सम्मति क्या होती है। स्वतंत्र सम्मति की परिभाषा क्या हैं। स्वतंत्र सम्मति के बिना किया गया करार शून्य होगा।

consent contract law

सम्मति से आशय दो या दो से अधिक लोगो का एक ही चीज को लेकर दिये गये सहमति से हैं। जिसमे सभी के कथन का अर्थ एक ही हो। अर्थात वो सब वही समझ रहे हो जो कहा गया हो और उसपर सबकी सहमति हो। भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 13 मे इसका विवरण दिया गया है। स्वतंत्र सहमति को धारा 14 मे बताया गया है। इसके अनुसार कोई सहमति तब स्वतंत्र मानी जायेगी जब वह इन नियमो का पालन करती हो। जब सहमति धारा 15 के अनुसार प्रपीडन के द्वारा न दी गयी हो। और न ही धारा 16 के अनुसार जबरजस्ती से ली गयी सहमति के अधीन हो। और न वह धारा 18 के अनुसार कपट द्वारा रचित सहमति से हो । और न ही वह धारा 19 के अनुसार दुर्यपदेशन द्वारा संचालित किया गया हो। और ना ही भूल द्वारा की गयी सहमति हो।

लेकिन यह धारा 19,धारा 20 और धारा 21 के अंतर्गत आने वाले सभी उपबंधो के अंदर मे हो यानि कि उसको फॉलो करती हो। यहाँ पर प्रपीडन का मतलब किसी को धमकी देकर कार्य करना है या फिर उसकी संपत्ति को अपने अधिकार मे लेकर उसको कार्य करने या न करने के लिए बाध्य करना हैं। यह विधि द्वारा अमान्य हैं विधि इसका समर्थन नही करती हैं। यह दंडनीय है। धारा 16 के अनुसार जबरजस्ती या दबाव मे लिया गया निर्णय आता है। अर्थात् जब हमे पता चलता है कि यह निर्णय किसी के अधीन होकर या दबाव मे लिया गया हैं तो वह मान्य नहीं होता है। इसमे कोई व्यक्ति संबंधित व्यक्ति से बहुत घनिस्ट होता हैं वह मना कर दूसरे को आहत नही करना चाहते हैं। या फिर उसका संबंध ऐसा हो की इस करार का प्रभाव उसके जीवन पर पडे तो वह मना नही कर सकता और दाबाव मे आकर यह संविदा करता है।

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कपट से आशय एक ऐसा वचन जिसका उदेश्य केवल संविदा करना हैं तथा वह वचन को पूरा नही करने की मंशा रखता हैं। या कोई ऐसा कार्य करना जिसको विधि द्वारा कपट पूर्ण आचरण बोला गया हो। दुर्यपदेशन का मतलब यहा पर किसी बात को लेकर उकसाने से हैं। या फिर किसी व्यक्ति के खिलाफ सडयंत्र करने से हैं। या संविदा करने पर उस कार्य को लेकर संशय हो। या फिर कोई भूल द्वारा गलत संविदा कर ली गयी हो।

स्वतंत्र सम्मति के बिना किया गया करार शून्य होगा इस बात को स्पस्ट करने के लिए निम्न तथ्यो को देखना होगा। कोई भी करार तब शून्य हो जायेगा जब वह जबरजस्ती किया या कराया गया हो। या फिर झूठ बोलकर या कपट पूर्ण तरीके से किया गया हो। इस पर जिसने अपनी सहमति दी हैं वह शून्य माना जायेगा। और वह व्यक्ति जिसके साथ ऐसा किया गया हैं यदि वह चाहता हैं तो संविदा को लागू कर सकता हैं और इसको इंफोर्स करा सकता हैं। इसके कुछ अपवाद भी हैं। इसको देखते हैं।

यदि कोई व्यक्ति सहमति को मौन तरीके से या कपट पूर्ण ढंग से देता हैं तो दूसरा पछकार के पास यह विकल्प मौजूद हैं की वह इसका पता लगा सके तो यह संविदा करता हैं तो यह शून्य नही माना जायेगा। इसका दूसरा उदाहरण ये हैं की यदि कोई व्यक्ति मिथ्या या कपट पूर्ण ढंग से किसी को फ़साता हैं और दूसरा व्यक्ति इसकी सहमति नही देता हैं जिसके साथ कपट किया गया हैं तो यह शून्य नही माना जायेगा। यदि व्यक्ति अपने साथहुए धोखा, कपट आदि पर आपत्ति जताता हैं और उसको शून्य मानने पर विवश करता हैं तभी यह शून्य माना जायेगा अन्यथा यह शून्य नही होगा। नियम और कानून सबके लिए समान हैं कानून कहता हैं हमेशा अपनी आँखे खुली रखो अर्थात हमारे आस पास जो भी हो रहा उसपर नजर रखो कोई आपको बेवकुफ न बना सके। जब भी आप संबिदा करो अपने आप से चीजो को जाँच परख लो क्योकि उसके बाद किसी कि कोई गारंटी नही होती हैं।

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कानून भी हर समय आपकी रक्षा नही कर सकता हैं। संविदा करते समय मौन को अपनी स्वीक्रती न दे। संविदा करते समय कोई भी तथ्य छुपाया नही जा सकता हैं जैसे किसी को कुछ दिन से बुखार आ रहा था उसने बीमा कराते समय इसको नॉर्मल समझ कर इसका जिक्र नही किया और दवा खाने से कुछ दिन के लिए यह ठीक हो गया था बीमा अधिकारियों को इसकी जानकारी नही थी कुछ दिन बाद उसकी मृत्यु हो गयी। बीमा अधिकारियों ने अपनी investigation मे पाया की उसकी मृत्यु बुखार से हुई और बीमा कंपनी ने बीमा राशि देने से मना कर दिया क्योकि उस समय तथ्य छुपाया गया था।

इसका एक और उदाहरण यह है कि आ के पास एक दुकान थी जिसकी कीमत करीब 5 लाख थी परंतु ब ने उसको कपट पूर्ण तरीके से 1 लाख मे खरीद लीया आ अगर चाहे तो करार शून्य कर सकता हैं। ब जो की क का दोस्त हैं उसको ज्ञात होता है कि ब के पास एक अच्छी नस्ल की गाय हैं जो की ब द्वारा बेची जा रही हैं क ने गाय खरीदने के लिए ब से कहा ब ने कपट पूर्ण तरीके से बिना बताये की गाय बीमार हैं क को बेंच दिया अब क के पास यह अधिकार हैं की वह गाय को ब को वापस कर पैसे ले ले।

एक और उदाहरण संपत्ति के रूप मे ज ,ह का उत्तराधिकारी हैं और ह की मृत्यु हो जाती हैं म , ज को वहा नही जाने देता हैं और उसको संपत्ति को बेचने का दबाव डालता हैं जिससे ज अपनी संपत्ति ह को बेंच देता हैं यह करार शून्य हैं।
वही भूल का एक उदाहरण यह हैं कि भूल दोनो पछकार या दोनो मे से किसी एक पछकार से हो सकती हैं। उदाहरण के लिए दुकान पर कुछ सामान लिया पैसे देना भूल गए और सामान ले कर वापस आ गए या फिर सामान भूल गए और पैसे दे दिया तो भूल को पैसे देकर या सामान ले कर सुधारा जा सकता हैं इसमे किसी का दोष नही होता हैं और न ही यह शुन्य माना जायेगा।

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