मूल अधिकार (Fundamental Rights) क्या होता हैं स्वतंत्रता काअधिकार से संबन्धित सभी नियमो का विश्लेषणात्मक अध्ययन

Fundamental Right Article 19-22-Hindi Law Notes

कुछ अधिकार ऐसे होते है जो मानव जीवन के लिए अति आवश्यक होता है, उन्ही मे से एक है मूल अधिकार अथवा मौलिक अधिकार। सभी देशों के संविधान मे मूल अधिकारों का वर्णन देखने को मिल जाता है। मूल अधिकारों का मुख्य उद्द्येश्य नागरिकों के हितो की रक्षा करना होता है, जो राज्यों के द्वारा निर्देशित किया जाता है। भारतीय संविधान के भाग 3 मे मूल अधिकारों का वर्णन किया गया है। मूल अधिकार नागरिकों के मानसिक और सामाजिक उत्थान के लिए अति आवश्यक है। मूल अधिकारों को न्यायालय द्वारा न्यायिक संरक्षण भी प्राप्त होता है। न्यायालय मूल अधिकलरों को न्यायिक प्रक्रिया के द्वारा पालन करा सकती है। इन अधिकारों मे परिवर्तन सरकार द्वारा संविधान मे संसोधन के द्वारा किया जा सकता है।

भारतीय संविधान मे मूल अधिकारों को ब्रिटेन के संविधान के द्वारा ग्रहण किया गया है। ब्रिटेन मे जनता को अधिकार प्रदान करने की शक्ति को मैग्ना कार्टा कहते है। इसीलिए भारतीय संविधान के भाग 3 को भी मैग्ना कार्टा के नाम से जाना जाता है।
मूल अधिकारों मे पहले 7 अधिकारों का वर्णन था। परंतु 44वे संविधान संसोढंके द्वारा संपत्ति के अधिकार को पृथक कर दिया गया। 1979 ई॰ मे इसके लिए अलग अनुच्छेद 300 (9) का निर्माण किया गया।

भारतीय संविधान के अंतर्गत निम्न मूल अधिकार दिये गए है।

1) समता और समानता का अधिकार जो कि अनुच्छेद 14 से अनुच्छेद 18 के अंतर्गत आते है।

2) स्वांतरता का अधिकार जो कि अनुच्छेद 19 से 22 के अंतर्गत आता है।

3)शोषण के विरुद्ध अधिकार जो कि अनुच्छेद 23 और 24 ने वर्णित है।

4) धार्मिक स्वतन्त्रता का अधिकार जो कि अनुच्छेद 25 से 28 के अंतर्गत आता है।

5) संस्कृति और शिक्षा का अधिकार जो कि अनुच्छेद 29 और 30 मे बताया गया है।

अब हम बात करेंगे स्वतन्त्रता के अधिकार कि जो कि हमारे संविधान मे अनुच्छेद 19 से 22 मे वर्णित है।

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अनुच्छेद 19- यह अनुच्छेद भारतीय संविधान का वह अनुच्छेद है जिसे आपातकाल की स्थिति मे सबसे पहले समाप्त किया जा सकता है। इसके अनुसार शुरुआत मे 7 प्रकार की स्वतन्त्रता बताई गई थी जो कि वर्तमान मे 6 तक सीमित कर दिया गया है। जिसमे से 44वे संविधान संसोधन के द्वारा संपाती के अधिकार को समाप्त कर दिया गया।

अनुच्छेद 19 (1)
बोलने की स्वतन्त्रता- भारतीय नागरिक पूर्ण रूप से उचित भाषण दे सकता है। अपने मन की बात किसी से व्यक्त कर सकता है। वाक अथवा अभिव्यक्ति की पूर्ण स्वतन्त्रता होनी चाहिए इसके अलावा इनके अंतर्गत नीम स्वतन्त्रता दी गई है।
प्रेस की स्वतन्त्रता
प्रसारण की स्वतन्त्रता
सूचना का अधिकार
मौन रहने का अधिकार
राष्ट्रध्वज लहराने का अधिकार
इन स्वतन्त्रता पर सरकार का प्रतिबंध लगाया जा सकता है यदि राष्ट्र की एकता अथवा अखंडता पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हो तो। जैसे यदि कोई नारे जो राष्ट्र के सम्मान के विरुद्ध हो तो उनपर प्रतिबंध लगाया जा सकता है या फिर हाल ही मे एक समाचार चैनल द्वारा एक धर्म विशेष को UPSC जेहाद जैसे शीर्षक जैसे प्रसारण पर माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिबंध लगाया गया है।

अनुच्छेद 19 (2)
सम्मेलन करने की स्वतन्त्रता- सम्मेलन को शांतिपूर्ण होना चाहिए एवं सम्मेलन उचित होना चाहिए। इस पर भी राज्य के द्वारा रोक लगाई जा सकती है। यदि सम्मेलन का उद्द्येश्य राज्य के विरुद्ध हो।

