सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के अनुसार धारा 3 से 12 तक का विस्तृत अध्ययन

इससे पहले हमने आपको धारा 1 व धारा 2 को समझाया है। आपने अगर धारा 1 व धारा 2 नही पढ़ा हैं। तो कृपया पहले उसको पढ़ लीजिये। इससे आपको समझने मे आसानी होगी। यह आप CPC टैग मे जाकर देख सकते है।
अब हम लोग सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 के अनुसार धारा 3 से 12 को पढ़ते हैं।

धारा 3


न्यायालयों की अधिनस्थता –
इसमे जिला न्यायालय उच्च न्यायालय के अधिनस्थता मे होती है। और जो छोटे कोर्ट यानि सिविल न्यायालय और लघु न्यायालय जिला न्यायालय के अंदर मे होते है।जिला न्यायालय के अधीनस्थ जो आते हैं वह उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के अंतर्गत आते हैं।
कई राज्य का अपना अलग विधि हैं जैसे कर्षि से संबन्धित वाद ।

धारा 4


व्यवृत्तियाँ–
इसमे यदि कोई विधि यदि उस राज्य की लागू हो रही है तो इस संहिता का उसपर कोई प्रभाव नही पड़ेगा। यह संहिता का प्रभाव कहा तक हैं इसमे बताया गया है।

धारा 5


संहिता का राजस्व न्यायालयों मे लागू होना- राजस्व न्यायालय की प्रक्रिया मे जब कोई अधिनियम मौन है तो वह इसके द्वारा लागू होगा । राज्य सरकार उसके उपबंधो को लागू कर साशित किया जाएगा और प्रपत्र द्वरा लागू होगा। राजस्व न्यायालय व्यवहार न्यायालय ही होता है। कलेक्टर इसका न्यायधीश होता हैं । यहा राज्य सरकार उपबंधो को शशित कर सकता है।

धारा 6


धन सम्बन्धी अधिकारिता- सभी न्यायालय धन सम्बन्धी अधिकार मे रहते हुए ही वाद को सुन सकता है। इसकी अपनी क्षेत्राधिकार होता है इसमे न्यायालय अपने क्षेत्राधिकार अनुसार ही वाद ग्रहण कर सकता है। जैसे मध्यप्रदेश न्यायालय कितने रुपये का वाद ग्रहण कर सकता हैं। जैसे जिला न्यायधीश 1 लाख तक रकम का वाद ले सकता है।

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धारा 7


प्रांतीय लघुवाद न्यायालय –
यह बहुत कम क्षेत्र या मूल्य का वाद ग्रहण करते है। यह किस प्रकार लागू होगा । यह कितना चल सकता है। इसका क्या योगदान है इसके बारे मे बताया गया है।

धारा 8


प्रसीडेंट लघुवाद न्यायालय –
इसमे कलकत्ता,मुंबई, मद्रास आता हैं इसमे सिविल की धारा बनाई ज्ञाई हैं 1882 ,इसमे धारा 24.41, आदि लगती है।75a ,75b, 75c, 76,78,157,158 और प्रेसीडेंसी की धारा 15 लगाई जाती है।

धारा 9


न्यायालय की अधिकारिता और पूर्व वाद –
इसमे न्यायालय की अधिकारिता 4 प्रकार से हो सकती है।
विषय वस्तु अधिकारिता
स्थानीय और प्रादेशिक अधिकारिता
आर्थिक अधिकारिता
आरंभिक और अपीलीय अधिकारिता

इसमे प्रत्येक न्यायालय का क्षेत्र अलग अलग कर दिया गया है। जिससे वाद का निपटारा हो सके। यदि क्षेत्राधिकार निर्धारित न किया जाए तो एक ही न्ययालय मे वाद जादा हो जाएगा । और निम्न श्रेडी का न्यायालय उच्च श्रेडी का वाद सही से नही सुन सकेगा।

सभी न्यायालय को अपने क्षेत्राधिकार मे रह कर कार्य करना होता है और एक दूसरे मे हस्तक्षेप नही कर सकता हैं। यदि कोई सिविल वाद नही है तो न्यायालय को बता देना होगा की यह वाद सिविल का नही हैं यदि यह नही बोला गया तो उसको सिविल वाद माना जाएगा ।

