयुक्त रूप से दोषी माना जाता है। इसे संयुक्त दायित्व का सिद्धान्त कहा जाता है। जब दो या दो से अधिक व्यक्ति किसी अपराधिक उद्देश्य को पूरा करता है तो वह संयुक्त क्रत्य के अंतर्गत आता है।

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