औद्योगिक विवादों का अधिनियम, 1947 के प्रमुख उपबन्धों का वर्णन

 श्रम न्यायालय (Labour Court) धारा 7के अनुसार :

इस धारा के अन्तर्गत न्याय सम्बन्धी निर्णय के लिए श्रम न्यायालय की स्थापना की गई है। इस के अनुसार समुचित सरकारी गजट में अधिसूचना जारी करके एक या फिर एक से अधिक श्रम न्यायालयों की नियुक्ति किये जाने वाला केवल एक ही व्यक्ति होगा।

श्रम न्यायालय का पीठासीन पदाधिकारी सरकार द्वारा नियुक्त किया जा सकेगा जिसकी निम्न योग्यता होनी चाहिए

जो की स्थायी आदेशों के अधीन नियोजक (Employer)के द्वारा पारित आदेश का औचित्य या वैधता।

ऐसा कोई मामला जिसमें किसी श्रमिक (Workman) को कार्यमुक्त (Discharge) किये जाने या फिर बर्खास्त किए जाने या (Dismissal), या पुनर्नियुक्ति (Reinstatment) अथवा अनुसूचित ढंग से बर्खास्तगी किये जाने वाले श्रमिकों की सहायता की स्वीकृति का मामला प्रश्नगत रहा हो।

अगर कही पर प्रथा से दी जाने वाली रियायत अथवा विशेषाधिकार की वापसी का प्रश्न आता है ।

प्रथा से दी जाने वाली यदि कोई रियायत है अथवा विशेषाधिकार की वापसी का प्रश्न यदि कोई है ।

हड़ताल अथवा तालाबन्दी (Strike or Lockout) की वैधता अया फिर अवैधता के प्रश्न का निर्धारण।करना है तो

या फिर ऐसे सभी मामले जो की औद्योगिक न्यायाधिकरण के भीतर न हों।

(Duties of Labour Courts)—लेबर कोर्ट के कर्तव्य

इसमे  औद्योगिक विवाद को निपटाने के लिए श्रम न्यायालयों का प्रमुख कर्त्तव्य यह है कि वह द्वितीय अनुसूची में जो भी दिये गये है ऐसे किसी मामले में सम्बन्धित औद्योगिक विवादों पर निर्णय दें इसके अतिरिक्त वे सभी कार्य करें जो कि उसके सुपुर्द किये जाएँ।

जहाँ कोई औद्योगिक विवाद श्रम न्यायालय को निर्णयार्थ सौंपा गया हो ऐसे दशा मे उसे चाहिए कि वह शीघ्रातिशीघ्र कार्यवाही करे । और उसकी समाप्ति के पश्चात् अपना पंचाट (Award) सम्बन्धित सरकार को प्रस्तुत करे।

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औद्योगिक न्यायाधिकरण :

औद्योगिक न्यायाधिकरण की नियुक्ति समुचित सरकार जो की सरकारी गजट में अधिसूचना द्वारा जारी किया जाता है ।

न्यायाधिकरण की नियुक्ति किसी विशेष विवाद के लिए या फिर पूरे उद्योग के लिए की जा सकती है। न्यायाधिकरण केवल एक व्यक्ति से मिलकर गठित होता है जो कि समुचित सरकार के द्वारा नियुक्त किया जायेगा। इस प्रकार की नियुक्ति के लिए निम्नलिखित योग्यताओं का होना आवश्यक है—

(i) वह व्यक्ति उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रह चुका हो, या फिर

(ii) वह कम—से—कम 3 वर्ष तक जनपद न्यायाधीश या अतिरिक्त जनपद न्यायाधीश रहा हो।

जब किसी औद्योगिक विवाद के निपटारे के लिए किसी प्रतिष्ठान के द्वारा समिति की नियुक्त की जाये और वह समिति कई श्रेणियों के कर्मचारियों के लिए बनाई जाए जिनके पदों की प्रकृति करीब—करीब एक समान हो, और वह संस्तुति दे परन्तु औद्योगिक न्यायाधिकरण केवल कुछ श्रेणियों के कर्मचारियों के बारे में विचार करके और कुछ छोड़कर अपना पंचाट (award) दे तो ऐसा पंचाट अवैध होगा।

औद्योगिक न्यायाधिकरण की शक्तियाँ—

जब तक कि यह बातें प्रदर्शित न कर दी जाएँ, कि औद्योगिक न्यायाधिकरण व्यवस्थापकों के कार्य में जिससे कि उन्होंने किसी कर्मचारी को उसके दुराचरण के कारण जाँच के पश्चात् नौकरी से अलग कर दिया हो उसमे किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं कर सकता है।

