सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 61 से धारा 67 तक का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 60  तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धराये नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धराये समझने मे आसानी होगी। और पढ़ने के बाद हमे अपना कमेंट अवश्य दीजिये।

धारा 61

सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 61 के अनुसार –

कृषि उपज को छूट –

जहा पर राज्य  सरकार अपने राज्य पत्र मे प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश के द्वारा यह घोषणा करती है की कृषि उपज या उससे संबन्धित किसी वर्ग को राज्य सरकार के अनुसार उस भूमि पर अगली उपज तक खेती करने का और निर्णीत ऋणी और उसके परिवार के जीवन निर्वाह के लिए उप बंध करने के लिए यह आवश्यक है की क्रषक और उसके परिवार तथा उस वर्ग की दशा मे डिक्री के निष्पादन मे कुर्की या विक्रय के दायित्व से छूट प्रदान किया जाए ।

धारा 62 के अनुसार –

सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 62 के अनुसार –

निवास घर मे संपत्ति का अभिग्रहण –

कोई भी व्यक्ति इस संहिता के अनुसार जंगम संपत्ति का अभिग्रहण या प्राधिक्रत करने वाली किसी आदेश का निष्पादन करते हुए किसी निवास गृह मे सूर्य उदय के पहले और सूर्य अस्त के बाद नही करेगा ।

इस धारा के अनुसार कोई भी व्यक्ति या अधिकारी किसी निर्णीत ऋणी के घर का बाहरी द्वार तब तक नही तोड़ सकते है जब तक की वह निवास घर ऋणी के अधिबोग मे न हो और वह अपने संपत्ति को  सुपुर्द करने से माना नही करता हो परंतु यदि कोई अधिकारी गिरफ्तार करने के लिए पाहुच गया है और बाहरी द्वार पर प्रवेश कर लिया है तो वह अंदर का दरवाजा तोड़ सकता है यदि ऋणी सुपुर्द करने से माना कर रहा हो और अधिकारी को पता हो की वह संपत्ति  इस स्थान पर या इस कमरे मे है।

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यदि कमरा किसी स्त्री का है तो निर्णीत ऋणी का नही है तो गिरफ्तारी करने के लिए अधिकारी पहले उस स्त्र्री को सूचित करेगा और फिर उस स्त्री को वह से निकलने की सुविधा प्रदान करेगा और फिर वह संपत्ति के लिए उस कमरे मे जा सकता है।

धारा 63

सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 63 के अनुसार –

इसमे यह बताया गया है की जब कई न्यायालय के द्वारा डिक्रीयों के निष्पादन मे कुर्क की गयी संपत्ति –

जब कोई संपत्ति जो किसी भी न्यायालय की अभिरक्षा मे नही है जब कई नय्यालय के द्वारा डिक्रीयों के निष्पादन मे कुर्क की गयी संपत्ति को जो न्यायालय प्राप्त करेगा उसके संबंध मे किसी आक्षेप की अवधारणा करेगा ,वह न्यायालय के बीच मे क्ष्रेणी जिसकी ऊंची होगी और जब कई न्यायालय होंगे तो ऐसे न्यायालय जिनकी क्ष्रेणी मे कोई अंतर नही होगा वहा वह न्यायालय होगा जिसकी डिक्री के अधीन संपत्ति पहले कुर्क होगी।

इस धारा की कोई भी बात डिक्री के निष्पादन करने के लिए न्यायालय द्वारा की गयी कार्यवाही को जो अवमान्य करने वाली नही समझी जाएगी।

धारा 64

सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 64 के अनुसार-

कुर्की के बाद संपत्ति के प्राइवेट अन्य संक्रामण का शून्य होना –

इसके अनुसार जहा कुर्की की जा चुकी है वहा कुर्क की गयी संपत्ति या उसमे से किसी हित का ऐसे कुर्की के प्रतिकूल प्राइवेट अंतरण या परिदान और किसी रिन, लाभांश , या अन्य धन का ऐसे कुर्की के प्रतिकूल निर्णीत ऋणी को संदाय के अधीन प्रवर्तनीय सभी दावो के अधीन शून्य होगा।

