भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार धारा 79 से 86 तक का अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे हमने भारतीय साक्ष्य अधिनियम के अनुसार धारा  78   तक का अध्ययन  किया था अगर आप इन धाराओं का अध्ययन कर चुके है।  तो यह आप के लिए लाभकारी होगा ।  यदि आपने यह धाराएं  नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने मे आसानी होगी।

धारा 79

इस धारा के अनुसार प्रमाणित प्रतियों के असली होने के बारे में उपधारणा को बताया गया है। इसके अंतर्गत  न्यायालय हर ऐसी दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा जो की ऐसा प्रमाण-पत्र, प्रमाणित प्रति या अन्य दस्तावेज होनी तात्पर्यित है।

 जिसका किसी विशिष्ट तथ्य के साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होना विधि द्वारा घाषित किया गया है।  और जिसका केन्द्रीय सरकार या फिर  किसी रान्य सरकार के किसी अफसर के  द्वारा या जम्मू-कश्मीर  के किसी ऐसे अफसर के  द्वारा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इसके लिए सम्यक् रूप से प्राधिकृत हो, सम्यक् रूप से प्रमाणित होना तात्पर्यित है।
न्यायालय यह भी उपधारित करेगा कि कोईअफसर , जिसके द्वारा ऐसी दस्तावेज का हस्ताक्षरित या प्रमाणित होना तात्पर्यित है।  वह पदीय हैसियत, जिसका वह ऐस कागज में दावा करता है। उस समय रखता था जब उसने उसे हस्ताक्षरित किया था।

धारा 80

इस धारा के अंतर्गत साक्ष्य के अभिलेख के तौर पर पेश की गई दस्तावेजों के बारे में उपधारणाको बताया गया है। इस धारा के अनुसार  जब कभी किसी न्यायालय के समद्वा कोइ्र ऐसी दस्तावेज पेश की जाती है। तो  जिसका किसी न्यायिककार्यवाही  में या फिर  विधि के द्वारा ऐसा साक्ष्य लेने के लिए प्राधिकृत किसी अफसर के समक्ष, किसी साक्षी द्वारा दिए गए साक्ष्य या साक्ष्य के किसी भाग का अभिलेख या ज्ञापन होना अथवा किसी कैदी या अभियुक्त का विधि के अनुसार लिया गया कथन या संस्वीकृति होना तात्पर्यित हो ।

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और जिसका किसी न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा या उपर्युक्त जैसे किसी अफसर  द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित हो, तब न्यायालय उपधारित करेगा-
कि वह दस्तावेज असली है या नही कि उन परिस्थितियों के बारे जिसके अधीन वह लिया गया था उससे संबन्धित कोई भी कथन, जिनका उसका हस्ताक्षरित करने वाले व्यक्ति द्वारा किया जाना तात्पर्यित है।  सत्य है तािा कि ऐसा साक्ष्यया संस्सीकृति सम्यक् रूप से ली गई थी।

धारा 81

इस धारा के अनुसार राजपत्रों, समाचारपत्रों, पार्लियामेन्ट के प्राइवेट एक्टों और अन्य दस्तावेजों के बारे में उपधारणाएं  को बताया गया है।  न्यायालय हर ऐसी दस्तावेज का असली होना उपधारित करेगा जिस समब्न्ध मे  जिसका लंदन गजट, या कोई शासकीय राजपत्र या ब्रिटिश क्राउन के किसी उपनिवेश, आश्रित देश या कब्जाधीन क्षेत्र का सरकारी राजपत्र का  होना या कोई समाचार पत्र या जर्नल होना, या यूनाइटेड किंगडम की पार्लियामेन्ट के प्राइवेट ऐक्ट की क्वीन्स प्रिन्टर द्वारा मुद्रित प्रति होना यह  तात्पर्यित है तथा हर ऐसी दस्तावेज का जिसका ऐसी दस्तावेज होना तात्पर्यित किया गया  है जिसका किसी व्यक्ति द्वारा रखा जाना किसी विधि द्वारा निर्दिष्ट है, यदि ऐसी दस्तावेज सारतः उस प्ररूप में रखी गई हो, जो विधि द्वारा अपेक्षित है, और उचित अभिरक्षा में से पेश किया गया होउसका  असली होना उपधारित करेगा।

