सिविल प्रक्रिया संहिता 131 से लेकर के 135 तक

जैसा की आप सबको ज्ञात होगा कि इससे पहले की पोस्ट में हमने धारा 126 से लेकर के 130 तक बताया था अगर आपने धाराएं नहीं पड़ी है तो सबसे पहले आप इन धाराओं को पढ़ लीजिए जिससे की आगे की 

धारा 131

  इस धारा के अनुसार नियमों के प्रकाशन के बारे में बताया गया है इसके अनुसार धारा 129 और धारा 130 के अनुसार बनाए गए जो भी नियम है !जो कि राज्य पत्र में प्रकाशित किए जाएंगे और प्रकाशन की जो भी तारीख होगी उससे या फिर ऐसी किसी अन्य तारीख से जो भी विंडिस्ट की जाए उस अनुसार विधि का बल रखेंगे !

धारा 132

इस धारा के अनुसार जो कुछ भी स्त्रियों को स्वीय उप संजाति जाति से छूट के बारे में बताया गया है जिसके अनुसार जो भी स्त्रियां देश की रूढ़ियों और नीतियों के अनुसार लोगों के सामने आने के लिए विवश नहीं की जानी चाहिए और उन्हें न्यायालय में स्वीय उपजाति से छूट दिया जाए !

इसमें अंतर्वस्तु कोई भी बात ऐसे किसी भी मामले में जिसमें की स्त्रियों की गिरफ्तारी इस संहिता द्वारा निर्दिष्ट नहीं है जोकि सिविल आदेश का के निष्पादन में किसी भी स्त्री की गिरफ्तारी से छूट देने वाली नहीं समझी जाएगी!

धारा 133

इस धारा के अनुसार अन्य व्यक्तियों को छूट के बारे में बताया गया है जिसके अनुसार निम्नलिखित व्यक्ति न्यायालय में   स्वीय उप संजाति से छूट पाने के हकदार होंगे!

इसमें निम्न को शामिल किया गया है !

जैसे कि —

भारत के राष्ट्रपति 

भारत के उपराष्ट्रपति 

लोकसभा का अध्यक्ष संघ के मंत्री

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 उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश राज्यों के राज्यपाल और संघ राज्य क्षेत्रों के प्रशासक

 राज्य विधानसभाओं के अध्यक्ष 

विधान परिषद के सभापति 

राज्यों के मंत्री उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 

तथा वे सभी व्यक्तियों जिन्हें धारा 87 का के अनुसार लागू होती है !

जहां पर कोई भी व्यक्ति ऐसी छूट के विशेषाधिकार का दावा करता है तो उसके परिणाम स्वरूप उसका परीक्षा कमीशन के द्वारा साक्षी आवश्यक होता है यदि उसके साथ की अपेक्षा करने वाले पत्रकार ने कमीशन का खर्चा नहीं दिया है तो वह व्यक्ति उसका खर्चा देगा!

धारा 134

इस धारा के अनुसार  डिक्री के निष्पादन में की जाने वाली अन्यथा गिरफ्तारी के बारे में बताया गया है इसमें धारा 55 धारा 57 धारा 49 के प्रबंध इस संहिता के अधीन गिरफ्तार किए के सभी व्यक्तियों पर जहां तक हो पाएगा लागू होगी!

धारा 135

इस धारा के अनुसार सिविल आदेश का के अधीन गिरफ्तारी से छूट के बारे में बताया गया है इसके अंतर्गत कोई भी न्यायालय के न्यायाधीश मजिस्ट्रेट या फिर अन्य न्यायिक अधिकारी उस समय सिविल आदेश का के अधीन गिरफ्तार नहीं किए जाएंगे जब तक कि वह अपने न्यायालय को जा रहा हूं या उसमें पीठासीन अधिकारी हो या वहां से लौट रहा हो!

