भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार धारा 51 से 57 तक का अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे हमने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार धारा 50  तक का अध्ययन  किया था अगर आप इन धाराओं का अध्ययन कर चुके है।  तो यह आप के लिए लाभकारी होगा ।  यदि आपने यह धाराएं  नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने मे आसानी होगी।

धारा 51 –

इस धारा के अनुसार राय के आधार कब सुसंगत हैं यह बताया गया है। जिसके अनुसार  जब कभी किसी जीवित व्यक्ति कि राय सुसंगत है।  तो वे आधार भी जिन पर उनकी राय  आधारित है। वह  सुसंगत है।

उदाहरण –

 कोई विशेषज्ञ अपनी राये बनाने के प्रयोजनार्थ किए हुए प्रयासों का विवरण दे सकता है।

धारा 52 –

इस धारा के अनुसार सिविल मामलों में अध्यारोपित आचरण साबित करने के लिए शील विसंगत है यह बताया गया है। इसके अनुसार  सिविल मामलों में यह तथ्य कि किसी सम्पृक्त व्यक्ति का शील ऐसा होना चाहिए  कि जो उस पर अध्यारोपित किसी आचरण को अधिसम्भाव्य या अनधि संभाव्य बना देता है।  विसंगत है वहां तक के सिवाय जहां तक कि ऐसा शील अन्यथा सुसंगत तथ्यों से प्रकट होता है।

धारा 53-

इस धारा के अनुसार  दांडिक मामलों में पूर्वतन अच्छा शील सुसंगत है यह बताया गया है। इसके अनुसार  दांडिक कार्यवाहियों में यह तथ्य सुसंगत है कि अभियुक्त अच्छे शील का है।

 53 क के अनुसार  कतिपय मामलों में शील या पूर्व लैंगिक अनुभव के साक्ष्य का सुसंगत न होना बताया गया है।  भारतीय दण्ड संहिता 1860  की धारा 354, धारा 354क, धारा 376ख, खारा 376ग, धारा 376घ, या धारा 376ड, के अधीन किसी अपराध के लिए किसी अभियोजन में या फिर किसी ऐसे अपराध से करने के प्रयत्न के लिए जहां पर सम्मति का प्रश्न विवाद्य है। तब  वहां पीड़िता के शील या फिर  ऐसे व्यक्ति का किसी व्यक्ति के साथ पूर्व लैंगिक अनुभव का साक्ष्य ऐसी सम्मति या सम्मति का गुणता के मुद्दे पर सुसंगत नहीं होगा।

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धारा 54 –

इस धारा के अनुसार उत्तर में होने के सिवाय पूर्वतन बुरा शील सुसंगत नहीं है। यह बताया गया है।

इस धारा के अनुसार दाण्डिक कार्यवाहियों में जिसमे यह तथ्य निश्चित होता है  कि अभियुक्त व्यक्ति बुरे शील का है। या फिर वह  विसंगत है।  जब तक कि इस बात का साक्ष्य न दिया गया हो कि वह अच्छे शील का है।  जिसके दिए जाने की दशा में वह सुसंगत हो जाता है।

स्पष्टीकरण 1— यह धारा उन मामलों को लागू नहीं होती है ।  जिनमें किसी व्यक्ति का बुरा शील स्वयं विवाद्यक तथ्य है।

स्पष्टीकरण 2- पूर्व दोषसिद्ध बुरे शील के साक्ष्य के रूप में सुसंगत है।

धारा 55 –

इस धारा के अनुसार नुकसानी पर प्रभाव डालने वाला शील को बताया गया है। जिसके अनुसार  सिविल मामलों में जिसमे की  यह तथ्य  बताया गया है कि किसी व्यक्ति का शील ऐसा है । जिससे नुकसानी की रकम पर जो उसे मिलनी चाहिए उस पर  प्रभाव पड़ता है। तो यह सुसंगत हैं।

स्पष्टीकरण –

 धारा 52, 53, 54 तथा  55 में ‘शील’ शब्द के अन्तर्गत ख्याति और स्वभाव दोनों को बताया गया है । किन्तु धारा 54 में यथा उपबन्धित के सिवा केवल साधारण ख्याति व साधारण स्वभाव का ही न कि ऐसे विशिष्ट कार्यों के लिए  जिनके द्वारा ख्याति या स्वभाव दर्शित हुये थे। उनका  साक्ष्य दिया जा सकेगा।