अनुच्छेद 19 (3)
संघ या सभा बनाने की स्वतन्त्रता- भारतीय नागरिकों को यह अधिकार दिया गया है कि वो संघ (पार्टी) बना सकते है अथवा सभा स्थापित कर सकते है। इसमे 97वां संविधान संसोधन 2011 के अनुसार सहकारी समितियों की स्थापना की गई थी। इसका विस्तार अनुच्छेद 243 भाग 9 (2) मे बताया गया है। राज्य, सैन्य दल, कोर्ट आदि कोई संघ अथवा सभा की स्थापना नहीं कर सकते है।

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अनुच्छेद 19 (4)
भ्रमण की स्वतन्त्रता- भारत का कोई भी नागरिक भारत के किसी भी क्षेत्र मे पूर्ण रूप घूमने की आज़ादी रख सकता है। परून्त राज्य को इनके ऊपर निगरानी रखने का भी अधिकार क्षेत्र है साथ ही साथ किसी खास स्थान को आम नागरिकों के लिए सुरक्षा एवं अन्य कारणो के आधार पर प्रतिबंधित भी किया जा सकता है।

अनुच्छेद 19 (5)
स्थायी निवास की स्वतन्त्रता- जिस प्रकार से एक भारतीय नागरिक को कहीं भी भ्रमण करने की स्वतन्त्रता प्राप्त होती है ठीक उसी प्रकार किसी भी राज्य मे किसी भी नागरिक को निवास करने की भी स्वतन्त्रता प्राप्त होती है। कुच्छ देशो की तरह भारत मे राज्यों मे निवास करने हेतु अलग नागरिकता की आवश्यकता नहीं होती है। लेकिन उपयुक्त कारणो के आधार पर इनपर राज्य द्वारा प्रतिबंध भी लगे जा सकता है।

अनुच्छेद 19 (6) संविधान के 44वे संसोधन के द्वारा इसका विलोपन किया जा चुका है।

अनुच्छेद 19 (7)
व्यापार की स्वतन्त्रता- किसी भी भारतीय नागरिक को कानून के अंतर्गत रहते हुए किसी भी प्रकार के व्यापार, किसी भी प्रकार के आजीविका के चयन का पूर्ण अधिकार प्राप्त है वो कोई भी कार्य अथवा किसी भी स्थान पर अपने व्यवसाय अथवा कार्य की शुरुआत कर सकता है। लेकिन इसके साथ ही कानून के अंतर्गत आने वाले निषेधित कार्य करने की मनाही भी है तथा साथ की साथ अगर किसी व्यवसाय के लिए कुछ सरकारी अनुमोदन की आवश्यकता है तो उनका पालन करना भी अति आवश्यक है।

अनुच्छेद 20
दोष सिद्धि के संरक्षण का अधिकार- अनुच्छेद 20 के अंतर्गत किसी भी नागरिक को तब तक दोषी नहीं माना जा सकता है जब तक कि उसका दोष सिद्ध नहीं हो जाता है।
इसके अनुसार दंड के लिए गिरफ्तारी हेतु उसके कारणों को बताना होता है।
जिस समय गिरफ्तारी हुई है उस समय लागू कानून का ही प्रयोग किया जा सकता है।
व्यक्ति को अपना पक्ष रखने के लिए अधिवक्ता रखने का सम्पूर्ण अधिकार प्राप्त होता है।
साथ ही एक ही दोष के लिए एक बार से ज्यादा दंड देने का अधिकार नहीं है।

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अनुच्छेद 21
प्राण और दैहिक स्वतन्त्रता (जीवन का अधिकार)- आपातकाल की स्थिति मे भी अनुच्छेद 20 और 21 को राज्य के द्वारा हटाया नहीं जा सकता है। जीने का अधिकार सभी व्यक्ति को है किसी भी कानूनी प्रक्रिया के आधार पर राज्य के द्वारा जीवन के अधिकार का हनन नहीं किया जा सकता है।
इसके अलावा कुछ अन्य अधिकार है जो इस प्रकार से है-
स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार-
महिलाओं के सम्मान का अधिकार-
14 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए अनिवार्य शिक्षा का अधिकार-

अनुच्छेद 22
कुछ दशाओं मे गिरफ्तारी एवं निषेध का संरक्षण- यदि किसी व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया है तो 24 घण्टे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करना होता है। परंतु इसमे उस समय की गणना नहीं की जाती है- यदि उसके मध्य सार्वजनिक छुट्टी आ जाये अथव यात्रा के लिए लगे समय को मान्य नहीं किया जाता है। 24 घण्टे के निर्धारण मे ठाणे पहुँचने से मजिस्ट्रेट के पास पहुँचने तक के समय को लिया जाता है। दोषी व्यक्ति को कोई स्टेटमेंट देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है। व्यक्ति अपनी मर्जी से वकील कर सकता है। एक ही अपराध के लिए एक ही सजा मिलेगी। यह केवल राज्य मे लागू होता है। ये नियम देशद्रोह, आतंकवाद अथवा बाहरी शत्रु के ऊपर लागू नहीं होता है।

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