धारा 82

इस धारा के अनुसार मुद्रा या हस्ताक्षर के सबूत के बिना इंग्लैण्ड में ग्राह्य दस्तावेज के बारे में उपधारणा  को बताया गया है।  जबकि किसी न्यायालय के समक्ष कोई ऐसी दस्तावेज पेश की जाती है।  जिसका ऐसी दस्तावेज होना तात्पर्यित है जो इंग्लैण्ड या आयरलैण्ड के किसी न्यायालय में किसी विशिष्ट को साबित करने के लिए उस दस्तावेज को अधिप्रमाणीकृत करने वाली मुद्रा या स्टांप या हस्ताक्षर को या उस व्यक्ति द्वारा जिसके द्वारा उसका हस्ताक्षरित किया जाना तात्पर्यित है।

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उसका दावाकृत न्यायिक या पदीय हैसियत को साबित किये बिना इंग्लैण्ड या आयरलैण्ड में तत्समय प्रवृत्त विधि के अनुसार ग्राह्य होतीहै  तब न्यायालय यह उपधारित करेगा कि ऐसी मुद्रा, स्टांप या हस्ताक्षर असली है।  और उसको हस्ताक्षरित करने वाला व्यक्ति, वह न्यायिक या पदीय हैसियत, जिसका वह दावा करता है।  उस समय रखता था जब उसने उसे हस्ताक्षरित किया था। दस्तावेज उसी प्रयोजन के लिए जिसके लिए वह इंग्लैण्ड या आयरलैण्ड में ग्राह्य होतीहै । वह  ग्राह्य होगी।

धारा 83

इस धारा के अनुसार  सरकार के प्राधिकार द्वारा बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों के बारे में उपधारणा को बताया गया है। जिसमे  न्यायालय यह उपधारित करेगा कि वे मानचित्र या रेखांकजो  की केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी राज्य सरकार के प्राधिकार द्वारा बनाए गए तात्पर्यित है।  वैसे ही बताए गए थे और वे शुद्ध है किन्तु किसी मामले के प्रयोजनों के लिए बनाए गए मानचित्रों या रेखांकों के बारे  में यह साबित करना होगा कि वे सही है।

धारा 84

इस धारा के अनुसार विधियों के संग्रह और विनिश्चयों की रिपोर्टों के बारे में उपधारणा के बारे मे बताया गया है। जिसमे  न्यायालय हर ऐसी पुस्तक का जिसका किसी देश की सरकार के प्राधिकार के अधीन मुद्रित या प्रकाशित होना और जिसमें उस देश की कोई विधियाँ अन्तर्विष्ट होना तात्पर्यित है। ऐसे हर ऐसी पुस्तक का जिसमें उस देश के न्यायालय के विनिश्चयों की रिपोर्ट अन्तर्विष्ट होना तात्पर्यित है। उसका  असली होना उपधारित करेगा।

धारा 85

इस धारा के अनुसार मुख्तारनामों के बारे में उपधारणा को बताया गया है। जिसमे की  न्यायालय यह उपधारित करेगा कि हर ऐसी दस्तावेज जिसका मुख्तारनामा होना और नोटरी पब्लिक या किसी न्यायालय के  न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट, भारतीय कौन्सल या उपकौन्सल या केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि के समक्ष निष्पादित और उस द्वारा अधिप्रमाणीकृत होना तात्पर्यित है। तो  यह  ऐसे निष्पादित और अधिप्रमाणीकृत की गई थी।

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धारा 86

इस धारा के अनुसार  विदेशी न्यायिक अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियों के बारे में उपधारणा  को बताया गया है। जिसमे  न्यायालय यह उपधारित कर सकेगा कि ऐसे किसी देश के जो भारत का या हर मजेस्टी के अधिक्षेत्रों का भाग नहीं है। उस  न्यायिक अभिलेख की प्रमाणित प्रति तात्पर्यित होने वाली कोई दस्तावेज असली और शुद्ध है।  यदि वह दस्तावेज किसी ऐसी रीति से प्रमाणित हुई तात्पर्यित हो जिसका न्यायिक अभिलेखों की प्रतियों के प्रमाणन के लिए उस देश में साधारणतः काम में लाई जाने वाली रीति होना ऐसे देश में या के लिए केन्द्रीय सरकार के किसी प्रतिनिधि द्वारा प्रमाणित है।

जो ऑफिसर ऐसे किसी राज्यक्षेत्र या स्थान के लिए जो भारत का या हर मजेस्टी के अधिक्षेत्रों का भाग नहीं है। तो वह  साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 3, खण्ड (43) में यथा परिभाषित राजनैतिक अभिकर्ता है।  वह इस धारा के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार का उस देश में और के लिए प्रतिनिधि समझा जाएगा जिसमें वह राज्यक्षेत्र या स्थान समाविष्ट है।

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