भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 94 से 100 तक का वर्णन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे हमने भारतीय संविधान के अनुसार अनुच्छेद 93  तक का वर्णन किया था अगर आप इन धाराओ का अध्ययन कर चुके है। तो यह आप के लिए लाभकारी होगा । यदि आपने यह धाराये नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराये समझने मे आसानी होगी।

अनुच्छेद 94-

इस अनुच्छेद मे अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का पद रिक्त होना तथा  पद त्याग और पद से हटाया जाना बताया गया है।

लोकसभा के अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में पद धारण करने वाला सदस्य –

(क) यदि लोकसभा का सदस्य नहीं रहता है।  तो इस स्थित मे वह  अपना पद रिक्त कर देगा;

(ख) किसी भी समय यदि वह सदस्य अध्यक्ष है तो उपाध्यक्ष को संबोधित और यदि वह सदस्य उपाध्यक्ष है । तो अध्यक्ष को संबोधित कर सकता है तथा अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा; और

(ग) लोकसभा के तत्कालीन समस्त सदस्यों के बहुमत से पारित संकल्प द्वारा अपने पद से हटाया जा सकेगा :

परन्तु खंड (ग) के प्रयोजन के लिए कोई संकल्प तब तक प्रस्तावित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस संकल्प को प्रस्तावित करने के लिए  कम से कम चौदह दिन की सूचना न दे दी गई हो:

परन्तु यह और कि जब कभी लोकसभा का विघटन किया जाता है।  तो विघटन के पश्चात्‌ होने वाले लोकसभा के प्रथम अधिवेशन के ठीक पहले तक अध्यक्ष अपने पद को रिक्त नहीं करेगा।

अनुच्छेद 95-

इस अनुच्छेद मे अध्यक्ष के पद के कर्तव्यों का पालन करने या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने की उपाध्यक्ष या अन्य व्यक्ति की शक्ति को बताया गया है।

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(1) जब अध्यक्ष का पद रिक्त रहता है।  तब उपाध्यक्ष या यदि उपाध्यक्ष का पद भी रिक्त है।  तो लोकसभा का कोई ऐसा सदस्य जिसको राष्ट्रपति इस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे उस पद के कर्तव्यों का पालन करेगा।

(2) लोकसभा की किसी बैठक के अध्यक्ष की अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष या यदि वह भी अनुपस्थित है।  तो ऐसा  कोई व्यक्ति जो लोकसभा की प्रक्रिया के नियमों द्वारा अवधारित किया जाए या यदि ऐसा कोई व्यक्ति उपस्थित नहीं है तो ऐसा अन्य व्यक्ति जो लोकसभा द्वारा अवधारित किया जाए वह अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा।

अनुच्छेद 96-

इस अनुच्छेद मे यह बताया गया है कि जब अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है तब उसका पीठासीन अधिकारी का न होना –

(1) इसके अनुसार लोक सभा की किसी बैठक में यदि  अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का संकल्प विचाराधीन है। तब ऐसे दशा मे अध्यक्ष या जब उपाध्यक्ष  को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प विचाराधीन है।  तब उपाध्यक्षवह पर  उपस्थित रहने पर भी वह  पीठासीन नहीं होगा और अनुच्छेद 95 के खंड (2) के उपबंध ऐसी प्रत्येक बैठक के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस बैठक के संबंध में लागू होते हैं । जिससेकि  यथास्थिति, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अनुपस्थित है ।

(2) जब अध्यक्ष को उसके पद से हटाने का कोई संकल्प लोक सभा में विचाराधीन है।  तब उसको लोक सभा में बोलने और उसकी कार्यवाहियों में अन्यथा भाग लेने का अधिकार होगा।  और वह अनुच्छेद 100 में किसी बात के होते हुए  भी उससे समबन्धित  ऐसे संकल्प पर  या ऐसी कार्यवाहियों के दौरान किसी अन्य विषयपर प्रथमतः ही मत देने का हकदार होगा।  किन्तु मत बराबर होने की दशा में मत देने का हकदार नहीं होगा ।

