दंड प्रक्रिया संहिता धारा 16 से 22 तक का अध्ययन

crpc section 16 to 22- Hindi Law Notes

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 16 –

महानगर मैजिस्ट्रेट का न्यायालय –

सभी महानगर क्षेत्र मे महानगर मैजिस्ट्रेट  के लिए राज्य सरकार उच्च न्यायालय से परामर्श लेकर  जीतने न्यायालय की आवश्यकता होगी उतना न्यायायालय उस क्षेत्र मे बनेगा।

महानगर मैजिस्ट्रेट के पीठासीन अधिकारी उच्च नयायालय दावरा नियुक्त किए जाएंगे।

इनकी अधिकारिता महानगर क्षेत्र मे होगा और वह पूरे जिले मे उनकी श्कतियों की अधिकारिता होगी।

1898 मे धारा 18 को आज के धारा 16 से संशोधित किया गया है। पुरानी धारा के अनुसार महानगर मैजिस्ट्रेट को प्रेसिडेंट मैजिस्ट्रेट बोलते थे जो अब महानगर मैजिस्ट्रेट हो गए है। आज के अनुसार महानगर मैजिस्ट्रेट की नियुक्ति उच्च न्यायालय द्वारा होती है पहले यह राज्य सरकार द्वारा होती थी।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 17-

यह मुख्य नगर मैजिस्ट्रेट और अपर मुख्य मैजिस्ट्रेट के बारे मे बताया गया है-

उच्च न्यायालय महानगर मैजिस्ट्रेट मे से किसी एक को मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट बना सकता है। मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट किसी को अपर मुख्य मैजिस्ट्रेट बना सकता है उच्च न्यायालय के निर्देश पर मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट की शक्तिया या तो पूरी या उच्च न्यायालय के अनुसार अपर मुख्य मैजिस्ट्रेट को प्रदान की जायेंगी।

यह धारा 1898 के धारा 18 को धारा 17 मे परिवर्तन कर दिया गया है। पुरानी धारा के अनुसार मुख्य  महानगर मैजिस्ट्रेट को मुख्य  प्रेसिडेंट मैजिस्ट्रेट बोलते थे जो अब महानगर मैजिस्ट्रेट हो गए है। आज के अनुसार मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट की नियुक्ति उच्च न्यायालय द्वारा होती है पहले यह राज्य सरकार द्वारा होती थी।सह मुख्य प्रेसिडेंट को अब अपर मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट कहते है।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 18-

यह विशेस महानगर मैजिस्ट्रेट की नियुक्ति को बताता है। इनकी नियुक्ति के लिए या तो राज्य सरकार या फिर केंद्र सरकार उच्च न्यायालय से यह निवेदन करेगा कि विशेस महानगर मैजिस्ट्रेट कि नियुक्ति करे।

See Also  कॉपी राइट एक्ट 1957 सेक्शन 11 और सेक्शन 12

तो उच्च नयायालय उस व्यक्ति को जो सरकार मे कोई पद रखता है या फिर उस पद का अधिकारी है तो वह उस क्षेत्र मे जहा उसका आधिकारिक शक्ति होगी वह उनकी नियुक्ति करेगा।

वह विशेष मामलो मे या विशेस कार्यवाही द्वारा विशेष महानगर मैजिस्ट्रेट को विशेष शक्तिया प्रदान करेगा।परंतु कोई ऐसे शक्ति किसी व्यक्ति को प्रदान नही कर सकते है जब तक कि उसको विधिक ज्ञान नही होगा।उच्च न्यायालय उसको निर्देशित करता है जो विधिक मामलो कि आहर्ता रखता है।

यह एक समय मे केवल उतने समय के लिए ही नियुक्त किए जाएंगे जितना उच्च न्यायालय बताएगा।

किसी विशेस महानगर मैजिस्ट्रेट को राज्य सरकार और उच्च नयायालय प्रथम मैजिस्ट्रेट कि शक्ति दे सकता है।

1898 मे विशेष महनगर मैजिस्ट्रेट के लिए विधिक गायन और अनुभव आवश्यक नही था परंतु अब यह आवश्यक है।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 19-

यह महानगर मैजिस्ट्रेट के अधीनस्थ होना यह बताती है।यह सेसन नयायालय के अधीन होगा और बाकी मैजिस्ट्रेट मुख्य मैजिस्ट्रेट के अधीन कार्य करेंगे।

उच्च न्यायालय निश्चय कर सकता है कि अपर मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट के कितने अधीन होगा।

मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट महानगर मैजिस्ट्रेट और अपर महानगर मैजिस्ट्रेट के लिए नियम बना सकता है परंतु यह दंड प्रक्रिया संहिता के नियम के अनुसार होना चाहिए।

जो वाद सेसन नयायालय द्वारा विचारणीय नही है तो वह मुख्य महानगर मैजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मैजिस्ट्रेट विचारण करेगा। तथा वह किसी अधीनस्थ न्यायालय को नही भेजा जा सकता है।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 20-

