समाश्रित संविदा क्या होता है। संविदा अधिनियम धारा 32 से 40 तक का अध्ययन

Law of contract section 32 to 40 & contingent contract- Hindi Law Notes

समाश्रित संविदा-

संविदा अधिनियम के अंतर्गत पक्ष कार के अधिकार संविदा के तुरंत बाद ही सुरू हो जाते है। परंतु कुछ दशा मे यह उल्टा भी होता है। कभी कभी पक्ष कार अपने अधिकार का प्रयोग कुछ विशेष परिस्थिति मे कोई घटना के घटने और नही घटने पर करते है। जब भविष्य मे कोई घटना घटने और नही घटने पर किसी अधिकार मे परिवर्तन होता है तो वह समाश्रित संविदा कहा जाता है।

उदाहरण

क ने खा से यह संविदा किया कि यदि तुम्हारा घर जल जाएगा तो हम तुम को 5000 रुपये देंगे। यह समाश्रित संविदा है।

भारतीय संविदा अधिनियम की धारा 31 मे समाश्रित संविदा को बताया गया है। 

इसकी परिभाषा को इस प्रकार बताया गया है कि समाश्रित संविदा वह संविदा होती है जो कि ऐसी संविदा के संपार्श्विक किसी घटना के घटित होने या न होने या किसी कार्य को करने या न करने को बताया गया है। 

भूमि बीमा, संपत्ति बीमा आदि इसके उदाहरण है। 

समाश्रित संविदा के आवश्यक तत्व

समाश्रित संविदा के आवश्यक तत्व इस प्रकार है। 

इसमे किसी कार्य को करने या नही करने से संबंध होता है। 

इसमे किसी घटना के घटित होने या न होने पर निर्भर होता है। 

यह घटना संपार्श्विक होता है। 

संविदा के पालन करने के नियम 

संविदा अनिश्चित काल के घटना पर निर्भर हो। –

यह धारा 32 मे बताया गया है। इसमे पक्ष कार संविदा किसी कार्य को करने या नही करने के लिए करते है। इसमे दोनो पक्ष कार के मध्य भविष्य मे होने वाली अनिश्चित काल की घटना को लेकर संविदा की जाती है। यह घटना भविष्य मे हो भी सकती है और नही भी यदि यह घटना होगी तो वह कार्य को करेगा या नही करेगा। 

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उदाहरण

स ने आ के साथ संविदा किया की यदि ज मर जायेगा तो वह आ की गाड़ी खरीद लेगा। इसमे ज के मरने की घटना घटित होने के बाद संविदा पूरी की जायेगी। 

संविदा अनिश्चित कालीन घटना के ना घटित होने पर निर्भर है। –

इसके अनुसार समाश्रित संविदा की घटना तब पूरी कराई जा सकती है जब वह घटना घटित न हो। जैसे व ने ज से यह संविदा की कि यदि बारिश नही हुई तो वह गेहूँ खरीद लेगा। 

यह अनिश्चित काल पर निर्भर हैं। और जब बारिश नही होगी तब ही ज का गेहूँ खरीदा जायेगा। 

समाश्रित संविदा किसी व्यक्ति के आचरण पर भी निर्भर करता है। 

 यह धारा 34 मे बताया गया है।इसके अनुसार कोई व्यक्ति किसी निश्चित समय मे कोई आचरण करेगा यदि वह निश्चित समय मे वह आचरण नही करता है तो यह करार शून्य हो जायेगा। 

उदाहरण

यदि स ने ग को कहा यदि वह ज से विवाह करता है तो वह उसको 5 लाख रुपये देगा। परंतु वह के से विवाह कर लेता है। अब ग का ज से विवाह करना असंभव है अतः अब यह करार शून्य हो जायेगा। 

यह एक निश्चित समय पर होने वाली घटना पर आधारित है। 

इस संविदा मे अनिश्चित काल के घटना का समय निश्चित होता है। 

और जब निश्चित समय तय कर दिया गया हो तब उस संविदा को प्रवर्तनीय कराया जा सकता है। 

 उदाहरण

क ने खा से संविदा किया कि यदि तुम्हारा पोत 1 साल मे वापस आ जायेगा तो मै तुमको 5 लाख रुपये दूंगा। यदि पोत 1 साल मे वापस आ जाता है तभी संविदा को प्रवर्तनीय कराया जा सकता है। यदि वह वापस नही आती है तो करार शून्य होगा। 

