महिलाओ के लिए कानून जो आपको जानना है जरूरी

Law for Women Right

“यत्र नार्यस्तु पूज्यंते रमन्ते तत्र देवता” अर्थात् “जिस कुल में नारियों की पूजा होती है वहीं देवता निवास करते हैं | पुराने ज़माने से ही कहा जा रहा है कि औरते पैदा नहीं होती अपितु बनती है एवं उनमे दुनिया को बदलने की ताकत होती है, असमानता और संघर्ष की स्थिति में भी महिलाएं ऊपर उठने की क्षमता के साथ काम करती हैं और न केवल अपने जीवन को बदलती हैं बल्कि अपने पूरे समुदाय को बदलने का हौसला रखती है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हमारा देश खेल से लेकर तकनीक और शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है. इस प्रगति में पुरुषों के साथ महिलाओं का भी उतना ही योगदान है पर आज भी कभी लोक-लाज और समाज के डर से तो कभी खुद के अधिकारों की जानकारी ना होने की वजह से महिलाओं का उत्पीड़न होता है. आइए जानते हैं कि शादीशुदा महिलाओं के क्या अधिकार होते हैं।

“लोगों को जगाने के लिये महिलाओं का जागृत होना जरुरी है, एक बार जब वो अपना कदम उठा लेती है तो उनके पीछे–पीछे परिवार आगे बढ़ता है, गाँव आगे बढ़ता है और राष्ट्र विकास की ओर उन्मुख होता है।“

भारतीय संविधान की प्रस्तावना (preamble) में ही कहा गया है कि कानून की नज़र में सभी नागरिक एक सामान है |

 इसे अनुच्छेद 14 के माध्यम से एक मौलिक अधिकार भी बनाया गया हैं, जो सुनिश्चित करता है कि राज्य[1] किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से वंचित नहीं कर सकता हैं और यह वर्ग विधान को प्रतिबंधित करता है । यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो महिलाओं को किसी भी महिला आधारित अपराध के खिलाफ समान कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।

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 अनुच्छेद 15(1) धर्म, जाति, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर किसी भी नागरिक के खिलाफ भेदभाव को प्रतिबंधित करता है। जबकि अनुच्छेद 15(3) महिलाओं के पक्ष में “सुरक्षात्मक भेदभाव” की अनुमति देता है, जिसके अनुसार राज्य महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है और इस लेख का दायरा इतना व्यापक है कि इसमें रोजगार सहित राज्य की सभी गतिविधियों को शामिल किया जा सकता है।

अनुच्छेद 16 भारत के प्रत्येक नागरिक को समान रोजगार के अवसर सुनिश्चित करता है। माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने हमारे देश में यौनकर्मियों (prostitutes) को कुछ तकनीकी कौशल प्रदान कर देकर उन्हें सम्मान का जीवन प्रदान करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया, जिसके माध्यम से वे अपने शरीर को बेचने के बजाय अपनी आजीविका कमा सकते हैं।

आपने अक्सर ऐसे मामले सुने होंगे, जिसमें दहेज के चलते महिलाओं को काफी कुछ सहना पड़ता है. आपको बता दें कि हमारे देश में महिलाओं को Dowry Prohibition Act 1961 के तहत ये अधिकार दिया गया है कि अगर उसके पैतृक परिवार या ससुरालवालों के बीच किसी भी तरह के दहेज का लेन-देन होता है, तो वह इसकी शिकायत कर सकती हैं. वहीं, IPC (Indian Penal Code, 1860) की धारा 304B (दहेज हत्या) और 498A (दहेज के लिए प्रताड़ना) के तहत दहेज के लेन-देन और इससे जुड़े उत्पीड़न को गैर-कानूनी और अपराध बताया गया है.

घरेलू हिंसा के खिलाफ अधिकार
महिलाओं की सुरक्षा के लिए Domestic violence Act 2005 बनाया गया था. इसके तहत एक महिला को यह अधिकार दिया गया है, कि अगर उसके साथ पति या उसके ससुराल वाले शारीरिक, मानसिक, इमोशनल, सैक्शुअल या फाइनेंशियल तरीके से अत्याचार करते हैं या शोषण करते हैं, तो पीड़िता उनके खिलाफ शिकायत दर्ज करा सकती है.  

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नाम न छापने का अधिकार: यौन उत्पीड़न की शिकार महिलाओं को नाम न छापने देने का अधिकार है. अपनी गोपनीयता की रक्षा करने के लिए यौन उत्पीड़न की शिकार हुई महिला को नाम न छापने का अधिकार है।

संपत्ति का अधिकार
ज्यादातर महिलाओं या लड़कियों को इस बात की जानकारी नहीं है कि शादी के बाद भी वो अपने माता-पिता की संपत्ति में हकदार होती हैं. साल 2005 में The Hindu Succession Act, 1956 में संशोधन किया गया. इसके तहत एक बेटी चाहे वह शादीशुदा हो या ना हो, अपने पिता की संपत्ति को पाने का बराबरी का हक रखती है.

अबॉर्शन का अधिकार
किसी भी महिला के पास अबॉर्शन का अधिकार होता है यानी वह चाहे तो अपने गर्भ में पल रहे बच्चे को अबॉर्ट कर सकती है. इसके लिए उसे अपने पति या ससुरालवालों के सहमति की जरूरत नहीं है. The Medical Termination of Pregnancy Act, 1971 के तहत ये अधिकार दिया गया है कि एक महिला अपनी प्रेग्नेंसी को किसी भी समय खत्म कर सकती है. हालांकि, इसके लिए प्रेग्नेंसी 24 सप्ताह से कम होनी चाहिए. लेकिन स्पेशल केसेज़ में एक महिला अपने प्रेग्नेंसी को 24 हफ्ते के बाद भी अबॉर्ट करा सकती है.

ऑफिस में हुए उत्पीड़न के खिलाफ अधिकार: काम पर हुए यौन उत्पीड़न अधिनियम के अनुसार आपको यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज करने का पूरा अधिकार है.

 मातृत्व संबंधी लाभ के लिए अधिकार: मातृत्व लाभ कामकाजी महिलाओं के लिए सिर्फ सुविधा नहीं, बल्कि ये उनका अधिकार है. मातृत्व लाभ अधिनियम के तहत एक नई मां 6 माह तक अवकास ले सकती है।

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