भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 101 से 103 तक का वर्णन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे हमने भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 100  तक का वर्णन किया था अगर आप इन धाराओं का अध्ययन कर चुके है। तो यह आप के लिए लाभकारी होगा । यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने मे आसानी होगी।

अनुच्छेद 101 –

इस अनुच्छेद मे स्थानों का रिक्त होना बताया गया है ।

(1)इसके अनुसार  कोई व्यक्ति संसद के दोनों सदनों का सदस्य नहीं होता है। और जो व्यक्ति दोनों सदनों का सदस्य चुन  भी लिया जाता है उसके एक या दूसरे सदन के स्थान को रिक्त करने के लिए संसद विधि द्वारा उपबंध करेगी।

(2) कोई व्यक्ति संसद और किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन में दोनों का सदस्य नहीं हो सकता है। और यदि कोई व्यक्ति संसद और किसी राज्य के विधानमंडल के किसी सदन में  दोनों का सदस्य चुन भी  लिया जाता है । तो ऐसी अवधि की समाप्ति के पश्चात जो राष्ट्रपति द्वारा बनाए गए नियमों में विनिर्दिष्ट की जाए ऐसे मे  संसद में ऐसे व्यक्ति का स्थान रिक्त हो जाएगा यदि उसने राज्य के विधान-मंडल में अपने स्थान को पहले ही नहीं त्याग दिया है।

(3) यदि संसद के किसी सदन का सदस्य जो कि
(क) अनुच्छेद 102 के खंड (1) या खंड(2) में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो जाता है।  या फिर
(ख) सभापति या अध्यक्ष को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपने स्थान का त्याग कर देता है।  और उसका त्यागपत्र सभापति या अध्यक्ष के  द्वारा स्वीकार कर लिया जाता है।  तो ऐसी स्थिति में उसका स्थान रिक्त हो जाएगा ।

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परन्तु उपखंड (ख) में निर्दिष्ट त्यागपत्र की दशा में यदि  जो जानकारी प्राप्त हुई है। अन्यथा और ऐसी जांच करने के पश्चात जो वह ठीक समझे उस अनुसार  यथास्थिति, सभापति या अध्यक्ष का यह समाधान हो जाता है । कि ऐसा त्यागपत्र स्वैच्छिक या असली नहीं है तो वह ऐसे त्यागपत्र को स्वीकार नहीं करेगा।

(4) यदि संसद के किसी सदन का कोई सदस्य साठ दिन की अवधि तक सदन की अनुज्ञा के बिना उसके सभी अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है।  तो सदन उसके स्थान को रिक्त घोषित कर सकेगा ।
परन्तु साठ दिन की उक्त अवधि की संगणना करने में किसी ऐसी अवधि को हिसाब में नहीं लिया जाएगा जिसके दौरान सदन सत्रावसान या निरंतर चार से अधिक दिनों के लिए स्थगित रहता है।

इसमे निम्न संशोधन किए गए –

संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम 1956 की धारा 29 के अनुसार अनुसूची द्वारा ”पहली अनुसूची के भाग का भाग ख में विनिर्दिष्ट” शब्द और अक्षरों का लोप किया गया।

संविधान (सातवाँ संशोधन) अधिनियम 1956 की धारा 29 के अनुसार  अनुसूची द्वारा ”ऐसे किसी राज्य” के स्थान पर प्रतिस्थापित।

इसमे  विधि मंत्रालय की अधिसूचना संख्या एफ.46/ 50-सी, तारीख 26 जनवरी, 1950, भारत का राजपत्र, असाधारण, पृष्ठ 678 में प्रकाशित समसामयिक सदस्यता प्रतिषेध नियम, 1950।

संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम 1985 की धारा 2 के अनुसार  (1-3-1985 से) ”अनुच्छेद 102 के खंड (1)” के स्थान पर प्रतिस्थापित।

संविधान (तैंतीस वाँ संशोधन) अधिनियम 1974 की धारा 2 के अनुसार उपखंड (ख) के स्थान पर प्रतिस्थापित।

 संविधान (तैंतीस वाँ संशोधन) अधिनियम 1974 की धारा 2 के अनुसार अंतःस्थापित।

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अनुच्छेद 102 –

इस अनुच्छेद मे सदस्यता के लिए निरर्हताएं को बताया गया है।

(1) इसके अनुसार  कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निम्न रूप से  निरर्हित होगा
(क) यदि वह भारत सरकार के या किसी  भी राज्य की सरकार के अधीन किसी ऐसे पद को छोड़कर जिसको धारण करने वाले का निरर्हित न होना संसद ने विधि द्वारा घोषित किया है। तो  कोई लाभ का पद धारण करता है।
(ख) यदि वह विकृत चित्त है । और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा उसमे  विद्यमान है।
(ग) यदि वह अनुन्मोचित दिवालिया है।
(घ) यदि वह भारत का नागरिक नहीं है।  या उसने किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित
कर ली है या वह किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा या अनुषक्ती को अभिस्वीकार किए हुए है।
(ङ) यदि वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या संसद  के  अधीन इस प्रकार निरर्हित कर दिया जाता है।

स्पष्टीकरण-

(1) इस खंड के प्रयोजनों के लिए, कोई व्यक्ति केवल उस कारण भारत सरकार के या फिर  किसी  अन्य राज्य की सरकार के अधीन लाभ का पद धारण करने वाला नहीं समझा जाएगा कि वह संघ का या ऐसे राज्य का मंत्री है।

(2) कोई व्यक्ति संसद के किसी सदन का सदस्य होने के लिए निरर्हता होगा । यदि वह दसवीं अनुसूची के अधीन इस प्रकार निरर्हित हो जाता है।

इसमे निम्न संशोधन किया गया ।
संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम 1985 की धारा 3 द्वारा (1-3-1985 से) ”(2);स
अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए” के स्थान पर प्रतिस्थापित।

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संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम 1985 की धारा 3 द्वारा (1-3-1985 से) अंतःस्थापित।

अनुच्छेद 103-

इस अनुच्छेद में सदस्यों की निरर्हताओं से संबंधित प्रश्नों पर विनिश्चय को बताया गया है।

(1) संसद के किसी सदन का कोई सदस्य अनुच्छेद 102 के खंड (1) में वर्णित किसी निरर्हता से ग्रस्त हो गया है।  या नहीं हुआ है तो यह प्रश्न पूछा जा सकता है। और वह प्रश्न राष्ट्रपति को विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा और इसका विनिश्चय अंतिम होगा।
(2) ऐसे किसी प्रश्न पर विनिश्चय करने के पहले राष्ट्रपति निर्वाचन आयोग की राय लेगा और ऐसी राय के अनुसार ही  कार्य करेगा।

इसमे निम्न संशोधन हुआ ।
संविधान (बयालीसवाँ संशोधन) अधिनियम 1976 की धारा 20 द्वारा (3-1-1977 से) और तत्पश्चात्‌ संविधान (चवालीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1978 की धारा 14 द्वारा (20-6-1979 से) संशोधित होकर  इस प्रकार हुआ।

यदि आपको इन को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है। तो कृपया हमें कमेंट बॉक्स में जाकर अपने सुझाव दे सकते है।

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2 thoughts on “भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 101 से 103 तक का वर्णन”

  1. भाषा का विवरण सही नहीं है, या कुछ छोड़ दिया गया है, जिससे समझने में परेशानी आ रही है।

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    • यहाँ शुद्ध हिंदी का प्रयोग किया गया है। पढ़ते समय अंग्रेजी मे मूल Bare Act का भी प्रयोग करें। आसानी होगी।

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