इस धारा के अनुसार की गयी कोई भी बात कुर्क की गयी संपत्ति या उसमे से किसी के हित के लिए किसी ऐसे प्राइवेट अंतरण या परिदान को लागू नही होगा जो कुर्की से पहले ऐसे अंतरण या परिदान की संविदा के अनुसरण मे किया गया हो या रजिस्टर किया गया हो।

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धारा 65

सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 65 के अनुसार-

इस धारा मे विक्रय के बारे मे बताया गया है। और क्रेता के क्या हक है उसकी जानकारी दी गयी है। जहा किसी डिक्री के निष्पादन मे स्थावर संपत्ति का विक्रय किया गया है। और ऐसा विक्रय आत्यंतिक हो वहा ऐसा समझा जाएगा कि संपत्ति का जब विक्रय किया गया है न कि उस समय जब उसका विक्रय आंतरिक हुआ क्रेता के हित मे होगा।

धारा 66

सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 66 के अनुसार –

यह धारा विलोपित कर दी गयी है।

धारा 67

सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 67 के अनुसार-

इसमे राज्य सरकार कि शक्ति जो कि भूमि के विक्रय के बारे मे नियम बनाने के लिए प्राप्त है उसका वर्णन किया गया है।

राज्य सरकार किसी भी स्थानीय क्षेत्र के लिए ऐसे नियम जो धन संदाय के लिए डिक्रीयों के निष्पादन मे भूमि मे हितो के किसी वर्ग के विक्रय कि शर्त अधिरोपित करते है या फिर जो राज्य सरकार के द्वारा राजपत्र मे अधिसूचना के द्वारा बना सकेगी यदि ऐसे हित इतने अनिश्चित या अनवरित हो कि उनका मूल्य नियत करना राज्य सरकार कि राय मे असंभव हो ।

यदि उस समय जिस समय इस संहिता के किसी भी स्थानीय क्षेत्र मे कोई परिवर्तन आया है तो राज्य सरकार उसको अधिसूचना के द्वारा यह निश्चित करेगा कि वह परिवर्तन प्रवर्त रहेगी या वैसे ही अधिसूचना के द्वारा उसको उपांतरित किया जा सकेगा।

ऐसे उपांतरित नियम इस उपधारा के प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग मे निकाली गयी अधिसूचना मे लिखित होंगे।

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इस धारा के अनुसार बनाए गए नियम विधान मण्डल के सामने प्रस्तुत किया जाएगा।

सिविल प्रक्रिया संहिता की कई धराये अब तक बता चुके है यदि आपने यह धराये नही पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धराये समझने मे आसानी होगी।

यदि आपको इन धाराओ को समझने मे कोई परेशानी आ रही है। या फिर यदि आप इससे संबन्धित कोई सुझाव या जानकारी देना चाहते है।या आप इसमे कुछ जोड़ना चाहते है।या फिर आपको इन धाराओ मे कोई त्रुटि दिख रही है तो उसके सुधार हेतु भी आप अपने सुझाव भी भेज सकते है।

हमारी Hindi law notes classes के नाम से Youtube video  भी अपलोड हो चुकी है तो आप वहा से भी जानकारी ले सकते है।  कृपया हमे कमेंट बॉक्स मे जाकर अपने सुझाव दे सकते है।

2 thoughts on “सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 61 से धारा 67 तक का विस्तृत अध्ययन”

  1. Mere land ke inkhap se nam hata diya gya jab mere father ki death hua to muje pata chala maine SDM ke yeha 32/38 ka case kiya fir mere nam chad gya ab us jamin per dusra kabja kiya hai. Mai kya kru ki land mujhe mil jaye.

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