धारा 56 –

इस धारा के अनुसार न्यायिक रूप से अपेक्षणीय तथ्य साबित करना आवश्यक नहीं है यह बताया गया है । इस धारा के अनुसार  जिस तथ्य की न्यायालय न्यायिक अवेक्षा करेगा तो  उसे साबित करना आवश्यक नहीं है।

धारा 57-

इस धारा के अनुसार  वे तथ्य आते है ।  जिनकी न्यायिक अवेक्षा न्यायालय को करनी होगी। न्यायालय निम्नलिखित तथ्यों की न्यायिक अवेक्षा करता है। जैसे कि-

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(1) भारत के राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त होने वाली  समस्त विधियां

(2) यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट के  द्वारा पारित या तत्पश्चात् पारित किए जाने वाले समस्त पब्लिक ऐक्ट तथा वे समस्त स्थानीय और पर्सनल ऐक्ट जिनके बारे में यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट ने निर्दिष्ट किया है।  कि उनकी न्यायिक अवेक्षा की जानी चाहिए।

(3) भारतीय सेना या फिर वायुसेना से लिए युद्ध की नियमावली आदि ।

(4) यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेन्ट का भारत की संविधान सभा की तथा संसद की तथा किसी प्रान्त या राज्यों में तत्समय प्रवृत्त विधियों के अधीन स्थापित विधान-मण्डलों की कार्यवाही का अनुकरण ।

(5) ग्रेट ब्रिटेन और आयरलैंड की यूनाइटेड किंगडम के तत्समय प्रभु का राज्यारोहण और राज हस्ताक्षर

(6) वे सब मुद्राएं जिनकी अंग्रेजी न्यायालय न्यायिक अवेक्षा करते हैं। तथा  भारत में  सब न्यायालयों की और केन्द्रीय सरकार या क्राउन रिप्रेजेंटेटिव के पदाधिकारी के  द्वारा भारत के बाहर स्थापित सब न्यायालयों की मुद्राएं नावधिकरण और समुद्री अधिकारिता वाले न्यायालयों की और नोटरी पब्लिक की मुद्राएं तथा  वे सब मुद्राएं जिनका कोई व्यक्ति संविधान या यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेंट के किसी ऐक्ट या भारत में विधि का बल रखने वाले अधिनियम या विनिमय द्वारा उपयोग करने के लिए प्राधिकृत है।

(7) किसी राज्य में किसी लोकपद पर तत्समय आरुढ़ व्यक्तियों के कोई पदारोहण उसकी  नाम, उपाधियां, कृत्य और हस्ताक्षर, यदि ऐसे पद पर उनकी नियुक्ति का तथ्य किसी शासकीय राजपत्र में अभिसूचित किया गया हो।

(8) भारत सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हर राज्य या प्रभु का अस्तित्व तथा  उपाधि और राष्ट्रीय ध्वज।

(9) समय के प्रभाग तथा  पृथ्वी के भौगोलिक प्रभाग तथा शासकीय राजपत्र में अधिसूचित लोक उत्सव तथा  उपवास और अवकाश-दिन।

(10) भारत सरकार के आधिपत्य के अधीन राज्य-क्षेत्र आदि।

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(11) भारत सरकार और अन्य किसी राज्य या व्यक्तियों के निकाय के बीच संघर्ष का प्रारंभ होना  चालू रहना और पर्यवसान।

(12) न्यायालय के सदस्यों और अफसरों के तथा उनके उप-पदियों और अधीनस्थ ऑफिसर और सहायकों के और उसकी आदेशिकाओं के निष्पादन में कार्य करने वाले सब अफसर  तथा सब अधिवक्ताओं, अटर्नियों, प्रोक्टरों, वकीलों, प्लीडरों, और उसके समक्ष उपसंजात होने या कार्य करने के लिए किसी विधि द्वारा प्राधिकृत अन्य व्यक्तियों के नाम।

(13) भूमि या समुद्र पर मार्ग का नियम।इन सभी मामलों में, तथा इतिहास, साहित्य, विज्ञान या कला के सब विषयों में भी न्यायालय समुपयुक्त निर्देश पुस्तकों या दस्तावेजों की सहायता ले सकेगा।

यदि न्यायालय किसी तथ्य की न्यायिक अवेक्षा करने की किसी व्यक्ति द्वारा प्रार्थना की जाती है।  तो यदि और जब तक वह व्यक्ति कोई ऐसी पुस्तक या दस्तावेज पेश न कर दे।  जिसे ऐसा न्यायालय अपने को ऐसा करने को समर्थ बनाने के लिए आवश्यक  समझता है।  न्यायालय ऐसा करने के इनकार कर सकेगा।

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