मोटर यान अधिनियम के अनुसार दावा न्यायाधिकरण Claim tribunal under motor vehicle act

मोटर यान अधिनियम द्वारा मोटर यादों की दुर्घटना के शिकार व्यक्तियों को सस्ता और तुरंत उपचार प्रदान करने के लिए एक नए अधिकरण अर्थात मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण का गठन किया गया है।

क्योंकि इसके पूर्व प्रति कर संबंधी वाद सामान्यता दीवानी न्यायालय में दाखिल किया जाता था जो कि एक लंबी अवधि के लिए प्रक्रिया के पूर्ण होने का इंतजार करना पड़ता था और बात के मूल्य अनुसार कोर्ट फीस देनी होती थी इस अधिकरण में बाद यानी कि दावा के मूल्य अनुसार कोर्ट फीस नहीं देनी पड़ती है तथा संचित प्रक्रिया का अनुसरण के अनुसार दावा कर सकते हैं।

इसमें धारा 165 के अनुसार दवा न्यायालय का गठन प्राप्त करके ऐसे दावों पर न्याय निर्णय के प्रयोजन के लिए किया गया है।

 जो कि किसी भी ऐसी दुर्घटना से संबंधित है जो की मोटर यादों के प्रयोग से हुए हैं।

या फिर जिसमें किसी भी एक्सीडेंट की वजह से किसी भी व्यक्ति की मृत्यु हो गई हो अथवा उसकी शारीरिक क्षति पहुंची हो।

या फिर किसी भी दुर्घटना के कारण किसी व्यक्ति की मृत्यु हो गई हो अथवा शारीरिक क्षति पहुंची हो या इस प्रकार की घटना या दुर्घटना हुई हो जिससे किसी तृतीय प्रकार की संपत्ति को नुकसान हुआ हो या फिर इसमें से कुछ भी हुआ हो तो ऐसी स्थिति में

दावा अधिकरण का गठन इतने समस्या से होगा जितना कि राज्य सरकार उचित समझें तथा एक अध्यक्ष होते हैं और कोई सदस्य को निर्धारण करना होता है।

उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो।

या फिर वह किसी जिले का जिला न्यायाधीश हो या फिर पहले रह चुका हो।

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या फिर वह उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या फिर जिला न्यायाधीश के पद पर नियुक्त की अहर्ता रखता हो।

दावा न्यायाधिकरण को प्रतिकार का दावा ग्रहण करने का क्षेत्राधिकार प्राप्त होता है जब कोई दुर्घटना मोटरयान के प्रयोग से हुआ हो।

कोई भी व्यक्ति जो कि दुर्घटना का शिकार हुआ है वह निम्न प्रक्रिया के द्वारा प्रति कर के लिए आवेदन कर सकता है।

मोटर यान अधिनियम 1988 की धारा 166 के अनुसार दुर्घटना से उद्धृत कर के लिए आवेदन निम्न प्रकार से किया जा सकता है।

उस व्यक्ति का नाम जिसके द्वारा क्षति हुई हो जिस संपत्ति से क्षति हुई हो उस मोटर वाहन के स्वामी का नाम तथा जब दुर्घटना हुई हो उसके परिणाम स्वरूप यदि मृत्यु हुई है तो मृतक के सभी या फिर किसी विधिक प्रतिनिधि का नाम या फिर जिस व्यक्ति को क्षति हुई है उसके द्वारा समय से प्राधिकृत किसी अभिकर्ता द्वारा अथवा मृतक के सभी या किसी विधिक प्रतिनिधि के द्वारा प्रतिकार के लिए आप प्रत्येक आवेदन उस दावा न्यायाधिकरण को किया जाएगा जिसका उस क्षेत्र पर अधिकारिता है जिसमें कि दुर्घटना हुई हो तथा प्रतिकार के लिए आवेदन तभी ग्रहण किया जाएगा जब दुर्घटना होने के 6 माह के अंदर के लिए आवेदन किया गया हो यदि समय सीमा 6 माह से अधिक हो जाती है तो आवेदन ग्रहण नहीं किया जा सकता है परंतु अधिकरण के द्वारा 6 मार्च की संपत्ति के पश्चात भी आवेदन ग्रहण किया जा सकता है यदि उसका समाधान हो जाता है कि क्या कारण था जिसकी वजह से आवेदन नहीं दिया गया है पर्याप्त कारणों से व्यक्ति को आवेदन समय विधि में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहा है तो उसका उचित कारण होना आवश्यक है।

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मोटर यान अधिनियम 1988 की धारा 168 के अनुसार

धारा 166 के अधीन किए गए प्रतिकार के लिए आवेदन की प्राप्ति पर दावा अधिकरण बीमा करता को आवेदन की सूचना प्रदान करेगा तथा सभी पक्षकारों को सुनवाई के लिए अवसर देने के पश्चात दावे पर जांच का कार्य संपादित करेगा।।

धारा 142 के तहत स्थाई निर्योग्यता में निम्नलिखित चोटों का उल्लेख किया गया है।

नेत्र दृष्टि या फिर किसी एक आंख या कान के स्मरण शक्ति या स्थाई विच्छेद या शरीर के किसी जोड़ का विच्छेद हुआ हो।

किसी अंग का विनाश या फिर उसकी क्षमता में स्थाई कमी आई हो।

सिर चेहरे का स्थाई विदूषक यदि हुआ है

यदि कोई व्यक्ति जिस की आय का निश्चित जानकारी ना हो अर्थात मजदूर हो तो उसके प्रतिकार का निर्धारण करने के लिए जितना उसको मासिक वेतन मिलता था यह सरकार को निश्चित आमदनी के आधार पर आयकर अदा करता है परंतु जहां पर मृतक कोई मजदूर हो तो इस अधिनियम में व्यवस्था की गई है कि ऐसे मृतक व्यक्ति के लिए कम से कम ₹15000 आर्थिक आय मान ली जाती है और उसका एक तिहाई स्वयं पर खर्च को मानते हुए उसको 45 वर्ष की आयु में मृत्यु होती है तो उसको ₹137000 दिया जाएगा।

 मोटर दुर्घटना में यदि चोट आई है तो प्रतिकार का निर्धारण

मोटर दुर्घटना में यदि चोट आई है तो धारा 140 सबसेक्शन 2 के अंतर्गत जिस व्यक्ति को चोट आई है या चोट के कारण स्थाई निर्योग्यता है तो उसके कारण उसे ₹25000 की धनराशि उपलब्ध कराई जाएगी इसके अतिरिक्त आहत व्यक्ति को जीवन काल में जो विशेष नुकसान होता है उसको भी उपलब्ध कराया जाता है जो उसकी दवाई पर खर्च होता है या फिर उसको मानसिक कष्ट होता है इसके लिए भी वे नुकसान की भरपाई कराई जाती है यदि वह छुट्टी पर रहता है तो उसके छुट्टी पर रहने से जितना उसके वेतन में नुकसान हुआ है वह उसकी भी छाती पूर्ति प्रति कर के रूप में उपलब्ध कराई जाती है।

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