सिविल प्रक्रिया संहिता 126  से लेकर के 130 तक

CPC Section 126 to 130- Hindi Law notes

जैसा की आप सबको ज्ञात होगा कि इससे पहले की पोस्ट में हमने धारा 120 से लेकर के 125 तक बताया था अगर आपने धाराएं नहीं पड़ी है तो सबसे पहले आप इन धाराओं को पढ़ लीजिए जिससे की आगे की पोस्ट पढ़ने में आपको आसानी होगी!

धारा 126

इस धारा के अनुसार नियमों का अनुमोदन के अधीन होना बताया गया है !

जिसके अनुसार यदि पूर्व गामी ऊपर बंधु के अधीन बनाए गए नियम तथा उस राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन के जिसमें कि वह न्यायालय जिसकी प्रक्रिया का विनियमन विनियम करते हैं जो वहां पर स्थित है या फिर यदि वह न्यायालय किसी भी राज्य में स्थिति नहीं है तो वह केंद्र सरकार के पूर्व अनुमोदन के अधीन रहेंगे!

धारा 127

इस धारा में नियमों के प्रकाशन के बारे में बताया गया है इसके अनुसार जो भी नियम बनाए गए हैं या फिर अनुमोदित किए गए हैं ऐसे नियम राज्य पत्र में प्रकाशित किए जाएंगे तथा प्रकाशन की तारीख से या फिर किसी अन्य तारीख से जो भी निर्णय की जाए उच्च न्यायालय के अधिकार था कि स्थानीय सीमाओं के भीतर जिन्होंने उसे बनाया है वही बल और प्रभाव रखेंगे जैसे कि वे प्रथम अनुसूची में बताए गए हैं!

धारा 128

धारा के अनुसार ऐसे विषय जिनके लिए नियम उपबंध कर सकेंगे उनके बारे में बताया गया है जैसे कि किसी ऐसे नियम जो कि संहिता के पाठ में से किसी भी उपबंध के असंगत नहीं होंगे किंतु उनके अधीन रहते हुए सिविल नैनों की प्रक्रिया से संबंधित किसी भी विषय के लिए  उपबंध कर सकेंगे!

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किसी भी ऐसे भी रिश्ता या फिर उस धारा 1 के द्वारा जो भी शक्तियां प्रदान की गई है उसकी व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किसी ऐसे नियम जो कि निम्नलिखित सभी विषयों या फिर उनमें से किसी एक के लिए उपबंध कर सकेंगे जैसे कि सन्नो सूचनाओं और अन्य आदेश गांव की साधारण से आया फिर कि नहीं क्षेत्रों के द्वारा डाक के द्वारा या फिर किसी अन्य प्रकार के तामील और ऐसी  तामिल  का सबूत!

पशुधन और अन्य जंगम संपत्ति कुर्की के अधीन रहती है उसने समय उसका भरण पोषण और अभिरक्षा या फिर ऐसे भरण पोषण और अभी रक्षा के लिए फीस और ऐसे पशुधन संपत्ति का विक्रय और ऐसे विक्रय का आगम

 या फिर प्रति दावे के रूप में किए गए वादों में की गई प्रक्रिया और अधिकारिता के प्रयोजन के लिए ऐसे वादों का मूल्यांकन!

प्रति दावे के रूप में किए गए वादों में की गई प्रक्रिया और अधिकारिता के प्रयोजन के लिए ऐसे वादों का मूल्यांकन जहां पर प्रतिवादी किसी व्यक्ति के विरुद्ध चयवाद का प्रतिकार हो या फिर नहीं हो उसकी अभी दाएं या फिर क्षतिपूर्ति के लिए हकदार होने का दावा करें ऐसी प्रक्रिया उन दावों की संक्षिप्त प्रक्रिया होती है जिनमें की वादी किसी अभिव्यक्त या फिर विवक्षित संविदा से अथवा किसी अधिनियमित में जिसमें कि वह राशि जिसकी वसूली की गई हो या फिर धनराशि है जो कि अन्य कोई है अथवा किसी प्रत्याशी उसे उस दशा में जिसमें की मूल के विरुद्ध किसी या फिर निर्धारित की गई है अथवा किसी से प्राप्त किए गए या फिर पर निर्धारित मान जो कि प्रतिवादी के द्वारा धन के रूप में संदेह है उसको ब्याज सहित या फिर बिना ब्याज के वसूल करना चाहता है 

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अथवा जो भी रीड करता या अंताकार इन लाभों के लिए अदाओं के सहित या फिर बिना किसी स्थावर संपत्ति के युद्ध के लिए भूस्वामी के द्वारा ऐसे अभी धारी के विरुद्ध है जिसकी अवध की और शान हो गया है या फिर जिसकी अवधि का पर्यावरण खाली कर देने की सूचना द्वारा सम्यक रूप से कर दिया गया है या फिर जिसकी अवधि भटक के द्वारा संदाय के कारण संवहनीय हो गई है ऐसे किसी अधिकारी से वित्त पदाधिकारी के अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों के विरुद्ध है जिसमें की ओरिजनेटिंग समन के रूप में प्रक्रिया

वादों और अपीलो तथा अन्य कार्यवाही यों का समेकन तथा न्यायालय के किसी भी रजिस्ट्रार या फिर मास्टर या फिर अन्य कोई भी पदाधिकारी जो कि किन्हीं न्यायिक या फिर न्यायिक कल या फिर नए केसर कर्तव्यों का प्रयोजन करता है अथवा ऐसे सभी प्रारूप रजिस्टर पुस्तक प्रविष्टियां और लेख जोकि सिविल न्यायालय के कारागार के व्यवहार के लिए आवश्यक मानी गई हैं!

धारा 129

इस धारा के अनुसार अपनी आरंभिक सिविल प्रक्रिया के संबंध में नियम बनाने की उच्च न्यायालय की शक्ति को बताया गया है इस विधि के अनुसार किसी भी बात के होते हुए कोई ऐसा उच्च न्यायालय जो कि न्यायाधीश के अनुसार न्याय आयुक्त का न्यायालय नहीं है ऐसे नियम बना सकेगा जो इसकी स्थापना करने वाले लेटेस्ट पेटेंट आदेश या फिर अन्य विधि के अंतर्गत ना हो और जो वह अपनी आरंभिक सिविल अधिकारिता के प्रयोग में अपनी प्रक्रिया का विनियमन करने के लिए ठीक समझता हो इसके अनुसार अंतर्गत कोई भी बात किसी भी ऐसे नियम की विधि मान्यता पर प्रभाव नहीं डालेगी जो कि इस विधि के प्रारंभ के समय में प्रवर्त हुआ है 

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धारा 130

इस धारा के अनुसार प्रक्रिया के विभिन्न विषय के संबंध में नियम बनाने के उच्च न्यायालय की शक्ति को बताया गया है इसके अनुसार उच्च न्यायालय जो कि ऐसा उच्च न्यायालय नहीं है जिसको की धारा 129 के अंतर्गत उसमें लागू होती है इस प्रक्रिया से भिन्न किसी भी विषय के संबंध में कोई ऐसा नियम जो कि राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से बना सकेगा जिसे किसी भी राज्य का उच्च न्यायालय अपनी अधिकारिता के अधीन राज्य क्षेत्रों के किसी ऐसे भारत के लिए जो कि प्रेसिडेंसी नगर की सीमाओं के अंतर्गत नहीं आता है उसको संविधान के अनुच्छेद 127 के अधीन किसी ऐसे विषय पर बना सकेगा!

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