इसके अंतर्गत जहां पर कोई भी मामला किसी ऐसे अधिकरण के संबंध में है जिसमें उसकी अधिकारिता है या फिर जिसके बारे में वह श्रद्धा पूर्वक विश्वास करता है कि उसमें उसकी ऐसी अधिक आता है जहां वे उस मामले के पक्षकार उसके प्लीडर उसके राजस्व अभिकर्ता मान्य प्राप्त मान्यता प्राप्त अभिकर्ता और अन्य साथी जो कि समन के आज्ञा अनुसार कार्य कर रहे हैं! तो फिर ऐसी आधे शिकार से जो कि ऐसे अधिकरण ने न्यायालय के ओमान के लिए निकाली है उससे भी सिविल आदेश का के अधीन गिरफ्तार किए जाने से उस समय छूट प्राप्त कर सकेंगे!

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 जब तक कि वे ऐसे मामले के प्रयोजन के लिए अधिकरण को जा रहे हो या फिर उसमें हाजिर हो रहे हो या फिर जब ऐसे अधिकरण से लौट रहे हो इसकी धारा तीन उदाहरण दो कि कोई भी बात निर्णय  को तुरंत निष्पादन के आदेश के अधीन या फिर जहां पर ऐसा निर्णय ने इस बात का हेतु दर्शित करने के लिए हाजिर हुआ है की  डिक्री  के निष्पादन में उसे कारागार में क्यों ना सुपुर्द कर दिया जाए जहां पर गिरफ्तारी से छूट का दावा करने के लिए उसे समर्थ नहीं बनाएगी !

135 क —

विधाई निकायों के सदस्यों को सिविल आदेश का के अधीन गिरफ्तार किए जाने और विरुद्ध किए जाने से छूट इसके अनुसार कोई भी व्यक्ति यदि वे संसद के किसी सदन का है या फिर किसी राज्य की विधान सभा विधान परिषद या फिर किसी राज्य राज्य क्षेत्र की विधानसभा का सदस्य है तो यथास्थिति संसद के किसी भी सदन के अथवा विधानसभा या फिर विधान परिषद के किसी भी अधिवेशन को चालू रहने के दौरान यदि वह संसद के द्वारा किसी सदन की या फिर किसी राज्य राज्य क्षेत्र के विधानसभा की या फिर किसी राज्य की विधान परिषद की या फिर बिना समिति के सदस्य तो ऐसी समझ के किसी अधिवेशन को चालू रखने के दौरान यदि वे संसद के किस सदन का अथवा किसी ऐसे राज्य की विधानसभा और विधान परिषद का जिसमें कि वह दोनों का सदन है सदस्य है ऐसी स्थिति में संसद के साधनों द्वारा राज्य विधानमंडल के सदनों की संयुक्त बैठक अधिवेशन सम्मेलन या संयुक्त समिति को चालू रखने के दौरान और ऐसे अधिवेशन बैठक सम्मेलन में 40 दिन पूर्व या पश्चात सिविल आदेश का के अधीन गिरफ्तार या कारागार में निरुद्ध नहीं किया जा सकेगा!

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 धारा 256 के अधीन निरोध को छोड़ दिया गया व्यक्ति उक्त धारा के उप बंधुओं के अधीन रहते हुए गिरफ्तारी और अतिरिक्त अवध के लिए विरोध किया जा सकेगा विरुद्ध रहता है यदि एक के अधीन नहीं छोड़ा गया होता है तो!

उम्मीद करती हूं आपको यह पोस्ट पसंद आया होगा यदि इस पोस्ट से संबंधित कोई भी जानकारी आप देना चाहते हैं या फिर यदि इसमें कोई त्रुटि हो गई है या फिर इससे संबंधित कोई भी सुझाव देना चाहते हैं तो आप हमें कमेंट बॉक्स में जाकर के कमेंट अवश्य करें हमारी हिंदी ला नोट्स क्लासेज के नाम से वीडियो भी अपलोड हो चुकी है तो आप उन्हें भी देख सकते हैं !धन्यवाद!!

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