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अनुच्छेद 97-

इस अनुच्छेद मे सभापति और उपसभापति तथा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के वेतन और भत्ते के बारे मे बताया गया है।

इसके अनुसार   राज्य सभा के सभापति और उपसभापति को तथा लोकसभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष को ऐसे वेतन और भत्तों का जो संसदके  द्वारा  विधि द्वारा नियत किया जाता है। और जब तक इस निमित्त इस प्रकार उपबंध नहीं किया जाता है । तब तक ऐसे वेतन और भत्तों का जो दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं। उसका  संदाय किया जाएगा।

अनुच्छेद 98-

इस अनुच्छेद के अनुसार संसद का सचिवालय को  बताया गया है ।

(1) संसद के प्रत्येक सदन का पृथक् सचिवीय कर्मचारिवृंद होगा।

इसका यह अर्थ नही होगा कि वह संसद के दोनों सदनों के लिए सम्मिलित पदों के सृजन को निवारित करती है।

(2) संसदजो कि  विधि द्वारा, संसद के प्रत्येक सदन के सचिवीय कर्मचारिवृंद में भर्ती का और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन कर सकेगी।

(3) जब तक संसद खंड (2) के अधीन उपबंध नहीं करती है । तब तक राष्ट्रपतिउसकी  यथास्थिति के अनुसार लोकसभा अध्यक्ष या राज्य सभा के सभापति से परामर्श करने के पश्चात् लोकसभा के या राज्य सभा के सचिवीय कर्मचारिवृंद में भर्ती के और नियुक्त व्यक्तियों की सेवा की शर्तों के विनियमन के लिए नियम बना सकेगा और इस प्रकार बनाए गए नियम उक्त खंड के अधीन बनाई गई किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे।

अनुच्छेद 99-

इस अनुच्छेद को हटा दिया गया है।

अनुच्छेक 100 –

इस अनुच्छेद के अनुसार सदनों में मतदान, रिक्तियों के होते हुए भी सदनों की कार्य करने की शक्ति और गणपूर्ति को बताया गया है।

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 (1) इस संविधान के अनुसार उपबंधित के सिवाय, प्रत्येक सदन की बैठक में या सदनों की संयुक्त बैठक में सभी प्रश्नों का अवधारण, अध्यक्ष को अथवा सभापति या अध्यक्ष के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति को छोड़कर और उनकी उपस्थिति और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा।

सभापति या अध्यक्ष  अथवा उस रूप में कार्य करने वाला व्यक्ति प्रथमतः मत नहीं देगा।  किन्तु मत बराबर होने की दशा में उसका निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा।

(2) संसद के किसी सदन की सदस्यता में कोई रिक्ति होने पर भी उस सदन को कार्य करने की शक्ति  प्राप्त होगी।  और यदि बाद मे यह पता चलता है कि कोई व्यक्ति जो ऐसा करने का हकदार नहीं था। वह कार्यवाहियों में उपस्थित रहा है या उसने मत दिया है या अन्यथा भाग लिया है तो भी संसद की कोई कार्यवाही विधिमान्य होगी।

(3) जब तक संसद विधि द्वारा अन्यथा उपबंध न करे।  तब तक संसद के प्रत्येक सदन का अधिवेशन गठित करने के लिए गणपूर्ति सदन के सदस्यों की कुल संख्या का दसवां भाग होगी।

(4) यदि सदन के अधिवेशन में किसी समय गणपूर्ति नहीं है तो सभापति या अध्यक्ष अथवा उस रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति का यह कर्तव्य होगा कि वह सदन को स्थगित कर दे या अधिवेशन को तब तक के लिए निलंबित कर दे जब तक गणपूर्ति नहीं हो जाती है।

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