सिविल प्रक्रिया संहिता धारा 95 से धारा 98 का विस्तृत अध्ययन

जैसा कि आप सभी को ज्ञात होगा इससे पहले की पोस्ट मे सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 94 तक का विस्तृत अध्ययन करा चुके है यदि आपने यह धाराएं नहीं पढ़ी है तो पहले आप उनको पढ़ लीजिये जिससे आपको आगे की धाराएं समझने मे आसानी होगी। और पढ़ने के बाद हमें अपना कमेंट अवश्य दीजिये।

धारा 95 –

इसमें पर्याप्त कारणों की वजह से गिरफ्तारी ,कुर्की या व्यादेश करने के प्रतिकूल जहा किसी वाद मे जिसमे इससे पहले की धारा कोई गिरफ्तारी का कुर्की ले ली गयी है या फिर अस्थाई व्यादेश दिया गया है।

जिसमे न्यायालय को यह प्रतीत होता है की उसे गिरफ्तारी या कुर्की या व्यादेश के लिए आवेदन अप्राप्त आधार पर दिया गया है। या

वादी का कोई वाद असफल हो जाता है। और न्यायालय को यह लगता है की उसके द्वारा संस्थित किए गए वाद का कोई आधार नहीं था।

यहा प्रतिवादी न्याय्यलय के पास आवेदन कर सकता है की इस वाद पर अपने आदेश जो 50000 से उपर है तो उसके लिए न्याय्यलय मे वाद दायर कर सकता है।
यदि प्रतिवादी 50000 रुपये से जादा मुयाबजा चाहता है तो उसको अलग से वाद दायर करना पड़ेगा ।

धारा 96 –

इस धारा के अनुसार सीपीसी की धारा 96 में यह  प्रावधान किया गया  है कि किसी भी डिक्री के लिए एक पीड़ित पक्ष जो एक न्यायालय द्वारा अपने मूल अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करते हुए पारित किया गया था। उसको  इस उद्देश्य के लिए नामित उच्च प्राधिकारी को अपील करने का कम से कम एक अधिकार प्रदान किया जाता है।  जब तक कि किसी भी कानून के प्रावधान न हों।

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अपील किसी भी न्यायालय के द्वारा मूल अधिकार क्षेत्र का प्रयोग करने वाले अधिकृत अपीलीय न्यायालयों में पारित एक डिक्री से होती है जिसके  सिवाय जहां स्पष्ट रूप से निषिद्ध है।

‘श्रीमती के. पोन्नालागू अम्मानी बनाम स्टेट ऑफ मद्रास’ मामला इसका मुख्य उदाहरण है।

इस मुकदमे मे यह बताया गया है की अपील की अनुमति उन्हीं को दी जानी चाहिए जो भले ही मुकदमे के पक्षकार न हों लेकिन संबंधित आदेश या फैसले से प्रभावित होते है।  और नहीं तो वह  अन्य मुकदमों में इसकी सत्यता पर सवाल उठाने से वंचित रह जाएंगे।
कोर्ट ने यह भी कहा ‘पीड़ित व्यक्ति’ की अभिव्यक्ति में वह व्यक्ति शामिल नहीं होता, जिन्हें मानसिक या आभासी आघात होता है, बल्कि पीड़ित व्यक्ति अनिवार्यता तौर पर वह व्यक्ति होना चाहिए, जिनके हित बुरी तरह प्रभावी हुए हों या उनके अधिकार जोखिम में पड़ चुके हैं

किसी भी व्यक्ति को किसी भी निर्णय के विरुद्ध अपील करने का अधिकार तब तक नहीं मिलता है जब तक कि वह वाद का पक्षकार न होया  सिवाय न्यायालय की विशेष अनुमति के। इसमे अपील के अधिकार पर विचार करते समय ध्यान में रखा जाने वाला एक आवश्यक तत्व यह है कि क्या ऐसा व्यक्ति निर्णय/वाद से प्रतिकूल रूप से प्रभावित होता है, और  जो प्रत्येक मामले में निर्धारित किए जाने वाले तथ्य का प्रश्न है।

धारा 96(2) के अनुसार  पहली अपील जिसमे प्रतिवादी मुकदमे के गुण-दोष के आधार पर यह तर्क दे सकता है कि वादी द्वारा रिकॉर्ड पर लाई गई सामग्री उसके पक्ष में डिक्री पारित करने के लिए पर्याप्त नही  थी । या यह कि वाद अन्यथा चलने योग्य नहीं था। या फिर इसे वैकल्पिक रूप सेया  ऐसे एकपक्षीय डिक्री को रद्द करने के लिए एक आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है।  ये दोनों उपाय समवर्ती प्रकृति के होते हैं। यह एक पक्षीय डिक्री के खिलाफ अपील में, अपीलीय अदालत ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित एक पक्षीय डिक्री के औचित्य या अन्यथा के प्रश्न पर जाने के लिए सक्षम होता  है।

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धारा 96(3) के अनुसार इस पर  रोक लगाने के व्यापक सिद्धांत पर आधारित होती है तथा यह  घोषणा करती है कि पार्टियों की सहमति से पारित कोई भी डिक्री अपील योग्य नहीं होती है ।जबकि  एक अपील एक सहमति डिक्री के खिलाफ होती है जहां हमले का आधार यह है कि सहमति डिक्री एक क़ानून के उल्लंघन में गैरकानूनी है या परिषद के पास कोई अधिकार नहीं था की वह अपील कर सकता है।

धारा 96(4) के अनुसार  ऐसे मामलों में जिसमें कानून के बिंदुओं को छोड़कर अपील पर रोक लगाती है । जहां पर मूल मुकदमे की विषय-वस्तु का मूल्य छोटे कार्यों के न्यायालय द्वारा संज्ञेय के रूप में 10,000 रुपये से अधिक नहीं है। इस प्रावधान का अंतर्निहित उद्देश्य छोटे-छोटे मामलों में अपीलों की संख्या को कम करना है।तथा उनका निवारण करना होता है।

धारा 97-

इस धारा के अनुसार यह बताया गया है की  प्रारंभिक डिक्री के खिलाफ अपील करने में विफलता  या फिर अंतिम डिक्री के खिलाफ अपील में किसी भी आपत्ति को उठाने पर रोक लगाया गया है। इसमे एक वाद भी बताया गया है जिसमे  सुब्बाना बनाम सुब्बाना के मामले में न्यायालय ने यह  प्रावधान किया है कि खंड का उद्देश्य यह है कि प्रारंभिक डिक्री के चरण में पार्टियों द्वारा पूछे गए और न्यायालय द्वारा तय किए गए प्रश्न पुन: आंदोलन के लिए  नहीं जा सकते है ।  अगर इसके खिलाफ कोई अपील नहीं की जाती है तो इसे अंतिम रूप से तय माना जाएगा।

धारा 98-

इस धारा के अनुसार भाषा अनिवार्य  होती है।और इसका  उद्देश्य यह होता है कि तथ्य के प्रश्न पर यदि मतभेद की स्थिति होती है तो  निचली अदालत द्वारा व्यक्त विचारों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और पुष्टि की जानी चाहिए। अपीलीय अदालत तथ्यों की खोज की शुद्धता की जांच नहीं कर सकती है और किसी भी दृष्टिकोण की शुद्धता पर निर्णय नहीं ले सकती है।

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