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असंभव घटनाओ पर समाश्रित संविदा शून्य है। 

यदि किसी संबिदा को करते समय ही यह ज्ञात हो जाये की उसका होना असंभव है तो ऐसे घटनाओ पर संविदा नही होगा या उसका करार शून्य होगा। 

धारा 37 

इस अनुसार संविदा का पालन कैसे करेंगे बताया गया है। इसके अनुसार संविदा के सभी पक्षकारो  को अधिनियम के अनुसार अपनी प्रतिज्ञा का पालन करना चाहिए। जबतक कि वह संविदा किसी अधिनियम द्वारा या किसी अन्य विधि द्वारा माफी योग्य नही कर दी गयी हो तब तक या तो उसका पालन करना चाहिए या फिर उसकी पेशकश करनी चाहिए। 

धारा 38

भारतीय संविदा अधिनियम धारा 38 के अनुसार इसमे पक्षकारो के दायित्व को बताती है। जब एक पक्ष कार जो विधि द्वारा किसी कार्य को करने के लिए बाध्य होता है और वह किसी कार्य को नही करता है तो दूसरा पक्ष कार भी उससे संबन्धित दायित्व से मुक्त हो जाता है। संविदा उसको दायित्व मुक्त बना देती है। और उसको दायित्व मुक्त करने पर जो हानि हुई है उसका हर्जाना दायित्व न करने वाले व्यक्ति से ले सकता है।

धारा 39

जब एक पक्ष कार संविदा का पालन करने मे असमर्थ हो जाता है।

जब एक पक्ष कार संविदा का पालन करने मे असमर्थ हो जाता है तो दूसरा पक्ष कार उस संविदा को खत्म कर सकता है। यदि एक पक्षकार किसी कारण वश या जानबूझकर संविदा को पूरा करने मे अपनी असमर्थता जताता है जो दूसरा पक्षकार संविदा को खत्म कर सकता है परंतु यदि पक्षकार अपने हाव भाव से या कार्य के द्वारा कार्य करने का वचन देता है तो संविदा खत्म नही की जा सकती है।

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उदाहरण

एक राम नाम का  गीतकार थिएटर के मैनेजर से 12 महीने की अवधि में सप्ताह में दो दिन  को उसके थिएटर में गाने की संविदा करता है।  तथा उसे प्रति दिन का  ₹100 देने का वचन दिया जाता है छठे दिन राम  जानबूझकर थिएटर में अनुपस्थिति रहता है।

अब यहां पर राम से संविदा करने वाला थिएटर का मैनेजर संविदा को समाप्त कर सकता है।  पर यदि गाने वाला सतवे दिन को राम  आता है तो उसे गाना गाने दिया जाता है।  ऐसी परिस्थिति में संविदा समाप्त नहीं होती यदि संविदा को समाप्त करना है उस सतवे दिन को राम को गाने से रोकना होगा। छठे दिन की क्षति पूर्ति थिएटर का मैनेजर राम से प्राप्त करने का अधिकारी होगा।



धारा 40

धारा 40 मे यह बताया गया है कि संविदा का पालन कौन करेगा। इसमे यह बताया गया है कि यदि संविदा मे यह लिखा गया है कि कुछ बचन का पालन केवल वचन दाता ही करेगा।

यदि किसी संविदा के लिए यह जरूरी है की संविदा का पालन वचन के अनुसार वचन दाता को ही करना होगा तो उसके लिए प्रतिनिधि की आवश्यकता नही है फिर वह कार्य वचन दाता को ही करना पड़ेगा। यदि ऐसा नही होता तो प्रतिनिधि और वचन दाता किसी ऐसे सक्षम व्यक्ति को नियोजित करेंगे जो वह कार्य कर सकेगा।

उदाहरण-

य ने क से उसकी फोटो को हाथ से एक निश्चित समय मे बना कर देने की वचन देता है अब यह कार्य कोई और नही कर सकता इसलिए यह कार्य य को ही करना पड़ेगा।

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