ऐसा वाद जिसमे संपत्ति या पद संबंधी वाद आता है तो वह सिविल वाद हैं यदि यह धार्मिक या पद से संबन्धित हैं तो उसमे पैसा देना जरूरी नही है यह सिविल वाद हो सकता हैं।

यहा क्षेत्राधिकार से संबंध न्यायालय के वाद ग्रहण से हैं की कौन सा वाद आप लेंगे या नही । किसका निर्णय आप कर सकेंगे या नही यह न्यायालय को अधिकार दिया जया है।

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सरकार के द्वारा नियत स्थान तक ही न्यायालय वाद देखता हैं जैसे जिला न्यायालय अपने जिले का वाद देखता हैं। कुछ न्यायालय केवल अपील मे नही अपना वाद कर सकते है।

सिविल और आपराधिक संबंध का अधिकार सिविल देखता हैं और दांडिक दीवानी न्यायालय देखता है। ब्योहार प्रकर्ति क्या है और वास्तु प्रकार्ति क्या हैं व्योहार मामले सिविल के अंतर्गत आते हैं।

व्योहार के मामले क्या हैं यह वाद की विषय वस्तु से निर्धारित हो सकती इन , इसमे वाद का सार क्या हैं । व्योहार की प्रक्रती क्या हैं इसपर निर्भर करता है। यह ऐसे वाद होते हैं इसमे अपना अधिकार अर्जित करने के लिए जो वाद लाया जाएगा यह सिविल वाद होगा । और जिसमे हमको दंड दिलाना होगा वह दांडित प्रक्रती का होगा।

धारा 10


विचाराधीन न्याय
ऐसा वाद जो न्यायालय मे पहले से चल रहा है जो पहले से विचारधीन है उसी पक्ष मे उसी प्रश्न का कोई वाद लाते है तो वह वाद वही रोक दिया जाएगा । और पहले से दाखिल वाद पर सुनवाई करेगी।

माना क़ के खिलाफ मैंने वाद दायर किया था और पुनः उसी वाद को दायर नही कर सकते और अगर करते है तो पहले वाद की सुनवाई होगी यह रद्द कर दिया जाएगा ।
2 न्यायालय यदि अलग अलग निर्णय एक वाद मे देंगे तो समंजस्य नही बनेगा । और न्ययालय मे केस ज्यदा हो जाएगा।

इसके तत्व क्या क्या हैं।
वाद एक ही व्यक्ति द्वारा लाया गया हो।
वाद पहले से न्यायालय मे दायर किया गया हो।
वाद को सुनने के लिए न्यायालय सछम हो।
दोनों पक्ष वही होने चाहिए।

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धारा 11


पूर्व न्याय
यह 1 जनवरी 1909 को लागू हुई थी इसके अनुसार कोई भी न्यायालय ऐसे वाद का निस्तारण नही करेगा जो की पूर्व मे उसी विषय या उसी व्यक्ति द्वारा या उनके प्रतिनिधि द्वारा सुना जा चुका है और उसका निस्तारण किया जा चुका है। तो न्यायालय ऐसे वाद को दोबारा नही सुनेगा । इसको पूर्व न्याय का सिधान्त कहा गया हैं।
पूर्व वर्ती वाद वह है।
जो पहले सुना गया हैं और जिसका अंतिम विनिश्चय किया गया हो चाहे उसका सत्यापन पहले हुआ हैं या नही हुआ हो। जैसे की हाइकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के ऑर्डर को सुरक्षित रख लिया जाता हैं । और निचली अदालत उस अनुसार ही निर्णय देती हैं।

धारा 12

अतिरिक्त वादो का वर्जन –
वह वाद जो पहले से जिसका निर्णय हो चुका हो फिर से उससे संबन्धित वाद को दोबारा नही दायर कर सकते है।
इसमे यदि एक वाद किसी न्यायालय मे चल रहा है तो दोबारा उसी वाद को या उससे संबन्धित वाद को किसी अन्य या उसी न्यायालय मे दोबारा नही लाया जा सकता हैं ।

उदाहरण के लिए यदि व मे क ,ख ,ग की प्रपोर्टी छीन ली हैं और सबने मिल कर व के खिलाफ वाद दायर किया हैं तो ज अलग से उसी केस पर वाद दायर नही कर सकता हैं उसके लिए उसको क,ख, ग के साथ ही सम्मलित हो जाना पड़ेगा ।

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