यह कार्यपालक मैजिस्ट्रेट को बताती है-

राज्य सरकार हर क्षेत्र और जिले मे उतने व्यक्ति को जितना आवश्यक हो उनकी नियुक्ति कार्य पालक मैजिस्ट्रेट के रूप मे कर सकते है और उनमे से ही किसी को जिला मैजिस्ट्रेट बना सकते है।

See Also  रिट (Writs) के प्रकार- constitutional remedies

जिला मैजिस्ट्रेट और अपर जिला मैजिस्ट्रेट भी नियुक्त कर सकती है वह इस कानून या किसी अन्य विधि के अधीन जिला मैजिस्ट्रेट को राज्य सरकार द्वारा शक्तिया प्रदान कि जाती है।

जब जिला मैजिस्ट्रेट का पद खाली होता है तो कोई भी प्रशाश्निक अधिकारी को जिला मैजिस्ट्रेट का पद राज्य सरकार द्वारा उतने समय के लिए दे दिया जाता है और उनको वह सभी शक्ति प्रदान कि जाएगी जो जिला मैजिस्ट्रेट को राज्य सरकार द्वारा प्रदान कि गयी थी।

किसी कार्यपालक मैजिस्ट्रेट को भार साधक अधिकारी भी बना सकती है और उसको भार साधक से मुक्त भी कर सकती है और वह उपखंड मैजिस्ट्रेट कहलाएगा। और यदि और कोई विधि लागू होता है तो राज्य सरकार चाहे तो पुलिश आयुक्त को कार्य पालक मैजिस्ट्रेट कि शक्तिया प्रदान कर सकती है।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 21 –

विशेष कार्यपालक मैजिस्ट्रेट –

कार्य पालक मैजिस्ट्रेट को राज्य सरकार द्वारा विशेष कार्य पालक मैजिस्ट्रेट नियुक्त कर सकती है। वह विशेष मामलो मे या विशेष  कार्यवाही द्वारा विशेषकार्यपालक  मैजिस्ट्रेट को विशेष शक्तिया प्रदान करेगा।परंतु कोई ऐसे शक्ति किसी व्यक्ति को प्रदान नही कर सकते है जब तक कि उसको विधिक ज्ञान नही होगा।राज्य सरकार  उसको निर्देशित करता है जो विधिक मामलो कि आहर्ता रखता है।

राज्य के कार्य पालक मैजिस्ट्रेट को ही विशेस कार्य पालक मैजिस्ट्रेट बनाया जा सकता है। इसके या तो कार्य विशेष होगा या फिर इनके क्षेत्र को विशेष क्षेत्र बना दिया जाएगा।

1898 के धारा 14 मे न्यायिक मैजिस्ट्रेट या विशेष न्यायिक मैजिस्ट्रेट और विशेष कार्य पालक मैजिस्ट्रेट  को बताया गया है परंतु आज के अनुसार यह धारा 21  मे बताया गया है और अब विशेष न्यायिक मैजिस्ट्रेट धारा 13 मे बताया गया है। यह 1973 मे लागू हुआ है।

See Also  दण्ड प्रक्रिया संहिता धारा 163 तथा 164 का विस्तृत अध्ययन

इसमे एक मामले मे उच्चतम न्यायालय ने विशेष कार्यपालक मैजिस्ट्रेट और कार्य पालक मैजिस्ट्रेट कि शक्तिया लगभग समान है विशेष कार्यपालक मैजिस्ट्रेट कार्यपालक मैजिस्ट्रेट का कार्य कर सकता है परंतु उसको विशेस कार्य करने कि भी शक्ति प्रदान कि गयी है।

दंड प्रक्रिया संहिता धारा 22-

कार्य पालक मैजिस्ट्रेट की सीमाए –

कार्य पालक मैजिस्ट्रेट राज्य सरकार के नियंत्रण मे रहते हुए जिला कार्य पालक मैजिस्ट्रेट के अधीन उनके कार्य क्षेत्र और स्थानीय सीमाओ को चिन्हित कर सकेगा जिसमे कार्यपालक मैजिस्ट्रेट कार्य कर सकेंगे। जिला मैजिस्ट्रेट की कार्य का विभाजन कर सकेगा।जिसमे कार्य पालक कार्य कर सकेंगे। जो संहिता के अधीन होगी।

जैसा उपबंधित किया गया है उसके सिवाए सभी क्षेत्रो मे कार्य पालक मैजिस्ट्रेट कार्य करेगा । अर्थात यदि जिला मैजिस्ट्रेट ने कार्य पालक मैजिस्ट्रेट का क्षेत्र चिन्हित नही किया है तो वह सम्पूर्ण जिले मे कार्य करेगा।

इस प्रकार हमने आपको इस पोस्ट के माध्यम से धारा 16 से 22 को समझाने का प्रयास किया है यदि कोई गलती हुई हो या आप इसमे और कुछ जोड़ना चाहते है या इससे संबंधित आपका कोई सुझाव हो तो आप हमे अवश्य सूचित करे।

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published.