(1) कि कोई व्यवस्थापकगण ने सद्भावना से कार्य नहीं किया है। , या

(2) जो बर्खास्त श्रमिकों को परेशान करने अथवा अन्यायपूर्ण व्यवहार से कोई कार्य किया गया है; या

(3) व्यवस्थापक ने किसी भी प्रकार से प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) के सिद्धान्तों का उल्लंघन किया है या उन्होंने कोई त्रुटि की है,

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(4) या फिर विषयवस्तु के आधार पर जाँच परिणाम पूर्णयता निराधार माना है।

कार्यसमिति [धारा—3]के अनुसार

इसमे समिति के गठन का उद्देश्य नियोजक और कर्मकारों के मध्य पारस्परिक हित को बढ़ावा देना होता है और बिना किसी भी दबाव के सौहार्द्रपूर्ण वातावण में आपसी हितों और विवादों के सम्बन्ध में विचार—विमर्श करके समस्याओं का हल निकालना है।

कैम्प एण्ड कम्पनी लि. बनाम उसके कर्मकार में उच्चतम न्यायालय ने यह विनिश्चित किया है कि इसके गठन का प्रयोजन कर्मकारों का हित मे होना चाहिए और यह संरक्षण है।

कार्यसमिति का यह मुख्य दायित्व है कि वह कर्मकारों की दिनप्रतिदिन की होने वाली शिकायतों एवं मतभेदों का निवारण करे तथा दोनों पक्षों में समझौता वार्ता कराने के लिए उचित कार्यवाही करे ।

कार्यसमिति का उद्देश्य किसी व्यवसाय संघ के सामूहिक सौदेबाजी के क्षेत्र में हस्तक्षेप करना नहीं है। बल्कि औद्योगिक विवाद को हल करने की दिशा में प्रथम सोपान है।

यह ब्रिटेन, रूस तथा संयुक्त राज्य अमेरिका की “Joint Production Committees” न्यूनाधिक कार्यसमिति के समान ही है।

यह निम्नलिखित मामलों पर विचार—विमर्श कर सकती है तथा निर्णय ले सकती है । इसकी सूची सन् 1959 में भारतीय श्री सम्मेलन में तैयार की गयी।

जैसे कि रोशनी, बिजली, तापक्रम, शौचालय और मूत्रालय की व्यवस्था संबन्धित ।

या फिर पेयजल, कैन्टीन, डाइनिंग रूम्स, विश्रामालय, मेडिकल और स्वास्थ्य सेवाएँ संबन्धित ।

वेलफेयर फण्ड का प्रशमन।

राष्ट्रीय त्योहार मे छुट्टियों का आबंटन संबन्धित ।

सुरक्षा और दुर्घटना की रोकथाम करना , तथा पेशागत बीमारियाँ और उनके बचने के उपाय।और निर्णय का क्रियान्वयन तथा पुनरावलोकन करना ।

सुरक्षा एवं दुर्घटना निवारण।

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शैक्षणिक एवं मनोरंजन सम्बन्धी कार्यकलाप करना जैसे—वाचनालय, चलचित्र, खेलकूद, पिकनिक, सामुदायिक योजनाएँ और उनका प्रवर्तन।

किसी भी प्रकार की फिजूलखर्ची को रोकना और बचत को बढ़ावा देना।

समिति की बैठक में लिये गये निर्णय पर पुनर्विचार एवं क्रियान्विति करना तथा अभिप्रेरण (incentive) योजनाएँ बनाना ।

निम्नलिखित बातों पर विचार करने का कार्यसमिति को क्षेत्राधिकार नहीं है (List of items which the works committee will not deal with)—

(1) बोनस और लाभ में आबंटन की योजना।

(2) मजदूरी एवं भत्ते।

(3) नवीनीकरण और कार्यभार से सम्बन्धित मामले।

(4) श्रमशक्ति की क्षमता के निर्धारण सम्बन्धी मामले।

(5) उन्नति और विकास के कार्यक्रम।

(6) प्रोत्साहन देने वाली योजनाएँ चलना ।

(7) छंटनी और काम पर लौटाये जाने वाले मामले।

(8) गृह, आवास और यातायात सेवाएँ प्रदान करना ।

(9) श्रमिकसंघ की कार्यवाहियों के लिए अनुचित उपाय का प्रयोग करना

(10) भविष्य—निधि, ग्रेच्युटी और सेवानिवृत्ति संबन्धित लाभ।

(11) अवकाश और राष्ट्रीय त्योहारों की संख्या मे कमी या बढ़ाना ।

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